कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 34, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ें३१ अयोध्याकाण्ड उनका सुन्दर मुख है, कमलके समान सुहावने नेत्र हैं और मस्तकपर जटाओंके मुकुट हैं जिनमें सुन्दर फूल खोंसे हुए हैं। कन्धोंपर धनुष, हाथोंमें सुन्दर बाण, कमरमें तरकस और वस्त्रोंकी शोभाको लूटनेवाले मुनिवस्त्र सुशोभित हैं। उनके साथ एक सुकुमारी नारी है, जिसके अङ्गोंमें उबटन लगाकर [ उसके मैलसे ] ब्रह्माने विद्युच्छटाके समूह रचे हैं। गोरे ( लक्ष्मणजी ) के रंगको देखनेपर सोना सुहावना नहीं मालूम होता और साँवरे कुँवरको देखनेसे श्याम मेघोंका गर्व घट जाता है। बलकल-बसन, धनु-बान पानि, तून कटि, रूपके निधान घन-दामिनी-बरन हैं। तुलसी सुतीय संग, सहज सुहाए अंग, नवल कँवलहू तें कोमल चरन हैं॥ औरै सो बसंत, और रति, औरै रतिपति, मूरति बिलोकें तन-मनके हरन हैं। तापस-बेषै बनाइ पथिक पथै सुहाइ, चले लोकलोचननि सुफल करन हैं॥१७॥ वल्कलवस्त्र धारण किये, हाथोंमें धनुष-बाण लिये, कमरमें तरकस कसे दोनों राजकुमार रूपके राशि तथा क्रमशः मेघ और बिजलीके रंगके हैं। साथमें सुन्दरी स्त्री है, अङ्ग स्वाभाविक ही सलोने हैं और चरण नवीन कमलसे भी अधिक कोमल हैं। लक्ष्मणजी मानो दूसरे वसन्त, सीताजी दूसरी रति और श्रीराम दूसरे कामदेव हैं; उनकी मूर्तियाँ अवलोकन करनेसे तन-मनको हरनेवाली हैं। ऐसा जान पड़ता है मानो ये तीनों ( वसन्त, रति