भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२९ अयोध्याकाण्ड कहते हैं—रे जड़ ! ऐसी मूर्तिको प्राण निछावर करके भी हृदयमें बसा। जलजनयन, जलजानन, जटा है सिर, जौबन-उमंग अंग उदित उदार हैं। साँवरे-गोरेके बीच भामिनी सुदामिनी-सी, मुनिपट धारैं, उर फूलनिके हार हैं॥ करनि सरासन-सिलीमुख, निषंग कटि, अतिही अनूप काहू भूपके कुमार हैं। तुलसी बिलोकि कै तिलोकके तिलक तीनि, रहे नरनारि ज्यों चितेरे चित्रसार हैं ॥१४॥ [मार्गके गाँवोंके नर-नारी श्रीराम, लक्ष्मण और सीताको देखकर आपसमें इस प्रकार बातें करते हैं—] इनके नेत्र कमलके समान हैं तथा मुख भी कमलके ही सदृश हैं। इनके सिरपर जटाएँ हैं और प्रशस्त अङ्गोंमें यौवनकी उमंग झलक रही है। साँवरे (श्रीरामचन्द्र) और गोरे (लक्ष्मणजी) के मध्यमें बिजलीके समान आभावाली एक रमणी सुशोभित है। ये (तीनों) मुनियोंके वस्त्र धारण किये हैं, और इनके हृदयमें फूलोंकी मालाएँ हैं। हाथोंमें धनुष-बाण लिये और कमरमें तरकस कसे ये किसी राजाके अत्यन्त ही अनुपम कुमार हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि त्रिलोकीके इन तीन तिलकोंको देखकर वे नर-नारी ऐसे स्तब्ध रह गये मानो चित्रशाला- के चित्र हों। आगें सीहै साँवरो कुँवरु गोरो पाछें-पाछें, आछे मुनिबेष धरें, लाजत अनंग हैं।