कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
४. किष्किन्धाकाण्ड (सुग्रीव मैत्री व लंका प्रस्थान)
'तुलसी' तमकि चलैं, राघौकी सपथ करें, को करै अटक कपिकटक अमरषा ॥७॥ बहुत-से बड़े-बड़े भयंकर बानर और भालु इस प्रकार दौड़े मानो अनेक वेष धारण किये काल ही क्रोधित हो दौड़ रहा हो। कोई शिला, कोई पर्वत, कोई शाल, कोई ताड़ और कोई तमालके वृक्ष तोड़ लाये और समुद्रको तोपने लगे। यह देखकर देवसमाज हर्षित हुआ। दिशाओंके हाथी डोलने लगे, कच्छप और वाराह कलमला गये, पहाड़ काँपने लगे और शेष दब गये। गोसाईंजी कहते हैं— श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई देकर सब बानर तमककर चलते हैं। भला ऐसा कौन है जो उस क्रोधभरे कपिकटकको रोक सके ? आए सुक, सारनु, बोलाए ते कहन लागे, पुलक सरीर सेना करत फहम हीं। 'महाबली बानर विसाल भालु काल-से कराल हैं, रहें कहाँ, समाहिंगे कहाँ महीं' ॥ हँस्यो दसकंधु रघुनाथको प्रतापु सुनि, 'तुलसी' दुरावै मुखु, सूखत सहम हीं। : रामके बिरोधें बुरो बिधि-हरि-हरहू को, सबको भलो है राजा रामके रहम हीं ॥८॥ सुक और सारण [वानर-सेना देखकर] लौट आये हैं। उनके शरीर कपिकटकका खयाल करते ही पुलकित हो गये। बुलाकर पूछनेपर वे कहने लगे—'महाबलवान् बानर और विशाल भालु कालके समान भयंकर हैं। वे न जाने कहाँ रहते हैं और पृथ्वीमें
७१ लंकाकाण्ड कहाँ समायेंगे ।' श्रीरामचन्द्रका प्रताप सुनकर रावण हँसा । गोसाईं जी कहते हैं—डरसे उसका मुँह सूख गया है, (किन्तु वह) उसे (हँसकर) छिपाता है। श्रीरामचन्द्रजीसे वैर करनेसे तो ब्रह्मा, विष्णु और शिवका भी अहित होता है। सबकी भलाई तो महाराज रामकी कृपामें ही है। अङ्गदजीका दूतत्व 'आयो! आयो! आयो सोई बानरु बहोरि!' भयो सोरु चहुँ ओर लंकाँ आएँ जुबराजकें। एक काढैं सोंज, एक धोंज करें, 'कहा हैहै, पोच भई,' महासोचु सुभटसमाजकें ॥ गाज्यो कपिराजू रघुराजकी सपथ करि, मूँदे कान जातुधान मानो गाजें गाजकें। सहमि सुखात बातजातकी सुरति करि, लवा ज्यों लुकात तुलसी झपटें बाजकें ॥९॥ लंकामें युवराज (अङ्गदजी) के आनेपर वहाँ चारों ओर यही शोर हो गया कि वही (लंका जलानेवाला) वानर फिर आ गया, वही वानर फिर आ गया। कोई असबाब निकालने लगे और कोई दौड़ने और कहने लगे कि 'भाई! बड़ा बुरा हुआ; न जाने अब क्या होगा ?' इस प्रकार वीरसमाजमें बड़ी चिन्ता हो गयी। जब कपिराज (अङ्गद) श्रीरामचन्द्रजीकी दोहाई देकर गरजे तो राक्षसों ने कान मूँद लिये, मानो बिजलौ कड़की हो। वे लोग हनुमान्जीके स्मरणकर डरके मारे सूख गये और ऐसे छिपने लगे जैसे बाजके झपटनेपर लवा पक्षी छिप जाता है।
कवितावली ७३ तुलसीस बल रघुबीरजू कें बालिसुतु ताहि न गनत, बात कहत करेरी-सी। 'बकसीस ईसजू की खीस होत देखिअत, रिस काहें लागति, कहत हौं मैं तेरी-सी ॥ चढ़ि गढ़-मढ़ दृढ़, कोटकें कँगूरें, कोपि नेकु धक्का देहिं, दैहैं ढेलनकी ढेरी-सी। सुनु दसमाथ ! नाथ-साथके हमारे कपि हाथ लंका लाइहैं तौ रहेगी हथेरी-सी ॥१०॥ तुलसीदासजीके स्वामी श्रीरामचन्द्रके बलपर बालिपुत्र अङ्गद उस (रावण) को कुछ नहीं समझते और कड़ी-कड़ी बातें कहते हैं कि 'आज शिवजीकी दी हुई सम्पत्ति नष्ट होती दिखायी देती है, इससे तुम क्रोधित क्यों होते हो ? मैं तो तुम्हारे हितकी ही बात कहता हूँ । हे रावण ! सुनो, हमारे स्वामीके साथके बंदर जब गढ़के मकानोंपर और कोटके सुदृढ़ कँगूरोंपर चढ़ जायेंगे और क्रोधित होकर जरा भी धक्का देंगे तो सब ढेलोंकी ढेरीके समान ढह जायेंगे।' और उन्होंने लङ्कामें हाथ डाला तो वह हथेलीके समान सपाट (चौपट) हो जायगी। 'दूषनु, बिराधु, खरु, त्रिसिरा, कबंधु बधे तालऊ बिसाल बेधे, कौतुकु हे कालिको । एक ही बिसिख बस भयो बीर बाँकुरो सो, तोहू है बिदित बलु महाबली बालिको ॥ 'तुलसी' कहत हित, मानतो न नेकु संक, मेरो कहा जैहैं, फलु पैहै तू कुचालिको ।
७३ लंकाकाण्ड बीर-करि-केसरी कुठारपानि मानी हारि, तेरी कहा चली, बिड़ ! तोसे गनै घालि को॥११॥ देखो, उन्होंने दूषण, विराध, खर, त्रिशिरा और कबन्धको मारा, बड़े विशाल ताड़ोंका भी (एक ही बाणसे) छेदन किया— ये सब उनके कलके ही कौतुक हैं। जिस महाबलशाली बालिका बल तुझे भी विदित है, वह बाँका वीर भी उनके एक ही बाणके अधीन हो गया। हम तेरे हितकी बात कहते हैं, परन्तु तू जरा भी भय नहीं मानता; सो मेरा क्या जायगा, तू ही अपनी कुचालका फल पावेगा। जो वीररूपी गजराजोंके लिये सिंहके समान हैं, उन कुठारपाणि परशुरामजीने भी जिनसे हार मान ली, अरे नीच ! उनके सामने तेरी क्या चल सकती है? तेरे जैसोंको पासंगके बराबर भी कौन गिनता है ? तोसों कहौं दसकंधर रे, रघुनाथ विरोधु न कीजिए बौरै। बालि बली, खरु दूषनु और अनेक गिरे जे-जे भीतिमें दौरै ॥ ऐसिअ हाल भई तोहि धों, न तु लै मिलु सीय चहै सुखु जौं रे। रामकें रोष न राखि सकैं तुलसी बिधि, श्रीपति, संकरु सौ रे॥१२॥ 'अरे दशकन्ध ! मैं तुझसे कहता हूँ, तू भूलकर भी रघुनाथ- जीसे विरोध न करना। महाबली बालि और खर-दूषणादि जो वीर दीवारपर दौड़े वे ही गिर पड़े। तेरी भी ऐसी ही दशा होनेवाली है; नहीं तो, यदि सुख चाहता है तो जानकीजीको लेकर मिल। अरे, श्रीरामचन्द्रके क्रोधसे सैकड़ों ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी रक्षा नहीं कर सकते।
कवितावली ७४ तूँ रजनीचरनाथु महा, रघुनाथके सेवकको जनु हौं हौं । बलवान है स्वानु गलीं अपनीं, तोहि लाज न गालु बजावत साँहौं ॥ बीस भुजा, दस सीस हरौं, न डरौं प्रभु-आयसु-भंग तें जौं हौं । खेतमें केहरि ज्यों गजराज दलौं दल, बालिको बालकु तौ हौं ॥१३॥ तू निशाचरोंका महाराज है और मैं रघुनाथजीके सेवक सुग्रीव- का सेवक हूँ । अपनी गलीमें तो कुत्ता भी बलवान् होता है । तुमको मेरे सामने गाल बजाते लाज नहीं आती । यदि मैं श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाभङ्गसे न डरता तो तुम्हारा बीसों भुजाओं और दसों सिरोंको उतार लेता । जैसे सिंह गजराजका दलन करता है वैसे ही यदि युद्धक्षेत्रमें मैं तुम्हारी सेनाका दलन करूँ तभी तुम मुझे बालिका बालक जानना । कोसलराजके काज हौं आजु त्रिकूट उपारि, लै बारिधि बोरौं । महा भुजदंड द्वै अंडकटाह चपेटकीं चोट चटाक दै फोरौं ॥ आयसभंगतें जौं न डरौं, सब भीजि सभासद श्रोनित घोरौं । बालिको बालकु जौं, 'तुलसी' दसहू मुखके रनमें रद तोरौं ॥१४॥ 'कोसलराज श्रीरामचन्द्रजीके कार्यके लिये आज मैं त्रिकूट पर्वतको ( जिसपर लंका बसी हुई है ) उखाड़कर समुद्रमें डुबा दे सकता हूँ, लङ्का तो क्या, सारे ब्रह्माण्डको अपने दोनों प्रचण्ड भुजदण्डोंकी चपेटसे दबाकर चटाकसे फोड़ दे सकता हूँ; यदि मैं आज्ञा-भङ्गसे न डरता तो तुम्हारे सब सभासदोंको मसलकर लोहूमें सान देता । मैं यदि बालिका बालक हूँ तो रणभूमिमे तुम्हारे दसों मुँहके दाँतोंको तोड़ डालूँगा ।'
