कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'तुलसी' तमकि चलैं, राघौकी सपथ करें, को करै अटक कपिकटक अमरषा ॥७॥ बहुत-से बड़े-बड़े भयंकर बानर और भालु इस प्रकार दौड़े मानो अनेक वेष धारण किये काल ही क्रोधित हो दौड़ रहा हो। कोई शिला, कोई पर्वत, कोई शाल, कोई ताड़ और कोई तमालके वृक्ष तोड़ लाये और समुद्रको तोपने लगे। यह देखकर देवसमाज हर्षित हुआ। दिशाओंके हाथी डोलने लगे, कच्छप और वाराह कलमला गये, पहाड़ काँपने लगे और शेष दब गये। गोसाईंजी कहते हैं— श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई देकर सब बानर तमककर चलते हैं। भला ऐसा कौन है जो उस क्रोधभरे कपिकटकको रोक सके ? आए सुक, सारनु, बोलाए ते कहन लागे, पुलक सरीर सेना करत फहम हीं। 'महाबली बानर विसाल भालु काल-से कराल हैं, रहें कहाँ, समाहिंगे कहाँ महीं' ॥ हँस्यो दसकंधु रघुनाथको प्रतापु सुनि, 'तुलसी' दुरावै मुखु, सूखत सहम हीं। : रामके बिरोधें बुरो बिधि-हरि-हरहू को, सबको भलो है राजा रामके रहम हीं ॥८॥ सुक और सारण [वानर-सेना देखकर] लौट आये हैं। उनके शरीर कपिकटकका खयाल करते ही पुलकित हो गये। बुलाकर पूछनेपर वे कहने लगे—'महाबलवान् बानर और विशाल भालु कालके समान भयंकर हैं। वे न जाने कहाँ रहते हैं और पृथ्वीमें