कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ३४ और तरकस धारण किये वनके मार्गमें बड़े भले जान पड़ते हैं और स्वभावसे ही आदरपूर्वक बार-बार तुम्हारी ओर देखकर जो हमारा मन मोह लेते हैं, बताओ तो वे साँवले-से कुँवर आपके कौन होते हैं?' सुनि सुंदर बैन सुधारस-साने सयानी हैं जानकीं जानी भली । तिरछे करि नैन, दै सैन, तिन्हैं समुझाइ कछू, मुसुकाइ चली ॥ तुलसी तेहि औसर सोहैं सबै अवलोकति लोचनलाहु अलीं । अनुराग-तड़ागमें भानु-उदैं विगसीं मनो मंजुल कंजकलीं ।२२। (गाँवकी स्त्रियोंके) अमृत-से सने हुए सुन्दर वचनोंको सुनकर जानकीजी जान गयीं कि ये सब बड़ी चतुरा हैं। अतः नेत्रोंको तिरछा कर उन्हें सैनसे ही कुछ समझाकर मुसकराकर चल दीं । गोसाईंजी कहते हैं कि उस समय लोचनके लाभरूप श्रीरामचन्द्रजी- को देखती हुई वे सब सखियाँ ऐसी सुशोभित हो रही हैं, मानो सूर्यके उदयसे प्रेमरूपी तालाबमें कमलोंकी मनोहर कलियाँ खिल गयी हैं। [अर्थात् श्रीरामचन्द्ररूपी सूर्यके उदयसे प्रेमरूपी सरोवरमें सखियोंके नेत्र कमलकलीके समान विकसित हो गये ।] धरि धीर कहैं, चलु, देखिअ जाइ, जहाँ सजनी ! रजनी रहिहैं । कहिहै जगु पोच, न सोचु कछू, फलु लोचन आपन तौ लहिहैं ॥ सुखु पाइहैं कान सुनैं बतियाँ कल, आपसमें कछु पै कहिहैं। तुलसी अति प्रेम लगीं पलकैं, पुलकीं लखि रामु हिये महि हैं।२३। वे सखियाँ धीरज धारण कर (परस्पर) कहती हैं, 'हे सजनी ! चलो, रातको जहाँ ये रहेंगे उस स्थानको जाकर देखें।