भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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३७ अयोध्याकाण्ड अवलोकि अलौकिक रूपु मृगीं मृग चौंकि चकें, चितवैं चितु दै । न डगैं, न भगैं जियँ जानि सिलीमुख पंच धरैं रतिनायकु है ॥ श्रीरामचन्द्रजी वनमें शिकार खेलते फिरते हैं । उन्होंने दो- चार सुन्दर बाण बड़ी सुघरतासे कमरमें खोंस रक्खे हैं तथा हाथमें धनुष-बाण लिये हुए हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि उस शोभाका मैं कैसे वर्णन करूँ ? उनके अलौकिक रूपको देखकर मृग और मृगी चौंककर चकित हो जाते हैं और चित्त लगाकर देखने लगते हैं । वे यह जानकर कि पाँच बाण धारण किये साक्षात् कामदेव ही हैं, न तो हिलते हैं और न भागते ही हैं । बिंधिके बासी उदासी तपी ब्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे । गौतमतीय तरी 'तुलसी', सो कथा सुनि भे मुनिवृंद सुखारे ॥ है हैं सिला सब चंद्रमुखीं परसें पद मंजुल कंज तिहारे । कीन्ही भली रघुनायकजू ! करुना करि काननको पगु धारे ॥ विन्ध्यपर्वतपर रहनेवाले महाव्रतधारी उदासी और तपस्वी लोग बिना स्त्रीके दुखी थे । वे मुनिगण यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए कि इनके कारण गौतमकी स्त्री अहल्या तर गयी, [ और बोले ] अब सब पत्थर आपके सुन्दर चरण-कमलोंके स्पर्शसे चन्द्रमुखी स्त्री हो जायँगे । हे रघुनन्दनजी ! आपने अच्छा किया जो कृपाकर वनमें पधारे । इति अयोध्याकाण्ड