भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 38

३५ अयोध्याकाण्ड यदि संसार हमलोगोंको खोटा भी कहेगा तो कुछ परवा नहीं ! नेत्र तो अपना फल पा जायँगे और कान इनकी सुन्दर बातोंको सुनकर सुख पावेंगे । ( हमसे नहीं तो ) आपसमें तो अवश्य ही कुछ कहेंगे ही।' गोसाईंजी कहते हैं, अत्यन्त प्रेमसे उनकी आँखें बंद हो गयीं और श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें देखकर वे पुलकित हो गयीं । पद कोमल, स्यामल-गौर कलेवर राजत कोटि मनोज लजाएँ । कर बान-सरासन, सीस जटा, सरसीरुह-लोचन सोन सुहाए ॥ जिन्ह देखे सखी ! सतिभायहु तें तुलसी तिन्ह तौ मन फेरि न पाए एहिं मारग आजु किसोर बधू बिधुबैनी समेत सुभायँ सिधाए।२४। [ वे दूसरी स्त्रियोंसे कहने लगीं— ] अरी सखि ! आज एक चन्द्रवदनी बालाके सहित दो कुमार स्वभावसे ही इस मार्गसे गये हैं। उनके चरण बड़े कोमल थे तथा श्याम और गौर शरीर करोड़ों कामदेवोंको लज्जित करते हुए सुशोभित हो रहे थे । उनके हाथमें धनुष-बाण थे, सिरपर जटाएँ थीं तथा कमलके समान अरुणवर्ण नेत्र बड़े ही शोभायमान थे । जिन्होंने उन्हें सद्भावसे भी देख लिया, वे फिर उनकी ओरसे अपने मनको नहीं लौटा सके । मुखपंकज, कंजबिलोचन मंजु, मनोज-सरासन-सी बनीं भौंहैं । कमनीय कलेवर कोमल स्यामल-गौर किसोर, जटा सिर सोहैं ॥ तुलसी कटि तून, धरें धनु-बान, अचानक दिष्टि परी तिरछौंहैं । केहि भाँति कहौं सजनी ! तोहि सों, मृदु मूरति द्वै निवसीं मन मोहैं