कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ७६ पर्वत धसकने लगे, परम धैर्यवान् शेषजी भी उनका भार नहीं सह सके। बालिके पुत्र महाबली अङ्गदजीके दबानेसे पृथ्वी काँप गयी, समुद्र उछल पड़ा और मेरु पर्वत फटने लगा । कमठके कठोर पीठमें जो मन्दराचलका घट्टा पड़ा है वही काम आया (अर्थात् उससे वेदना कम हुई ), तो भी (भारके कारण) कलेजा तो कसकने ही लगा। रावण और मन्दोदरी झूलना कनकगिरिसृंग चढ़ि देखि मर्कटकटकु, बदत मंदोदरी परम भीता। सहसभुज-मत्तगजराज-रनकेसरी परसुधर-गर्बु जेहि देखि बीता ॥ दास तुलसी समरसूर कोसलधनी, ख्याल हीं वालि बलसालि जीता। रे कंत ! तृन दंत गहि ‘सरन श्रीरामु' कहि, अजहुँ एहि भाँति लै साँपु सीता ॥१७॥ सुवर्णगिरिके शिखरपर चढ़कर वानरी सेनाको देखनेपर मन्दोदरी अत्यन्त भयभीत होकर कहने लगी - 'सहस्रबाहुरूपी मत्त गजराजके लिये रनमें केसरीके समान परशुरामजीका गर्व जिनको देखकर जाता रहा, वे श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें बड़े ही प्रबल हैं। देखो, उन्होंने खेलहीमें बलशाली बालिको जीत लिया । हे कन्त ! तुम दाँतोंमें तिनका दबाकर 'मैं श्रीरामचन्द्रजीकी शरण हूँ' ऐसा कहते हुए अब भी जानकीको ले जाकर सौंप दो।