कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ६८ बसत गढ़ बंक, लंकेस नायक अछत, लंक नहि खात कोउ भात राँध्यो ॥४॥ जिसने सुबाहु, मारीच, खर, दूषण, त्रिशिरा और बालिके मारनेमें दूसरा बाण सन्धान नहीं किया, उन्हीं रघुनाथजीसे विधिकी वामताके कारण परस्त्रीको ले आकर क्या रावण युद्ध ठान सकता है ? तुलसीदासके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके और हनुमान्जीके कार्यों- का स्मरण करके घर-घर (रावणकी) बदनामी होती रहती है । तथा समुद्र बाँधनेका समाचार सुनकर सब लोग व्याकुल हो गये हैं। (लंका-जैसे) विकट गढ़में निवास करते और रावण-जैसे (दुर्दान्त) शासकके रहते हुए भी लंकामें कोई पकाया हुआ भात नहीं खाता [क्योंकि उन्हें हर समय आग लगनेका भय बना रहता है]। 'बिस्वजयी भृगुनायक-से बिनु हाथ भए हनि हाथ हजारी । बातुल मातुलकी न सुनी सिख का 'तुलसी' कपि लंक न जारी ॥ अजहूँ तौ भलो रघुनाथ मिलें, फिरि बूझिहै, को गज, कौन गजारी। कीर्ति बड़ो, करतूति बड़ो, जन-बात बड़ो, सो बड़ोई बजारी ॥५॥ [ लंकापुरीमें रहनेवाले नर-नारी कहते हैं—] हजार भुजाओंवाले (सहस्रार्जुन) को मारनेवाले परशुराम-जैसे विश्व- विजयी वीर भी (इन रघुनाथजीके सामने) निहत्थे हो गये । देखो, इस पागल रावणने अपने मामा (माल्यवान्) की भी शिक्षा नहीं मानी; तो तुलसीदासजी कहते हैं क्या हनुमान्जीने लंकाको नहीं जलाया ? यदि यह श्रीरघुनाथजीसे मेल कर ले तो अब भी अच्छा है। नहीं तो फिर मालूम हो जायगा कि कौन हाथी है और कौन