७५ लंकाकाण्ड अति कोपसों रोप्यो है पाउ सभाँ, सब लंक ससंकित, सोरु मचा। तमके घननाद-से बीर प्रचारि कै, हारि निसाचर-सैनु पचा ॥ न टरै पगु मेरुहु तें गरु भो, सो मनो महि संग विरंचि रचा। तुलसी सब सूर सराहत हैं, जगमें बलसालि है बालि-बचा ॥१५॥ तब अङ्गदजीने अत्यन्त क्रुद्ध हो सभामें पाँव रोप दिया। इससे समस्त लंका सशङ्कित हो गयी, और उसमें सब ओर शोर मच गया। मेघनाद-जैसे वीर तमक और ललकारकर उठे और हारकर बैठ गये। सारी राक्षसी सेना भी पच मरी, परन्तु पैर न टला। वह सुमेरुपर्वतसे भी भारी हो गया, मानो (उसे) ब्रह्माने पृथ्वीके साथ ही रचा हो। गोसाईंजी कहते हैं—सब वीर प्रशंसा करने लगे कि संसारमें एकमात्र बलशाली बालिपुत्र अङ्गद ही हैं। रोप्यो पाउ पैंज कै, बिचारि रघुबीरबलु, लागे भट समिटि, न नेकु टसकतु हैं। तज्यो धीरु धरनीं, धरनीधर धसकत, धराधरु धीर भारु सहि न सकतु हैं ॥ महाबली बालिकें दबत दलकति भूमि, ‘तुलसी’ उछलि सिंधु, मेरु भसकतु हैं। कमठ कठिन पीठि घट्टा पर्यो मंदरको, आयो सोई काम, पै करेजो कसकतु हैं ॥१६॥ अङ्गदजीने श्रीरामचन्द्रजीके बलको विचारकर प्रणपूर्वक पैर रोपा। वीरगण जुटकर उसे उठाने लगे, परन्तु वह टससे मस नहीं होता। पृथ्वीतकने धैर्य छोड़ दिया (जो धैर्यके लिये प्रसिद्ध है),
५. सुन्दरकाण्ड (हनुमान लंका दहन)
कवितावली ७६ पर्वत धसकने लगे, परम धैर्यवान् शेषजी भी उनका भार नहीं सह सके। बालिके पुत्र महाबली अङ्गदजीके दबानेसे पृथ्वी काँप गयी, समुद्र उछल पड़ा और मेरु पर्वत फटने लगा । कमठके कठोर पीठमें जो मन्दराचलका घट्टा पड़ा है वही काम आया (अर्थात् उससे वेदना कम हुई ), तो भी (भारके कारण) कलेजा तो कसकने ही लगा। रावण और मन्दोदरी झूलना कनकगिरिसृंग चढ़ि देखि मर्कटकटकु, बदत मंदोदरी परम भीता। सहसभुज-मत्तगजराज-रनकेसरी परसुधर-गर्बु जेहि देखि बीता ॥ दास तुलसी समरसूर कोसलधनी, ख्याल हीं वालि बलसालि जीता। रे कंत ! तृन दंत गहि ‘सरन श्रीरामु' कहि, अजहुँ एहि भाँति लै साँपु सीता ॥१७॥ सुवर्णगिरिके शिखरपर चढ़कर वानरी सेनाको देखनेपर मन्दोदरी अत्यन्त भयभीत होकर कहने लगी - 'सहस्रबाहुरूपी मत्त गजराजके लिये रनमें केसरीके समान परशुरामजीका गर्व जिनको देखकर जाता रहा, वे श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें बड़े ही प्रबल हैं। देखो, उन्होंने खेलहीमें बलशाली बालिको जीत लिया । हे कन्त ! तुम दाँतोंमें तिनका दबाकर 'मैं श्रीरामचन्द्रजीकी शरण हूँ' ऐसा कहते हुए अब भी जानकीको ले जाकर सौंप दो।
७४ लंकाकाण्ड रे नीच ! मारीचु बिचलाइ, हति ताड़का, भंजि सिवचापु सुखु सबहि दीन्ह्यो । सहस दसचारि खल सहित खर-दूषनहि, पठै जमधाम, तैं तउ न चीन्ह्यो ॥ मैं जो कहौं, कंत ! सुनु मंतु, भगवंतसों बिमुख है बालि फलु कौन लीन्ह्यो । बीस भुज, दस सीस खीस गए तबहिं जब, ईसके ईससों बैरु कीन्ह्यो ॥१८॥ अरे नीच ! जिसने मारीचको विचलितकर (अर्थात् बिना फलके बाणसे समुद्रके पार फेंककर) ताड़काको मार डाला, शिवजीके धनुषको तोड़कर सबको सुख दिया और फिर चौदह हजार राक्षसों- सहित खर-दूषणको यमलोक भेज दिया, उसे तूने तब भी नहीं पहचाना । हे स्वामिन् ! मैं जो सलाह देती हूँ सो सुनो । भगवान्से विमुख होकर भला बालिने भी कौन फल पाया ? तुम्हारे बीसों बाहु और दसों सिर तो तभी नष्ट हो गये जब तुमने शिवजीके स्वामीसे वैर किया । बालि दलि, काल्हि जलजान पाषान किये, कंत ! भगवंतु तैं तउ न चीन्हे। विपुल बिकराल भट भालु-कपि काल-से, संग तरु तुंग गिरिस्रंग लीन्हें॥ आइगो कोसलाधीसु तुलसीस जँहि छत्र मिस मौलि दस दूरि कीन्हे।
कवितावली ७८ ईस-बकसीस जनि खीस करु, ईस ! सुनु, अजहूँ कुलकुसल बैदेहि दीन्हें ॥१९॥ 'कलकी ही बात है, उन्होंने बालिको मार समुद्रमें पत्थरों- को नाव बना दिया। हे स्वामी! तो भी तुमने भगवान्को नहीं पहचाना। जिनके साथ कालके समान भयङ्कर बहुत-से रीछ और वानर वीर वृक्ष तथा ऊँचे-ऊँचे पर्वतश्रृंग लिये हुए हैं, तथा जो राजछत्र गिरानेके व्याजसे तुम्हारे दसों सिर छेदन कर चुके हैं, वे तुलसीदासके प्रभु कोसलेश्वर भगवान् राम आ गये हैं। हे स्वामिन्! सुनिये, शिवजीकी इस दैन्यको नष्ट न कीजिये। जानकीजीके दे देनेसे अब भी कुलकी कुशल हो सकती है। सैनके कपिन को को गनै, अर्बुदै महाबलबीर हनुमान जानी। भूलिहैं दस दिसा, सीस पुनि डोलिहैं, कोपि रघुनाथु जब बान तानी ॥ बालिहूँ गर्वु जिय माहिं ऐसो कीयो, मारि दहपट दियो जमकी घानीं। कहति मंदोदरी, सुनहि, रावन ! भतो, वेगि लै देहि बैदेहि रानी ॥२०॥ '(उनकी) सेनाके वानरोंकी गणना कौन कर सकता है ? उन्हें अरबों महाबली वीर हनुमान् ही जानो। जब श्रीरामचन्द्रजी क्रोधित होकर बाण चढ़ावेंगे तब तुम दसों दिशाओंको भूल जाओगे और तुम्हारे मस्तक डोलने लगेंगे। बालिने भी तो मनमें ऐसा ही अभिमान किया था; किन्तु इन्होंने उसे मार चौपटकर यमराजकी
घानीमें दे दिया।' मन्दोदरी कहती है—'हे रावण ! मेरी सलाह सुनो। शीघ्र ही महारानी जानकीजीको ले जाकर दे दो। गहनु उजारि, पुरु जारि, सुतु मारि तव, कुसल गो कीसु बर बैरि जाको। दूसरो दूतू पगु रोपि कोपेउ सभाँ, खर्ब कियो सर्वको, गर्बु थाको॥ दास तुलसी सभय बदत मयनंदिनी, मंदमति कंत, सुनु मंतु म्हाको। तौलौं मिलु वेगि, नहि जौलौं रन रोष भयो दासरथि बीर बिरुदैत बाँको ॥२१॥ 'तुम्हारा प्रबल शत्रु जिसका दूत एक वानर तुम्हारे वनको उजाड़, नगरको जला और पुत्रको मारकर कुशलपूर्वक चला गया। और दूसरे दूतने जब प्रण करके सभामें क्रोध किया तो सबको नीचा दिखा दिया और गर्व चूर्ण कर दिया। गोसाईंजी कहते हैं, मन्दोदरी भयभीत होकर कहने लगी—'हे मन्दमति स्वामी ! मेरी सलाह सुनिये। जबतक बड़े यशस्वी वीरवर दशरथनन्दन रणमें क्रोधित नहीं होते तबतक तुम शीघ्र उनसे मिलो। काननु उजारि, अच्छु मारि, धारि, धूरि कीन्ही, नगरु प्रजारचो, सो बिलोक्यो बलु कीसको। तुम्हें बिद्यमान जातुधानमंडलीमें कपि कोपि रोप्यो पाउ, सो प्रभाउ तुलसीसको॥ कंत ! सुनु मंतु कुल-अंतु किएँ अंत हानि, हातो कीजै हीयतें भरोसो भुज बीसको।
