कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७ अयोध्याकाण्ड गोसाईंजी कहते हैं कि देवतालोग केवटके भाग्यकी बड़ाई कर प्रेम- सहित फूल बरसाने और पुकार-पुकारकर जय-जयकार करने लगे । (केवटपरिवारकी) नाना प्रकारकी प्रेमभरी भोली-भाली बातोंको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजीकी ओर देख-देखकर हँसते हैं । वनके मार्गमें पुरतें निकसी रघुबीरवधू, धरि धीर दए मगमें डग द्वै । झलकीं भरि भाल कनीं जलकी, पुट सूखि गए मधुराधर वै ॥ फिरि बूझति हैं, चलनौ अब केतिक, पर्णकुटी करिहौं कित ह्वै ?। तियकी लखि आतुरता पियकी अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै॥ रघुवीरप्रिया श्रीजानकीजी जब नगरसे बाहर हुईं तो वे धैर्य धारणकर मार्गमें दो डग चलीं । इतनेहीमें (सुकुमारताके कारण) उनके ललाटपर जलके कण (पसीनेकी बूँदें) भरपूर झलकने लगे और दोनों मधुर अधरपुट सूख गये । वे घूमकर पूछने लगीं-- 'हे प्रिय ! अब कितनी दूर और चलना है और कहाँ चलकर पर्णकुटी बनाइयेगा ?' पत्नीकी ऐसी आतुरता देख प्रियतमकी अति मनोहर आँखोंसे जल बहने लगा । जलको गए लखनू, हैं लरिका, परिखौ, पिय ! छाहँ घरीक ह्वै ठाढ़े । पोंछि पसेउ बयारि करौं, अरु पाय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े ॥ तुलसी रघुबीर प्रियाश्रम जानि कै बैठि विलंब लौं कंटक काढ़े ।