कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५ लंकाकाण्ड अति कोपसों रोप्यो है पाउ सभाँ, सब लंक ससंकित, सोरु मचा। तमके घननाद-से बीर प्रचारि कै, हारि निसाचर-सैनु पचा ॥ न टरै पगु मेरुहु तें गरु भो, सो मनो महि संग विरंचि रचा। तुलसी सब सूर सराहत हैं, जगमें बलसालि है बालि-बचा ॥१५॥ तब अङ्गदजीने अत्यन्त क्रुद्ध हो सभामें पाँव रोप दिया। इससे समस्त लंका सशङ्कित हो गयी, और उसमें सब ओर शोर मच गया। मेघनाद-जैसे वीर तमक और ललकारकर उठे और हारकर बैठ गये। सारी राक्षसी सेना भी पच मरी, परन्तु पैर न टला। वह सुमेरुपर्वतसे भी भारी हो गया, मानो (उसे) ब्रह्माने पृथ्वीके साथ ही रचा हो। गोसाईंजी कहते हैं—सब वीर प्रशंसा करने लगे कि संसारमें एकमात्र बलशाली बालिपुत्र अङ्गद ही हैं। रोप्यो पाउ पैंज कै, बिचारि रघुबीरबलु, लागे भट समिटि, न नेकु टसकतु हैं। तज्यो धीरु धरनीं, धरनीधर धसकत, धराधरु धीर भारु सहि न सकतु हैं ॥ महाबली बालिकें दबत दलकति भूमि, ‘तुलसी’ उछलि सिंधु, मेरु भसकतु हैं। कमठ कठिन पीठि घट्टा पर्यो मंदरको, आयो सोई काम, पै करेजो कसकतु हैं ॥१६॥ अङ्गदजीने श्रीरामचन्द्रजीके बलको विचारकर प्रणपूर्वक पैर रोपा। वीरगण जुटकर उसे उठाने लगे, परन्तु वह टससे मस नहीं होता। पृथ्वीतकने धैर्य छोड़ दिया (जो धैर्यके लिये प्रसिद्ध है),