कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ लंकाकाण्ड रे नीच ! मारीचु बिचलाइ, हति ताड़का, भंजि सिवचापु सुखु सबहि दीन्ह्यो । सहस दसचारि खल सहित खर-दूषनहि, पठै जमधाम, तैं तउ न चीन्ह्यो ॥ मैं जो कहौं, कंत ! सुनु मंतु, भगवंतसों बिमुख है बालि फलु कौन लीन्ह्यो । बीस भुज, दस सीस खीस गए तबहिं जब, ईसके ईससों बैरु कीन्ह्यो ॥१८॥ अरे नीच ! जिसने मारीचको विचलितकर (अर्थात् बिना फलके बाणसे समुद्रके पार फेंककर) ताड़काको मार डाला, शिवजीके धनुषको तोड़कर सबको सुख दिया और फिर चौदह हजार राक्षसों- सहित खर-दूषणको यमलोक भेज दिया, उसे तूने तब भी नहीं पहचाना । हे स्वामिन् ! मैं जो सलाह देती हूँ सो सुनो । भगवान्से विमुख होकर भला बालिने भी कौन फल पाया ? तुम्हारे बीसों बाहु और दसों सिर तो तभी नष्ट हो गये जब तुमने शिवजीके स्वामीसे वैर किया । बालि दलि, काल्हि जलजान पाषान किये, कंत ! भगवंतु तैं तउ न चीन्हे। विपुल बिकराल भट भालु-कपि काल-से, संग तरु तुंग गिरिस्रंग लीन्हें॥ आइगो कोसलाधीसु तुलसीस जँहि छत्र मिस मौलि दस दूरि कीन्हे।