भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 84

८१ लंकाकाण्ड बालिका (पुत्र अङ्गद) तों कल ही बड़ी फुर्तीसे क्रोधपूर्वक चरण रोपकर तथा तुम्हारा दर्प चूर्णकर तुम्हारी सेनाका उत्साह देख गया। अब वे ही श्रीरघुनाथजी वानरोंको साथ लिये समुद्रको बाँधकर आये हैं, सो हे नाथ ! यदि इस समय तुम भागोगे तो तुम्हें खरोंचकर धूल फाँकनी पड़ेगी। इसलिये अहंकारको छोड़कर और मिलनेकी तैयारी कर जानकीजीको दे दो; नहीं तो, हे प्रिय ! तुम बरबाद हो जाओगे। उदधि अपार उतरत नहि लागी बार, केसरीकुमारु सो अदंड-कैसो डाँड़िगो। बाटिका उजारि, अच्छु, रच्छकनि मारि, भट भारी भारी राउरेके चाउर-से काँड़िगो ॥ 'तुलसी' तिहारे विद्यमान जुबराज आजु कोपि पाउ रोपि, सब छूछे कै कै छाँड़िगो। कहेकी न लाज, पिय ! आजहूँ न आए बाज, सहित समाज गढ़ राँड़-कैसो भाँड़िगो ॥२४॥ 'देखो, जिसे अपार समुद्रको पार करते देरी नहीं लगी, वह केसरीकुमार (हनुमान् यहाँ आकर) अदण्ड्यके समान तुम्हें दण्ड दे गया। उसने बागको उजाड़ तथा अक्षयकुमार एवं अन्य रक्षकोंको मारकर तुम्हारे बड़े-बड़े वीरोंको चावलकी तरह कूट गया और आज तुम्हारे रहते-रहते अङ्गद क्रोधपूर्वक अपने पैरको रोपि सबको थोथे (बलहीन) करके छोड़ गया। हे प्रिय ! कहनेकी तुमको लज नहीं है, तुम अब भी बाज नहीं आते। आज अङ्गद सारे गढ़को समाजसहित राँड़के घरके समान घूम-घूमकर देख गया। क० ६—