भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

३७०] १. यमकके विशिष्ट भेद : (५) महायमक ८१ दृष्टिसे एक ही आकार वाला है । इस भेदको काव्यशास्त्री 'महायमक' कहते हैं । आवृत्त होने वाले एक ही पादमें अव्यपेत या व्यपेत प्रकारकी एक बार या अधिक बार आदि, मध्यादि स्थानोंमें आवृत्ति करके इस एकाकार चतुष्पादरूपी महायमकको और भी उत्कृष्ट बनाया जा सकता है । इस प्रकार महायमकके दो प्रकार हैं : (१) एक पादकी तीन बार आवृत्तिसे युक्त सादा चतुष्पाद यमक; (२) आवृत्त होने वाले पादमें भी पादांशकी आवृत्ति होती है । यह दूसरा भेद अत्युत्कृष्ट यमक होता है । महाकवियोंने प्रथम प्रकारके यमकका तो इक्का-दुक्का प्रयोग किया है,१ पर दूसरे भेदका प्रयोग हमें सुलभ नहीं हुआ । भरतमें भी 'चतुर्व्यवसित' नाम से और रुद्रटने 'पङ्क्ति' नामसे अभिहित इस महायमकके प्रथम प्रकारपर लागू होने वाला उदाहरण ही दिया है ।२ महाराज भोजने एकाकार चतुष्पाद यमक और श्लोकाभ्यास यमकको 'महायमक' नाम दिया है ।३ श्लोकाभ्यास यमक को 'महायमक' बतानेमें भोजका मत दण्डीसे पृथक् है । एकाकार चतुष्पाद यमकमें भोजने पादको पुनः अभ्यासके योग्य भी बताया है । इस अंशमें भोजने दण्डीका अनुकरण किया है । उनके आशयको विस्पष्ट रूपसे प्रस्तुत किया है रत्नेश्वर मिश्रने : एकाकारता दो प्रकारसे होती है—(१) चार आवृत्तियोंसे, (२) आठ (अर्थात् पादार्धोंकी) आवृत्तियों से ।४ उत्कृष्ट १. किरातार्जुनीय १५।१२ : विकाशमीयुर्जंगतीशमार्गणाः । भट्टिकाव्य १०।१६ : सर्वयमकम्—बभौ मरुत्वान् विकृतः समुद्रः । २. सर्वे पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः । 'चतुर्व्यवसितं' नाम विज्ञेयं तद् बुधैर्यथा ।। नाट्य० १६।८२; ८३ : सावारणानामयमेव कालः...।। काव्यालङ्कार ३।१२ : सभाजनेनोपरि पूरितासो ...।। ३. एकाकारं चतुष्पादं महायमकमुच्यते । श्लोकाभ्यासश्च, तत्राद्यं पुनरभ्यासमर्हति ।। सरस्वती० २।६७ ४. द्विविधमेकाकारं भवति—(१) एकमावृत्तिचतुष्केण, (२) अपरमावृत्त्यष्ट- केन । तदिदमुक्तम्—'आद्यं पुनरनावृत्तम्'* इति । प्रतिपादमवान्तरा- वृत्तिभेदेनैवाष्टकनिर्वाहात् । * यहाँ 'अनावृत्तं' से मूलविरोधी तथा भोजके चतुर्थपादके अनुकूल सप्तम अक्षरके लघु न होनेके कारण भोजोक्तिको उद्धृत नहीं किया गया है । अपितु यह अपने 'एकं०' कथन का स्पष्टीकरण है कि इस प्रथम भेदमें अवान्तर आवृत्ति नहीं होती ।