कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ८२ जाके रोष-दुसह-त्रिदोष-दाह दूरि कीन्हे, पैअत न छत्री-खोज खोजत खलकमें। माहिष्मतीको नाथ साहसी सहसबाहु, समर-समर्थ नाथ ! हेरिए हलकमें ॥ सहित समाज महाराज सो जहाजराजु बूड़ि गयो जाके बल-वारिधि-छलकमें । टूटत पिनाककें मनाक बाम रामसे, ते नाक बिनु भए भृगुनायकु पलकमें ॥२५॥ 'जिसके क्रोधरूपी दुःसह त्रिदोषके दाहद्वारा नष्ट कर दिये जानेसे संसारमें खोजनेपर भी क्षत्रियोंका पता नहीं लगता था, हे नाथ ! ज़रा हृदयमें सोचकर देखिये, माहिष्मती पुरीका राजा साहसी सहस्रबाहु रणमें कैसा समर्थ था ! किन्तु हे महाराज ! वह सहस्रबाहुरूपी महान् जहाज अपने समाजसहित जिस परशुरामके बलरूपी समुद्रकी हिलोरेमें ही डूब गया, वही परशुरामजी धनुष टूटनेपर श्रीरामचन्द्रसे कुछ टेढ़े होते ही क्षणभरमें बिना नाक ( प्रतिष्ठा ) के हो गये अथवा उनकी स्वर्ग- प्राप्ति रुक गयी* । कीन्ही छोनी छत्री बिनु छोनिप-छपनिहार, कठिन-कुठार-पानि बीर-बानि जानि कै।
- श्रीवाल्मीकीय रामायणम वर्णन आता है कि भगवान् श्रीरामने परशुरामजीके दिये हुए धनुषमें बाण सन्धान करते समय कहा कि यह बाण अमोघ है, इसके द्वारा आपका वध तो होगा नहीं, क्योंकि आप ब्राह्मण हैं; किन्तु आप अपने तपोबलसे जिन दिव्य लोकोंको प्राप्त करनेवाले थे उन लोकोंकी प्राप्ति अब आपको न हो सकेगी ।