भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

कवितावली ७८ ईस-बकसीस जनि खीस करु, ईस ! सुनु, अजहूँ कुलकुसल बैदेहि दीन्हें ॥१९॥ 'कलकी ही बात है, उन्होंने बालिको मार समुद्रमें पत्थरों- को नाव बना दिया। हे स्वामी! तो भी तुमने भगवान्को नहीं पहचाना। जिनके साथ कालके समान भयङ्कर बहुत-से रीछ और वानर वीर वृक्ष तथा ऊँचे-ऊँचे पर्वतश्रृंग लिये हुए हैं, तथा जो राजछत्र गिरानेके व्याजसे तुम्हारे दसों सिर छेदन कर चुके हैं, वे तुलसीदासके प्रभु कोसलेश्वर भगवान् राम आ गये हैं। हे स्वामिन्! सुनिये, शिवजीकी इस दैन्यको नष्ट न कीजिये। जानकीजीके दे देनेसे अब भी कुलकी कुशल हो सकती है। सैनके कपिन को को गनै, अर्बुदै महाबलबीर हनुमान जानी। भूलिहैं दस दिसा, सीस पुनि डोलिहैं, कोपि रघुनाथु जब बान तानी ॥ बालिहूँ गर्वु जिय माहिं ऐसो कीयो, मारि दहपट दियो जमकी घानीं। कहति मंदोदरी, सुनहि, रावन ! भतो, वेगि लै देहि बैदेहि रानी ॥२०॥ '(उनकी) सेनाके वानरोंकी गणना कौन कर सकता है ? उन्हें अरबों महाबली वीर हनुमान् ही जानो। जब श्रीरामचन्द्रजी क्रोधित होकर बाण चढ़ावेंगे तब तुम दसों दिशाओंको भूल जाओगे और तुम्हारे मस्तक डोलने लगेंगे। बालिने भी तो मनमें ऐसा ही अभिमान किया था; किन्तु इन्होंने उसे मार चौपटकर यमराजकी

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