कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरम कृपाल जो नृपाल लोकपालनि पै, जब धनुहाई हैहै मन अनुमानि कै ॥ नाकमें पिनाक मिस बामता बिलोकि राम रोक्यो परलोक लोक भारी भ्रम भानि कैं। नाइ दस माथ महि, जोरि बीस हाथ, पिय ! मिलिए पै नाथ ! रघुनाथु पहिचानि कैं ॥२६॥ ये राजाओंका संहार करनेवाले हैं तथा पृथ्वीको ( कई बार ) निःक्षत्रिय कर चुके हैं, इनके हाथमें कठिन कुठार रहता है और इनका वीरोंका-सा स्वभाव है, यह जानकर भगवान् श्रीरामने, राजाओं तथा लोकपालोंपर अत्यन्त कृपापरवश हो मनमें यह अनुमान किया कि जिस समय इनका परशुरामजीके साथ धनुष- युद्ध होगा ( उस समय इन लोगोंकी क्या दशा होगी ) और यह देखकर कि पिनाकके बहानेको लेकर इनकी नाक सिकुड़ गयी है, परशुरामजीके परलोक ( स्वर्गप्राप्ति ) को रोक दिया और संसारके भारी भ्रमको ( कि उनका सामना करनेवाला संसारमें कोई नहीं है ) मिटा दिया । हे प्रिय ! उन्हीं श्रीरामचन्द्रजीको ( ईश्वर ) जानकर अपने दसों सिर पृथ्वीपर रखकर और बीसों हाथ जोड़- कर मिलो । कह्यो मतु मातुल, बिभीषनहूँ बार-बार, आचरु पसारि पिय ! पायँ ले-ले हौं परी । बिदित बिदेहपुर नाथ ! भृगुनाथगति, समय सयानी कीन्हो जैसी आइ गौं परी ॥ बायस, बिराध, खर, दूषन, कबन्ध, बालि,