कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ७४ तूँ रजनीचरनाथु महा, रघुनाथके सेवकको जनु हौं हौं । बलवान है स्वानु गलीं अपनीं, तोहि लाज न गालु बजावत साँहौं ॥ बीस भुजा, दस सीस हरौं, न डरौं प्रभु-आयसु-भंग तें जौं हौं । खेतमें केहरि ज्यों गजराज दलौं दल, बालिको बालकु तौ हौं ॥१३॥ तू निशाचरोंका महाराज है और मैं रघुनाथजीके सेवक सुग्रीव- का सेवक हूँ । अपनी गलीमें तो कुत्ता भी बलवान् होता है । तुमको मेरे सामने गाल बजाते लाज नहीं आती । यदि मैं श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाभङ्गसे न डरता तो तुम्हारा बीसों भुजाओं और दसों सिरोंको उतार लेता । जैसे सिंह गजराजका दलन करता है वैसे ही यदि युद्धक्षेत्रमें मैं तुम्हारी सेनाका दलन करूँ तभी तुम मुझे बालिका बालक जानना । कोसलराजके काज हौं आजु त्रिकूट उपारि, लै बारिधि बोरौं । महा भुजदंड द्वै अंडकटाह चपेटकीं चोट चटाक दै फोरौं ॥ आयसभंगतें जौं न डरौं, सब भीजि सभासद श्रोनित घोरौं । बालिको बालकु जौं, 'तुलसी' दसहू मुखके रनमें रद तोरौं ॥१४॥ 'कोसलराज श्रीरामचन्द्रजीके कार्यके लिये आज मैं त्रिकूट पर्वतको ( जिसपर लंका बसी हुई है ) उखाड़कर समुद्रमें डुबा दे सकता हूँ, लङ्का तो क्या, सारे ब्रह्माण्डको अपने दोनों प्रचण्ड भुजदण्डोंकी चपेटसे दबाकर चटाकसे फोड़ दे सकता हूँ; यदि मैं आज्ञा-भङ्गसे न डरता तो तुम्हारे सब सभासदोंको मसलकर लोहूमें सान देता । मैं यदि बालिका बालक हूँ तो रणभूमिमे तुम्हारे दसों मुँहके दाँतोंको तोड़ डालूँगा ।'