भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 87

कवितावली ९४ बैर रघुवीरकें न पूरी काहूकी परी । कंत बीस लोयन बिलोकिए कुभंतफलु, ख्याल लंका लाई कपि राँड़की-सी झोपरी ॥२७॥ मामाजी (मारीच) ने सलाह दी; विभीषणने भी बार-बार कहा और हे प्रिय ! मैं भी अञ्चल पसारकर बार-बार तुम्हारे पैरों पड़ी [ और भगवान्‌से विरोध न करनेके लिये प्रार्थना की ] । हे नाथ ! जनकपुरमें परशुरामजीकी क्या गति हुई, सो प्रकट ही है । [ अतः यह सोचकर कि 'पहले जिनसे बैर ठाना उनकी शरण कैसे जाऊँ' आपको सङ्कोच न करना चाहिये । ] उन्होंने समयपर जैसा अवसर आ पड़ा वैसी ही चतुराई कर ली । (अर्थात् रामचन्द्रजीके शरण हो गये । ) जयन्त, विराध, खर, दूषण, कबन्ध और बालि किसीका भी श्रीरामचन्द्रसे बैर करके पूरा नहीं पड़ा । हे स्वामिन् ! अपने कुविचारका फल बीसों आँखोंसे देख लो कि कपिने खेलहीमें लङ्काको किसी अनाथ बेवाकी झोंपड़ीके समान जला दिया । राम सों सामु किएँ नितु है हितु, कोमल काज न कीजिए ठाँठे । आपनि सूझि कहौं, पिय ! बूझिए, जूझिवे जोगु न ठाहरु, नाठे ॥ नाथ ! सुनी भृगुनाथकथा, बलि बालि गए चलि बातके साँठे । भाइ बिभीषनु जाइ मिल्यो, प्रभु आइ परे सुनि सायर-काँठें ॥२८॥ श्रीरामचन्द्रसे मेल करनेमें ही सदा भलाई है । ऐसे सुगम कार्यको कठिन न बनाइये । हे प्रिय ! मैं अपनी समझ कहती हूँ । इसे भलीभाँति समझ लीजिये कि यह स्थान युद्ध करनेका नहीं, किन्तु युद्धसे हटनेका ही है । हे नाथ ! आपने भृगुनाथ