कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३ लंकाकाण्ड बीर-करि-केसरी कुठारपानि मानी हारि, तेरी कहा चली, बिड़ ! तोसे गनै घालि को॥११॥ देखो, उन्होंने दूषण, विराध, खर, त्रिशिरा और कबन्धको मारा, बड़े विशाल ताड़ोंका भी (एक ही बाणसे) छेदन किया— ये सब उनके कलके ही कौतुक हैं। जिस महाबलशाली बालिका बल तुझे भी विदित है, वह बाँका वीर भी उनके एक ही बाणके अधीन हो गया। हम तेरे हितकी बात कहते हैं, परन्तु तू जरा भी भय नहीं मानता; सो मेरा क्या जायगा, तू ही अपनी कुचालका फल पावेगा। जो वीररूपी गजराजोंके लिये सिंहके समान हैं, उन कुठारपाणि परशुरामजीने भी जिनसे हार मान ली, अरे नीच ! उनके सामने तेरी क्या चल सकती है? तेरे जैसोंको पासंगके बराबर भी कौन गिनता है ? तोसों कहौं दसकंधर रे, रघुनाथ विरोधु न कीजिए बौरै। बालि बली, खरु दूषनु और अनेक गिरे जे-जे भीतिमें दौरै ॥ ऐसिअ हाल भई तोहि धों, न तु लै मिलु सीय चहै सुखु जौं रे। रामकें रोष न राखि सकैं तुलसी बिधि, श्रीपति, संकरु सौ रे॥१२॥ 'अरे दशकन्ध ! मैं तुझसे कहता हूँ, तू भूलकर भी रघुनाथ- जीसे विरोध न करना। महाबली बालि और खर-दूषणादि जो वीर दीवारपर दौड़े वे ही गिर पड़े। तेरी भी ऐसी ही दशा होनेवाली है; नहीं तो, यदि सुख चाहता है तो जानकीजीको लेकर मिल। अरे, श्रीरामचन्द्रके क्रोधसे सैकड़ों ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी रक्षा नहीं कर सकते।