भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

८२ काव्यादर्श [३७१ स-मानयाऽसमानयाऽसमानयासमानया । समान-यास-मानया समानयासमानया ॥ ७१ ॥ मानवती, अनुपम, असम (विषम कामदेव) की अनीतिके कारण विषम (सङ्कटापन्न) प्राणों वाली (अर्थात् विप्रलम्भके कारण अत्यन्त कष्टावस्थाको प्राप्त), समान कामजन्य खेद और मान वाली इस प्रियासे मुझे मिला दे हे मेरे ऐसे अद्भुत (मित्र) ॥ ७१ ॥ महायमक (एकाकार चतुष्पाद यमक) का उदाहरण भोजने दण्डी वाला (७१वाँ श्लोक) ही दिया है । भट्टिके व्याख्याता जयमङ्गलने एकाकार चतुष्पाद यमक (प्रथम भेद) को 'सर्वयमक' कहा है तथा श्लोकाभ्यास यमक को 'महायमक' ।१ स्पष्ट ही यह भोजानुसृत परम्पराके अनुकूल है । रत्नश्रीज्ञानने एक पादकी तीन बार आवृत्ति वाले पादाभ्यास यमकसे आन्तरिक आवृत्तिसे निष्पन्न एकाकार पादकी तीन बार आवृत्तिसे सम्पन्न चतुष्पाद महायमकको पादके भीतरकी आवृत्तिके कारण भिन्न माना है ।२ अर्थात् वे इन दोनोंको पृथक्-पृथक् मानते हैं । तरुण वाचस्पतिने एकाकार चतुष्पाद यमकके ऊपर बताये प्रथम भेदको 'महायमक' माना है और आवृत्ति- गर्भित पादकी तीन बार आवृत्ति (अर्थात् आठ पादार्धों) वाले यमकको 'पर यमक' माना है । इन सबमें भोज और रत्नेश्वर मिश्रकी व्याख्या ही युक्तियुक्त है ॥७०॥ (३. iii. २) आवृत्तिगर्भित महायमक—प्रकृत श्लोकमें किसी पुरुषकी रूठी हुई प्रियाके प्रति विप्रलम्भरतिका चित्रण किया गया है । वर्ण्य पुरुषने उसे अत्यन्त प्रेम करने वाली इसलिये विरहकृश किन्तु प्रियकी किसी गलती पर मानकरके बैठी हुई प्रियाको मनाकर उससे मिलानेकी प्रार्थना अपने किसी नर्मसचिव मित्रसे की है । १. जयमङ्गला १०।१६ : 'सर्वयमकम्' इति चतुर्णामपि पादानां सदृशत्वात् । २०-२१ : 'महायमकम्' इति श्लोकस्यैकस्य द्वितीयेन श्लोकेन यमित- त्वात् । २. रत्नश्री २।७० : एकाकार-चतुष्पादत्वं प्रत्येकं सर्वतो यमक-योगाद् विनाऽभ्यासादपि सम्भवतीत्याह—'तस्यापि' इत्यादि । तस्यापि = महायमकस्यापि न केवलं समूहादेः, अभ्यासः त्रिपादावृत्तिर्दृश्यते ।...अत एवेदं त्रिपादाभ्यासाद् भिद्यते । तत्र प्रत्येकं पादेषु सर्वतो यमकाभावात् केवलं पाद-यमक-मात्रं त्रिरभ्यस्यते ।