भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

७१ लंकाकाण्ड कहाँ समायेंगे ।' श्रीरामचन्द्रका प्रताप सुनकर रावण हँसा । गोसाईं जी कहते हैं—डरसे उसका मुँह सूख गया है, (किन्तु वह) उसे (हँसकर) छिपाता है। श्रीरामचन्द्रजीसे वैर करनेसे तो ब्रह्मा, विष्णु और शिवका भी अहित होता है। सबकी भलाई तो महाराज रामकी कृपामें ही है। अङ्गदजीका दूतत्व 'आयो! आयो! आयो सोई बानरु बहोरि!' भयो सोरु चहुँ ओर लंकाँ आएँ जुबराजकें। एक काढैं सोंज, एक धोंज करें, 'कहा हैहै, पोच भई,' महासोचु सुभटसमाजकें ॥ गाज्यो कपिराजू रघुराजकी सपथ करि, मूँदे कान जातुधान मानो गाजें गाजकें। सहमि सुखात बातजातकी सुरति करि, लवा ज्यों लुकात तुलसी झपटें बाजकें ॥९॥ लंकामें युवराज (अङ्गदजी) के आनेपर वहाँ चारों ओर यही शोर हो गया कि वही (लंका जलानेवाला) वानर फिर आ गया, वही वानर फिर आ गया। कोई असबाब निकालने लगे और कोई दौड़ने और कहने लगे कि 'भाई! बड़ा बुरा हुआ; न जाने अब क्या होगा ?' इस प्रकार वीरसमाजमें बड़ी चिन्ता हो गयी। जब कपिराज (अङ्गद) श्रीरामचन्द्रजीकी दोहाई देकर गरजे तो राक्षसों ने कान मूँद लिये, मानो बिजलौ कड़की हो। वे लोग हनुमान्जीके स्मरणकर डरके मारे सूख गये और ऐसे छिपने लगे जैसे बाजके झपटनेपर लवा पक्षी छिप जाता है।