भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 270 में से

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पृष्ठ 106

३७२] १. यमकके विशिष्ट भेद : (६) यमक-सङ्कर ८३ ६. धराधराकारधरा धराभुजाम्भुजा महीं पातुमहीनविक्रमाः । क्रमात् सहन्ते सहसा हतारयो रयोद्धुरा मानधुरा वलम्बिनः १ ॥७२॥ ६. पृथ्वीको धारण करने वाले (शेष नाग) का आकार धारण करने वाली, हीनसे इतर (श्रेष्ठ) पराक्रमसे युक्त, बलसे अथवा वेगसे शत्रुओंको नष्ट कर चुकी, वेगसे अग्रगामी, मानरूपी धुरी वाली, (लोगों के लिये) आश्रय वाली पृथ्वीपतियोंकी भुजाएँ पृथ्वीकी रक्षा शास्त्रोचित मार्गसे करनेमें समर्थ हैं ॥ ७२ ॥ यहाँ प्रथमपादकी अव्यपेत आवृत्ति अगले तीन पादोंमें की गई है । इस- लिये यह त्रिरावृत्त प्रथम पादाभ्यास अव्यपेत यमक है । आवृत्त पादके आठ अक्षरोंमें भी चार वर्णों (अक्षरों) 'समानया' की एक बार अव्यवहित आवृत्ति हुई है । इस कारण यह साधारण महायमकसे उत्कृष्ट है । त्रिरावृत्त पादाभ्यास यमकका ही दूसरा नाम 'महायमक' है । पादके आदिम दो अक्षरों 'समा' को पादके मध्यमें व्यपेत आवृत्ति है । पादमध्यगत 'नया' की पादान्तमें व्यपेत आवृत्ति है। पादादिगत चार अक्षरों 'समानया' की पादान्तमें अव्यपेत आवृत्ति है । इस प्रकार सारे श्लोकमें 'व्यपेताव्यपेतयमक' स्थित है। इस अव्यपेतव्यपेतावृत्तिगर्भित महायमककी रचना शब्द-शिल्पी कवि कलाकारोंके लिये एक दुष्कर चुनौती है । दण्डीने इस चुनौतीका सरस उत्तर इस उदाहरणसे सफलतापूर्वक दिया है । महाराज भोजने भी इस उदाहरणसे ही काम चलाया है ॥ ७१ ॥ (६) यमक-सङ्कर—प्रकृत श्लोकमें कविने पृथ्वीकी रक्षा करनेमें समर्थ भुजाओंकी विशेषता बताकर उत्साहका उद्दीपन विभाव प्रस्तुत किया है । कविने वीरोंकी भुजाओंका वर्णन स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर जाते हुए किया है : पहले भुजाओंका स्थूल आकार बताया है कि वे पृथ्वीको धारण करने वाले का आकार धारण करती हैं । अर्थात् इन्हें देखनेसे ही लगता है कि ये धरा- धारणसमर्थ हैं । 'धराधर' का दूसरा अर्थ है : शेष नाग । उसका आकार है स्थूल एवं लम्बा । भुजाएँ भी स्थूल एवं लम्बी हैं । इस विशेषणमें श्लेष और लुप्तोपमा है । भुजाओंके स्थूल आकारको देखनेके बाद 'अहीनविक्रमाः' से उनकी पराक्रमशालिताकी प्रतीति बताई है : ये भुजाएँ अत्यन्त पराक्रमी हैं । इनका पराक्रम शत्रुओंके विनाशसे सिद्ध हो चुका है । युद्धस्थलमें शत्रुओंपर १. तरुण० : विक्रमात् । वादी : धीरधुराव लम्बिनः ।