भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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कवितावली २८ जानकीं नाहको नेहु लख्यो, पुलको तनु, बारि बिलोचन बाढ़े ॥१२॥ श्रीजानकीजी कहती हैं, 'प्रियतम ! लक्ष्मणजी बालक हैं, वे जल लाने गये हैं सो कहीं छाँहमें एक घड़ी खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कीजिये ! मैं आपके पसीने पोंछकर हवा करूँगी और गरम बालूसे जले हुए चरणोंको धोऊँगी।' प्रियाकी थकावटको जानकर श्रीरामचन्द्रजीने बैठकर बड़ी देरतक उनके पैरोंके काँटे निकाले। जब जानकीजीने अपने प्राणप्रियके प्रेमको देखा तो उनका शरीर आनन्दसे रोमाञ्चित हो गया और नेत्रोंमें आँसू भर आये। ठाढ़े हैं नवद्रुमडार गहें, धनु काँधैं धरें, कर सायकु लैं। बिकटी भृकुटी, बड़री अँखियाँ, अनमोल कपोलन की छबि हैं॥ तुलसी अस मूरति आनु हिएँ, जड ! डारु धौं प्रान निछावरि कै। श्रमसीकर साँवरि देह लसै, मनो रासि महा तम तारकमै ॥१३॥ किसी नवीन वृक्षकी डालको पकड़े हुए ( श्रीरामचन्द्रजी ) खड़े हैं। वे कंधेपर धनुष धारण किये हुए हैं और हाथमें बाण लिये हुए हैं; उनकी भृकुटी टेढ़ी है, आँखें बड़ी-बड़ी हैं और कपोलोंकी शोभा अनमोल है। पसीनेकी बूँदोंसे साँवला शरीर ऐसा सुशोभित हो रहा है मानो तारोंसे युक्त महान् तमोराशि हो। गोसाईंजी