भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 83

कवितावली ८० तौलौं मिलु वेगि, जौलौं चापु न चढ़ायो राम, रोषि बानु काढ्यो न दलैया दससीसको ॥२२॥ 'तुमने एक वानरका बल तो अपनी आँखोंसे देख लिया; उसने ( अकेले ही ) वनको उजाड़ डाला, अक्षयकुमारको मारकर उसकी सेनाको चूर्ण कर दिया और नगरमें आग लगा दी। तुम्हारे रहते हुए ही ( दूसरे ) वानर ( अङ्गद ) ने राक्षसमण्डलीमें क्रोध करके पैर रोप दिया, यह ( जो किसीसे नहीं हिला; ) तुलसीके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीका ही प्रभाव था। हे नाथ ! हमारी सम्मति सुनो, कुलके नाशसे अन्ततः हानि ही है। अतः अब अपने चित्तसे अपनी बीस भुजाओंका भरोसा त्याग दो और जबतक श्रीरामचन्द्र धनुष न चढ़ावें और क्रोधित होकर दसों मस्तकोंको छेदन करनेवाला बाण न निकालें तबतक ( शीघ्र ही ) उनसे मिल जाओ । 'पवनको पूतु देख्यो दूत वीर बाँकुरो, जो बंक गढ़ु लंक-सो ढकाँ ढकेलि ढाहिगो । बालि बलसालि को सो काल्हि दापु दलि कोपि, रोप्यो पाउ चपरि, चमूको चाउ चाहिगो ॥ सोई रघुनाथु कपि साथ पाथनाथु बाँधि, आयो नाथ ! भागे तें खिरिरि खेह खाहिगो । तुलसी गरबु तजि, मिलिबेको साजु सजि देहि सिय, न तौं पिय ! पाइमाल जाहिगो ॥२३॥ '( उनके ) दूत बाँके वीर पवनपुत्रको तुमने देखा जो लंका- जैसे दुर्गम गढ़को धक्केसे ढकेलकर ही ढाह गया । बलशाली