कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
कवितावली २३२ जिसने अपने शरीरकी आभासे कुंकुमको जीत लिया है तथा जिसका मुखचन्द्र चन्द्रमासे होड़ बदता है, जिसके बोलनेमें सब प्रकारकी समृद्धि चूने लगती है और जो देखने ही सब प्रकारकी चिन्ता और खेदको हर लेती है; यह पक्षिणीके वेषमें साक्षात् गौरी है या गङ्गा ? अथवा आनन्दसे परिपूर्ण किसी अन्य देव.की मनोहर मूर्ति है। इस क्षेमकरी (लाल रंगकी चील्ह) को कहीं जाते समय प्रेमपूर्वक देखा जाय तो यह सब प्रकारके शोकोंकी निवृत्ति करनेवाली होती है। मंगलकी रासि, परमारथकी खानि जानि विरचि बनाई विधि, केसव बसाई है। प्रलयहूँ काल राखी सूलपानि सूलपर, मीचुवस नीच सोऊ चाहत खसाई है ॥ छाडि छितिपाल जो परीछित भए कृपाल, भलो कियो खलको, निकाई सो न साई है। पाहि हनुमान ! करुनानिधान राम पाहि ! कासी-कामधेनु कलि कुहत कसाई है ॥१८१॥ विधाताने काशीको मङ्गलकी राशि और परमार्थकी खानि जानकर रचा है और श्रीविष्णु भगवान्ने उसे बसाया है। प्रलय- कालमें भी भगवान् शङ्करने उसे अपने त्रिशूलपर रखकर बचाया था, उसीको यह मृत्युके वशीभूत हुआ नीच कलि गिराना चाहता है। महाराज परीक्षित्ने इसे छोड़कर इसपर कृपा की और इस दुष्टका भला किया; उस उपकारको इसने भुला ही दिया। हे हनुमान्जी ! रक्षा कीजिये; हे करुणानिधान भगवान् राम ! बचाइये; यह कलिरूप कसाई काशीरूप कामधेनुको मारे डालता है।
२२३ उत्तरकाण्ड विरची विरंचिकी, वसति विस्वनाथकी जो, प्रानहू तें प्यारी पुरी केसव कृपालकी। जोतिरूप लिंगमई अगनित लिंगमयी मोच्छ वितरनि, बिदरनि जगजालकी ॥ देवी-देव-देवसरि-सिद्ध-मुनिवर-बास लोपति बिलोकत कुलिपि भोंडे भालकी। हा हा करै तुलसी, दयानिधान राम ! ऐसी कासीकी कदर्थना कराल कलिकालकी ॥१८४॥ जो ब्रह्माजीकी रची हुई है और स्वयं विश्वनाथकी राजधानी है, और जो कृपामय विष्णु भगवान्को प्राणोंसे भी प्यारी है, वह ज्योतिर्लिङ्गमयी और अगणित लिङ्गमयी पुरी मोक्षदान करनेवाली और जगजालको नष्ट करनेवाली है। वह देवी, देवता, सुरसरि, सिद्धजन और मुनिवरोंकी निवासभूमि है और दर्शनमात्रसे ही अभागोंके ललाटपर लिखी हुई दुर्भाग्यकी रेखाको मिटा देती है, ऐसी काशीकी भी इस कलिकालने दुर्दशा कर रखी है जिसे देखकर, हे दयानिधान श्रीराम ! यह तुलसीदास हाहा खाता है [ आप कृपाकर इसकी रक्षा कीजिये ] । आश्रम-बरन कलि बिबस बिकल भए निज-निज मरजाद मोटरी-सी डार दी। संकर सरोष महामारीहीतें जानियत, साहिब-सरोष दुनी दिन-दिन दारदी ॥ नारि-नर आरत पुकारत, सुनै न कोऊ, काहूँ देवतनि मिलि मोटी मूठि मारि दी।
कवितावली २२४ तुलसी सभीतपाल सुमिरैं कृपाल राम समय सुकरुना सराहि सनकार दी ॥१८३॥ आश्रम और वर्ग कलिके प्रभावसे विकलङ्ग हो गये और सबने अपनी-अपनी मर्यादाको भारस्वरूप समझकर त्याग दिया। शिवजीका कोप तो महामारीसे ही प्रकट है, स्वामीके कुपित होनेके कारण ही संसारका दारिद्र्य दिनों-दिन बढ़ता जाता है। स्त्री-पुरुष सब आर्त होकर पुकारते हैं, किन्तु उनकी पुकार कोई नहीं सुनता। [मालूम होता है] किन्हीं देवताओंने मिलकर मूठ चला दी थी (अभिचारका प्रयोग किया था); किन्तु भयभीतोंकी रक्षा करनेवाले कृपालु श्रीरामको स्मरण करते ही उन्होंने अपनी करुणाकी प्रशंसा करके उसे समयपर अपना काम करनेका संकेत कर दिया [जिससे वह बीमारी बात-की-बातमें चली गयी]। समाप्त कुछ प्रतियोंमें १७७ छन्द ही मिलते हैं। काशी-नागरीप्रचारिणी सभाकी प्रतिमें १८३ छन्द हैं। अतः १८३ छन्द रखे गये हैं।
इस पृष्ठ/चित्र में कोई पाठ (text) दिखाई नहीं दे रहा है, यह पूरी तरह से रिक्त (blank) है।