भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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· कवितावली २६ तेई पाय पाइकै चढ़ाइ नाव धोए बिनु, खवैहौं न पठावनी कै ह्वैहौं न हँसाइ कै ॥९॥ जिन चरणोंके (धोवनरूप) पवित्र जल—श्रीगङ्गाजीको शिवजी अपने सिरपर धारण करते हैं, जिन (गङ्गाजी) के यशका वेद भी गा-गाकर वर्णन करते हैं; जिनके लिये योगीश्वर, मुनिगण और देवतालोग देहका दमन कर, मन लगाकर अनेक प्रकारके योग और जप करते हैं; गोसाईंजी कहते हैं, जिनकी धूलिको स्पर्शकर अहल्या तर गयी और गौतमजी गौनेके समान अपनी स्त्रीको लिवाकर घर चले गये; उन्हीं चरणोंको पाकर बिना धोये नावपर चढ़ाकर मैं अपनी मजूरी नहीं खोऊँगा और न अपनी हँसी कराऊँगा। प्रभुरुख पाइ कै, बोलाइ बालक घरनिहि, वंदि कै चरन चहूँ दिसि बैठे घेरि-घेरि। छोटो-सो कठौता भरि आनि पानी गंगाजूको, धोइ पाय पीअत पुनीत वारि फेरि-फेरि॥ तुलसी सराहें ताको भागु, सानुराग सुर बरषैं सुमन, जय-जय कहैं टेरि-टेरि। विविध सनेह-सानी बानी असयानी सुनि, हँसैं राघौ जानकी-लखन तन हेरि-हेरि ॥१०॥ श्रीरामचन्द्रजीका रुख देख केवटने अपने लड़के और स्त्रीको बुलाया। वे सब प्रभुके चरणोंकी वन्दना कर चारों ओरसे उन्हें घेरकर बैठ गये। पुनः छोटे-से काठके कठौतेमें गङ्गाजीका जल लाया और चरण धोकर उस पवित्र जलको बार-बार पीने लगा।

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