कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९ लंकाकाण्ड सिंह है ? इस (रावण) की कीर्ति बड़ी है, करनी बड़ी है और जनतामें बात भी बड़ी है, परन्तु यह है बड़ा बजारा (बकवादी*) । समुद्रोत्चरण जब बाहन भे बनबाहन-से, उतरे बनरा, 'जय राम' रढैं। 'तुलसी' लिएँ सैल-सिला सब सोहत, सागरु ज्यों बल बारि बढ़ें॥ करि कोपु करें रघुबीरको आयसु, कौतुक हीं गढ़ कूदि चढ़े। चतुरंग चमू पलमें दलि कैं रन रावन-राइ-सुहाड़ गढ़े ॥ ६ ॥ जब [ सेतु बाँधते समय ] पत्थर नावके समान हो गये, तब वानरलोग समुद्रपार उतर आये और 'रामचन्द्रजीकी जय' कहने लगे। गोसाईंजी कहते हैं—वे सब हाथोंमें पर्वत और शिलाएँ लिये ऐसे सुशोभित हो रहे हैं जैसे ज्वार आनेपर समुद्र सुशोभित होता है। वे बड़ा क्रोध करके श्रीरामचन्द्रजीका आज्ञाका पालन करते हैं, खेलहीसे कूदकर लंका-गढ़पर चढ़ गये हैं, मानो एक ही पलमें युद्धमें चतुरंगिणी सेनाको नष्टकर दुष्ट रावणकी सुदृढ़ हड्डियोंका मरम्मत कर डालेंगे। बिपुल बिसाल बिकराल कपि-भालु, मानो कालु बहु बेष धरें, धाए किएँ करषा । लिए सिला-सैल, साल, ताल औ तमाल तोरि, तोपैं तोयनिधि, सुरको समाजु हरषा ॥ डगे दिगकुंजर, कमठ कोलू कलमलै, डोले धराधर धारि, धराधरु धरषा ।
- बजारीका अर्थ दलाल या मिथ्यावादी भी हो सकता है ।