कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ३६ उनके मुख कमलके समान और नेत्र भी कमलके ही समान सुन्दर थे तथा भौंहें कामदेवके धनुषके समान बनी हुई थीं। उनके अति सुन्दर और सुकुमार श्याम-गौर शरीर थे, किशोर अवस्था थी एवं सिरपर जटाएँ सुशोभित थीं तथा वे कमरमें तरकस कसे और धनुष-बाण लिये थे । जिस समयसे अचानक ही उनकी तिरछी निगाह मुझपर पड़ी है, अरी सखि ! तुझसे किस प्रकार कहूँ, वे दोनों मृदुल मूर्तियाँ मेरे मनमें बसकर मोहित कर रही हैं। वनमें प्रेमसों पीछें तिरीछें प्रियाहि चितै चितु दै चले लै चितु चोरें । स्याम सरीर पसेउ लसै, हुलसै 'तुलसी' छबि सो मन मोरें ॥ लोचन लोल, चलैं भुकुटीं कल काम-कमानहु सो तृनु तोरैं । राजत रामु कुरंगके संग निषंगु कसें, धनुसों सरु जोरैं ॥ ( श्रीराम ) पीछेकी ओर प्रेमपूर्वक तिरछी दृष्टिसे दत्तचित्तसे प्रियाकी ओर निहारकर उनका चित्त चुराकर (आखेटको) चले। तुलसीदासजी कहते हैं- (प्रभुके) श्याम शरीरमें पसीना सुशोभित है, वह छबि मेरे हृदयमें हुलास भर देती है। प्रभुके नेत्र चञ्चल हैं और सुन्दर भौंहें चलायमान हो रही हैं, जिन्हें देखकर कामदेव- की जो कमान है वह भी तृण तोड़ती अर्थात् लज्जित होती है। इस प्रकार तरकस बाँधे तथा धनुषपर बाण चढ़ाये भगवान् राम हरिणके साथ (दौड़ते हुए) बड़े ही सुशोभित हो रहे हैं। सर चारिक चारु बनाइ कसें कटि, पानि सरासनु सायकु लै । बन खेलत रामु फिरैं मृगया, 'तुलसी' छबि सो बरनै किमि कै ॥