कवितावली ८० तौलौं मिलु वेगि, जौलौं चापु न चढ़ायो राम, रोषि बानु काढ्यो न दलैया दससीसको ॥२२॥ 'तुमने एक वानरका बल तो अपनी आँखोंसे देख लिया; उसने ( अकेले ही ) वनको उजाड़ डाला, अक्षयकुमारको मारकर उसकी सेनाको चूर्ण कर दिया और नगरमें आग लगा दी। तुम्हारे रहते हुए ही ( दूसरे ) वानर ( अङ्गद ) ने राक्षसमण्डलीमें क्रोध करके पैर रोप दिया, यह ( जो किसीसे नहीं हिला; ) तुलसीके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीका ही प्रभाव था। हे नाथ ! हमारी सम्मति सुनो, कुलके नाशसे अन्ततः हानि ही है। अतः अब अपने चित्तसे अपनी बीस भुजाओंका भरोसा त्याग दो और जबतक श्रीरामचन्द्र धनुष न चढ़ावें और क्रोधित होकर दसों मस्तकोंको छेदन करनेवाला बाण न निकालें तबतक ( शीघ्र ही ) उनसे मिल जाओ । 'पवनको पूतु देख्यो दूत वीर बाँकुरो, जो बंक गढ़ु लंक-सो ढकाँ ढकेलि ढाहिगो । बालि बलसालि को सो काल्हि दापु दलि कोपि, रोप्यो पाउ चपरि, चमूको चाउ चाहिगो ॥ सोई रघुनाथु कपि साथ पाथनाथु बाँधि, आयो नाथ ! भागे तें खिरिरि खेह खाहिगो । तुलसी गरबु तजि, मिलिबेको साजु सजि देहि सिय, न तौं पिय ! पाइमाल जाहिगो ॥२३॥ '( उनके ) दूत बाँके वीर पवनपुत्रको तुमने देखा जो लंका- जैसे दुर्गम गढ़को धक्केसे ढकेलकर ही ढाह गया । बलशाली
८१ लंकाकाण्ड बालिका (पुत्र अङ्गद) तों कल ही बड़ी फुर्तीसे क्रोधपूर्वक चरण रोपकर तथा तुम्हारा दर्प चूर्णकर तुम्हारी सेनाका उत्साह देख गया। अब वे ही श्रीरघुनाथजी वानरोंको साथ लिये समुद्रको बाँधकर आये हैं, सो हे नाथ ! यदि इस समय तुम भागोगे तो तुम्हें खरोंचकर धूल फाँकनी पड़ेगी। इसलिये अहंकारको छोड़कर और मिलनेकी तैयारी कर जानकीजीको दे दो; नहीं तो, हे प्रिय ! तुम बरबाद हो जाओगे। उदधि अपार उतरत नहि लागी बार, केसरीकुमारु सो अदंड-कैसो डाँड़िगो। बाटिका उजारि, अच्छु, रच्छकनि मारि, भट भारी भारी राउरेके चाउर-से काँड़िगो ॥ 'तुलसी' तिहारे विद्यमान जुबराज आजु कोपि पाउ रोपि, सब छूछे कै कै छाँड़िगो। कहेकी न लाज, पिय ! आजहूँ न आए बाज, सहित समाज गढ़ राँड़-कैसो भाँड़िगो ॥२४॥ 'देखो, जिसे अपार समुद्रको पार करते देरी नहीं लगी, वह केसरीकुमार (हनुमान् यहाँ आकर) अदण्ड्यके समान तुम्हें दण्ड दे गया। उसने बागको उजाड़ तथा अक्षयकुमार एवं अन्य रक्षकोंको मारकर तुम्हारे बड़े-बड़े वीरोंको चावलकी तरह कूट गया और आज तुम्हारे रहते-रहते अङ्गद क्रोधपूर्वक अपने पैरको रोपि सबको थोथे (बलहीन) करके छोड़ गया। हे प्रिय ! कहनेकी तुमको लज नहीं है, तुम अब भी बाज नहीं आते। आज अङ्गद सारे गढ़को समाजसहित राँड़के घरके समान घूम-घूमकर देख गया। क० ६—
कवितावली ८२ जाके रोष-दुसह-त्रिदोष-दाह दूरि कीन्हे, पैअत न छत्री-खोज खोजत खलकमें। माहिष्मतीको नाथ साहसी सहसबाहु, समर-समर्थ नाथ ! हेरिए हलकमें ॥ सहित समाज महाराज सो जहाजराजु बूड़ि गयो जाके बल-वारिधि-छलकमें । टूटत पिनाककें मनाक बाम रामसे, ते नाक बिनु भए भृगुनायकु पलकमें ॥२५॥ 'जिसके क्रोधरूपी दुःसह त्रिदोषके दाहद्वारा नष्ट कर दिये जानेसे संसारमें खोजनेपर भी क्षत्रियोंका पता नहीं लगता था, हे नाथ ! ज़रा हृदयमें सोचकर देखिये, माहिष्मती पुरीका राजा साहसी सहस्रबाहु रणमें कैसा समर्थ था ! किन्तु हे महाराज ! वह सहस्रबाहुरूपी महान् जहाज अपने समाजसहित जिस परशुरामके बलरूपी समुद्रकी हिलोरेमें ही डूब गया, वही परशुरामजी धनुष टूटनेपर श्रीरामचन्द्रसे कुछ टेढ़े होते ही क्षणभरमें बिना नाक ( प्रतिष्ठा ) के हो गये अथवा उनकी स्वर्ग- प्राप्ति रुक गयी* । कीन्ही छोनी छत्री बिनु छोनिप-छपनिहार, कठिन-कुठार-पानि बीर-बानि जानि कै।
