भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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कवितावली ३० बान-बिसिखासन, बसन बनही के कटि कसे हैं बनाइ, नीके राजत निषंग हैं ॥ साथ निसिनाथमुखी पाथनाथनंदिनी-सी, तुलसी बिलोकें चितु लाइ लेत संग हैं। आनँद उमंग मन, जौवन-उमंग तन, रूपकी उमंग उमगत अंग-अंग है ॥१५॥ आगे-आगे साँवरे और पीछे-पीछे गोरे राजकुमार सुन्दर मुनिवेश धारण किये सुशोभित हैं, जिन्हें देखकर कामदेव भी लज्जित होता है। वे धनुष-बाण लिये हैं और वनके वस्त्र धारण किये हैं। कमरमें भी वनके ही वस्त्र अच्छी तरह कसे हुए हैं और सुन्दर तरकस भी सुशोभित हैं। साथमें समुद्रसुता लक्ष्मीके समान एक चन्द्रमुखी हैं। गोसाईंजी कहते हैं, वे तीनों देखनेसे मनको सग लगा लेते हैं। उनके मनमें आनन्दकी उमंग है, शरीरमें यौवनकी उमंग है और रूपकी उमंग अङ्ग-अङ्गमें उमँग रही है। सुंदर बदन, सरसीरुह सुहाए नैन, मंजुल प्रसून माथें मुकुट जटनि के। अंसनि सरासन, लसत सुचि सर कर, तून कटि, मुनिपट लूतक पटनि के॥ नारि सुकुमारि संग, जाके अंग उबटि कै विधि बिरचैं बरूथ बिद्युतछटनि के। गोरेको वरनु देखें सोनो न सलोनो लागै, साँवरे बिलोकें गर्ब घटत घटनि के ॥१६॥