कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघानीमें दे दिया।' मन्दोदरी कहती है—'हे रावण ! मेरी सलाह सुनो। शीघ्र ही महारानी जानकीजीको ले जाकर दे दो। गहनु उजारि, पुरु जारि, सुतु मारि तव, कुसल गो कीसु बर बैरि जाको। दूसरो दूतू पगु रोपि कोपेउ सभाँ, खर्ब कियो सर्वको, गर्बु थाको॥ दास तुलसी सभय बदत मयनंदिनी, मंदमति कंत, सुनु मंतु म्हाको। तौलौं मिलु वेगि, नहि जौलौं रन रोष भयो दासरथि बीर बिरुदैत बाँको ॥२१॥ 'तुम्हारा प्रबल शत्रु जिसका दूत एक वानर तुम्हारे वनको उजाड़, नगरको जला और पुत्रको मारकर कुशलपूर्वक चला गया। और दूसरे दूतने जब प्रण करके सभामें क्रोध किया तो सबको नीचा दिखा दिया और गर्व चूर्ण कर दिया। गोसाईंजी कहते हैं, मन्दोदरी भयभीत होकर कहने लगी—'हे मन्दमति स्वामी ! मेरी सलाह सुनिये। जबतक बड़े यशस्वी वीरवर दशरथनन्दन रणमें क्रोधित नहीं होते तबतक तुम शीघ्र उनसे मिलो। काननु उजारि, अच्छु मारि, धारि, धूरि कीन्ही, नगरु प्रजारचो, सो बिलोक्यो बलु कीसको। तुम्हें बिद्यमान जातुधानमंडलीमें कपि कोपि रोप्यो पाउ, सो प्रभाउ तुलसीसको॥ कंत ! सुनु मंतु कुल-अंतु किएँ अंत हानि, हातो कीजै हीयतें भरोसो भुज बीसको।