- श्रीवाल्मीकीय रामायणम वर्णन आता है कि भगवान् श्रीरामने परशुरामजीके दिये हुए धनुषमें बाण सन्धान करते समय कहा कि यह बाण अमोघ है, इसके द्वारा आपका वध तो होगा नहीं, क्योंकि आप ब्राह्मण हैं; किन्तु आप अपने तपोबलसे जिन दिव्य लोकोंको प्राप्त करनेवाले थे उन लोकोंकी प्राप्ति अब आपको न हो सकेगी ।
परम कृपाल जो नृपाल लोकपालनि पै, जब धनुहाई हैहै मन अनुमानि कै ॥ नाकमें पिनाक मिस बामता बिलोकि राम रोक्यो परलोक लोक भारी भ्रम भानि कैं। नाइ दस माथ महि, जोरि बीस हाथ, पिय ! मिलिए पै नाथ ! रघुनाथु पहिचानि कैं ॥२६॥ ये राजाओंका संहार करनेवाले हैं तथा पृथ्वीको ( कई बार ) निःक्षत्रिय कर चुके हैं, इनके हाथमें कठिन कुठार रहता है और इनका वीरोंका-सा स्वभाव है, यह जानकर भगवान् श्रीरामने, राजाओं तथा लोकपालोंपर अत्यन्त कृपापरवश हो मनमें यह अनुमान किया कि जिस समय इनका परशुरामजीके साथ धनुष- युद्ध होगा ( उस समय इन लोगोंकी क्या दशा होगी ) और यह देखकर कि पिनाकके बहानेको लेकर इनकी नाक सिकुड़ गयी है, परशुरामजीके परलोक ( स्वर्गप्राप्ति ) को रोक दिया और संसारके भारी भ्रमको ( कि उनका सामना करनेवाला संसारमें कोई नहीं है ) मिटा दिया । हे प्रिय ! उन्हीं श्रीरामचन्द्रजीको ( ईश्वर ) जानकर अपने दसों सिर पृथ्वीपर रखकर और बीसों हाथ जोड़- कर मिलो । कह्यो मतु मातुल, बिभीषनहूँ बार-बार, आचरु पसारि पिय ! पायँ ले-ले हौं परी । बिदित बिदेहपुर नाथ ! भृगुनाथगति, समय सयानी कीन्हो जैसी आइ गौं परी ॥ बायस, बिराध, खर, दूषन, कबन्ध, बालि,
कवितावली ९४ बैर रघुवीरकें न पूरी काहूकी परी । कंत बीस लोयन बिलोकिए कुभंतफलु, ख्याल लंका लाई कपि राँड़की-सी झोपरी ॥२७॥ मामाजी (मारीच) ने सलाह दी; विभीषणने भी बार-बार कहा और हे प्रिय ! मैं भी अञ्चल पसारकर बार-बार तुम्हारे पैरों पड़ी [ और भगवान्से विरोध न करनेके लिये प्रार्थना की ] । हे नाथ ! जनकपुरमें परशुरामजीकी क्या गति हुई, सो प्रकट ही है । [ अतः यह सोचकर कि 'पहले जिनसे बैर ठाना उनकी शरण कैसे जाऊँ' आपको सङ्कोच न करना चाहिये । ] उन्होंने समयपर जैसा अवसर आ पड़ा वैसी ही चतुराई कर ली । (अर्थात् रामचन्द्रजीके शरण हो गये । ) जयन्त, विराध, खर, दूषण, कबन्ध और बालि किसीका भी श्रीरामचन्द्रसे बैर करके पूरा नहीं पड़ा । हे स्वामिन् ! अपने कुविचारका फल बीसों आँखोंसे देख लो कि कपिने खेलहीमें लङ्काको किसी अनाथ बेवाकी झोंपड़ीके समान जला दिया । राम सों सामु किएँ नितु है हितु, कोमल काज न कीजिए ठाँठे । आपनि सूझि कहौं, पिय ! बूझिए, जूझिवे जोगु न ठाहरु, नाठे ॥ नाथ ! सुनी भृगुनाथकथा, बलि बालि गए चलि बातके साँठे । भाइ बिभीषनु जाइ मिल्यो, प्रभु आइ परे सुनि सायर-काँठें ॥२८॥ श्रीरामचन्द्रसे मेल करनेमें ही सदा भलाई है । ऐसे सुगम कार्यको कठिन न बनाइये । हे प्रिय ! मैं अपनी समझ कहती हूँ । इसे भलीभाँति समझ लीजिये कि यह स्थान युद्ध करनेका नहीं, किन्तु युद्धसे हटनेका ही है । हे नाथ ! आपने भृगुनाथ
८५ लंकाकाण्ड (परशुरामजी) की कथा सुन ही ली। बलवान् बालि बातके पीछे बरबाद हो गये। आपका भाई विभीषण भी (उनसे) जा मिला। हे स्वामिन् ! सुनती हूँ, अब उन्होंने समुद्रके किनारे पहुँचकर पड़ाव डाल दिया है। पालिबे को कपि-भालु-चमू जम काल करालहु को पहरी है। लंकसे बंक महा गढ़ दुर्गम ढाहिबे-दाहिबेको कहरी है॥ तीतर-तोम तमीचर-सेन समीरको सूनु बड़ो बहरी है। नाथ ! भलो रघुनाथ मिलें रजनीचर-सेन हिएँ हहरी है ॥२९॥ हे नाथ ! वायुपुत्र (हनुमान्) बानर और भालुओंकी सेनाकी रक्षाके लिये यम और कराल कालकी भी चौकसी करनेवाला है; वह लङ्का-जैसे महाविकट और दुर्गम गढ़को ढाहने और जलानेमें बड़ा उत्पाती है। निशाचरोंकी सेनारूप तीतरोंके समूहका नाश करनेके लिये वह बड़ा भारी बाज है। हे नाथ ! अब रघुनाथजीसे मिलनेहीमें भला है, निशाचरोंकी सेना हृदयमें थर्रा गयी है। राक्षस-वानर-संग्राम रोष्यौ रन रावनु, बोलाए वीर बानइत, जानत जे रीति सब संजुग-समाजकी। चली चतुरंग चमू, चपरि हने निसान, सेना सराहन जोगु रातिचरराजकी॥ तुलसी बिलोकि कपि-भालु किलकत- ललकत लखि ज्यों कँगाल पातरी सुनाजकी।
कवितावली ८६ रामरुख निरखि हरष्यो हियँ हनुमानु, मानो खेलवार खोली सीसताज बाजकी ॥३०॥ तब रावणने क्रोधित होकर युद्धके लिये बड़े यशस्वी वीरोंको बुलाया, जो युद्धकी तैयारीकी सारी रीति जानते थे । चतुरङ्गिणी सेनाने प्रस्थान किया, बड़े तपाक से नगाड़े बजने लगे; उस समय राक्षसराज (रावण) की सेना सराहने योग्य थी । गोसाईंजी कहते हैं—उस सेनाको देखकर वानर और भालू किलकारी मारने लगे; जैसे कंगाल सुन्दर अन्नकी परोसी हुई पत्तल देखकर ललचाते हैं । श्रीरामचन्द्रका इशारा पाकर हनुमान्जी हर्षित हुए, मानो खिलाड़ी (शिकारी) ने बाजकी टोपी खोल दी (अर्थात् उसे शिकारके लिये स्वतन्त्रता दे दी) । साजि कै सनाह-गजगाह सउछाह दल, महाबली धाए बीर जातुधान धीरके । इहाँ भालु-बंदर बिसाल मेरु-मंदर-से, लिए सैल-साल तोरि नीरनिधितीरके ॥ तुलसी तमकि-ताकि भिरे भारी जुद्ध क्रुद्ध, सेनप सराहे निज निज भट भीरके । झुंडनके झुंड झूमि-झूमि झुकरे-से नाचैं, समर सुमार सूर मारैं रघुबीरके ॥३१॥ धीर रावणके महाबली वीरोंका दल कवच और गजगाह (हाथियोंकी झूल) साजकर उत्साहपूर्वक चला । यहाँ मेरु और मन्दर पर्वतके समान विशाल वानर और भालुओंने समुद्रके किनारेके पर्वत और शालवृक्ष उपाड़ लिये । गोसाईंजी कहते हैं—
८९ लंकाकाण्ड फिर (दोनों दल) क्रोधित हो तमककर तथा एक दूसरेकी ओर ताककर भारी युद्धमें भिड़ गये। सेनापतिलोग अपने-अपने दलके वीरोंकी सराहना करने लगे। झुंड-के-झुंड रुंड (बिना सिरके धड़) झूम-झूमकर झुकरे-से (परस्पर युद्ध हुए-से) नाचने लगे और श्रीरामचन्द्रके वीर युद्धमें सुमार (कठिन मार) मारने लगे।
तीखे तुरंग कुरंग सुरंगनि साजि चढ़े छाँटि छैल छबीले। भारी गुमान जिन्हें मनमें, कबहूँ न भए रनमें तन ढीले॥ तुलसी लखि कै गज केहरि ज्यों झपटे, पटके सब सूर सलीले। भूमि परे भट घूमि कराहत, हाँकि हने हनुमान हठीलें ॥३२॥
जिनके मनमें बड़ा गर्व था और रणमें जिनका शरीर कभी ढीला नहीं हुआ था, ऐसे चुने हुए छबीले छैल हरिणके समान तेज भागनेवाले एवं सुन्दर रंगवाले घोड़ोंको साजकर सवार हुए। गोसाईंजी कहते हैं कि जैसे हाथीको देखकर सिंह झपटता है उसी प्रकार हनुमान्जी लीलाहीसे सब वीरोंको झपटकर पटकने लगे और वे घूम-घूमकर पृथ्वीपर गिरने और कराहने लगे। इस प्रकार हठीले हनुमान्जी ललकार-ललकारकर राक्षसोंका वध करने लगे।
सूर सँजोइल साजि सुवाजि, सुसेल धरैं बगमेल चले हैं। भारी भुजा भरी, भारी सरीर, बली विजयी सब भाँति भले हैं॥ 'तुलसी' जिन्ह धाएँ धुकै धरनी, धरनीधर धौर धकान हले हैं। ते रन-तीखन लखन लाखन दानि ज्यों दारिद दाबि दले हैं ३३
बड़े-बड़े सजीले वीर सुन्दर घोड़ोंको सजाकर और तीखे भाले धारणकर घोड़ोंकी बागडोर छोड़कर (अथवा मिलाकर बराबर- बराबर) चले। उनकी बड़ी-बड़ी भरी हुई (मांसल) भुजाएँ और भारी शरीर हैं, वे सब प्रकार बली, विजयी और सुहावने मालूम होते हैं। गोसाईंजी कहते हैं—जिनके दौड़नेसे पृथ्वी काँपने लगती है और कठिन धक्कोंसे पर्वत डोलने लगते हैं, ऐसे रणमें तीक्ष्ण लाखों वीरोंको युद्धभूमिमें लक्ष्मणजीने इस प्रकार पलकके नष्ट कर दिया जैसे कोई दानी पुरुष [बहुत-सी सम्पत्ति दान-कर] दरिद्रताको नष्ट कर देता है।
गहि मंदर बंदर-भालु चले, सो मनो उनये घन सावनके। 'तुलसी' उत झुंड प्रचंड झुके, झपटैं भट जे सुरदावनके ॥ बिरुझे विरुदैत जे खेत अरे, न टरे हठि वैरु बढ़ावनके । रन मारि मची उपरी-उपरा भलें बीर रघुपति-रावनकें ॥३४॥
वानर और भालु पर्वतोंको लेकर इस प्रकार चले मानो सावनकी घटा घिर आयी हो। गोसाईंजी कहते हैं कि उधर देवताओंका नाश करनेवाले (रावण) के प्रचण्ड वीर भी झुंड-के-झुंड क्रुद्ध होकर झपटने लगे। हठपूर्वक वैर बढ़ानेवाले (रावण) के बहुत-से यशस्वी वीर जो मैदानमें अड़े थे वे एक दूसरेसे भिड़ गये और टालनेसे भी नहीं टलते थे। इस प्रकार श्रीरामचन्द्र और रावणके वीरोंमें ऊपरा-ऊपरी करके युद्धस्थलमें खूब लड़ाई छिड़ गयी।
सर-तोमर-सेलसमूह पँवारत, मारत बीर निसाचरके । इत तें तरु ताल-तमाल चले, खर खंड प्रचंड महीधरके ॥
८९. . लंकाकाण्ड 'तुलसी' करि केहरिनादु भिरे भट, खग्ग खगे, खपुआ खरके । नख-दंतन सों भुजदंड विहंडत, मुंडसों मुंड परे झरकैं ॥३५॥ राक्षस (रावण) के वीर तीर, बरछी और सेलोंके समूह फेंक-फेंककर मारते हैं और इधरसे ताड़ और तमालके वृक्ष तथा पर्वतोंके बड़े-बड़े पैने टुकड़े चलते हैं । गोसाईंजी कहते हैं कि सब वीर सिंहनाद करके भिड़ गये । उनमें जो शूर थे, वे तो तलवारोंके बीचमें धँस गये और कायर खिसक गये । (वानरगण) नख और दाँतोंसे भुजदण्डोंको विदीर्ण करते हैं और (भूमिपर) पड़े हुए मुंड एक-दूसरेका तिरस्कार करते हैं । रजनीचर-मत्तगयंद-घटा बिघटै मृगराजके साज लरै । झपटै भट कोटि महीं पटकै, गरजै, रघुबीरकी साँह करै ॥ तुलसी उत हाँक दसाननु देत, अचेत भे बीर, को धीर धरै । बिरुझो रन मारुतको बिरुदैत, जो कालहु कालु सो बूझि परै।३६। (हनुमान्जी) राक्षसरूपी मतवाले हाथियोंके समूहका नाश करते हुए सिंहके समान युद्ध करते हैं । (वे) झपटकर करोड़ों वीरोंको पृथ्वीपर पटककर गरजते हैं और श्रीरामचन्द्रकी दुहाई देते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि उधरसे रावण हाँक देता है, (जिसे सुनकर, रामचन्द्रजीके पक्षके) वीर अचेत हो जाते हैं—(उस हाँकको सुनकर) कौन ऐसा है जो धैर्य धारण कर सके । यशस्वी वीर वायुनन्दन युद्धभूमिमें भिड़ गये, जो इस समय कालको भी काल-से दीख पड़ते हैं । जे रजनीचर बीर बिसाल, कराल बिलोकत काल न खाए । ते रन-रोर कपीसकिसोर बड़े बरजोर परे पग पाए ॥