भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 103

८० काव्यादर्श [३।६६-७० विनायकेन भवता वृत्तोपचित-बाहुना । स्वमित्रोद्धारिणाऽभीता पृथ्वी यमतुलाऽऽश्रिता ॥ ६६ ॥ ५. एकाकारं चतुष्पादं तन्महायमकद्वयम् । तत्रापि¹ दृश्यतेऽभ्यासः, सा परा यमक-क्रिया ॥ ७० ॥ विगत हुए नायकों (सामन्त, सेनानायकों) वाले, समाप्त हो चुके (वृत्त) पुष्ट भुजाओंसे युक्त पुरुषों वाले, अपने परित्यागकर्ता मित्रों वाले शत्रुके द्वारा यमराजके तराजूके रूपमें अभिमत (शत्रुको मौतके पलड़ेके समान प्रतीत होती) पृथ्वीको आपने अधिष्ठित किया है ॥ ६६ ॥ एक (समान) आकार (वर्णविन्यास) वाला चार पादों का समूह (पीछे बताया) है । वह 'महायमक' नाम वाला होता है । उस (एकाकार पाद) में भी आवृत्ति देखी जाती है । वह सर्वोत्कृष्ट यमकरचना होती है ॥ ७० ॥ श्लोकाभ्यास यमकमें आवृत्ति श्लोक—प्रकृत श्लोकमें पिछले श्लोक की ही आवृत्ति की गई है । अर्थ भिन्न है । यदि आवृत्ति नहीं की जाती है, तो इन दो अर्थोंकी प्रतिपत्ति श्लेषके द्वारा हो जाती है । इस प्रकार यह यमक श्लेषके आश्रय पदोंकी आवृत्तिका नाम है और श्लेषका परिपन्थी है । वृत्तोपचितबाहुना — √वृत् + क्त = 'वृत्त' शब्द 'गोल', 'मृत', 'समाप्त' आदि नाना अर्थों में है । उपचिताः पुष्टा बाहवो येषाम्, ते, वृत्ताः उपचित- बाहवो यस्य, तेन । वादी जी, तरुण वाचस्पति आदिने 'बाहु' शब्दको बाजू जैसे भाई-बन्दोंका उपलक्षक माना है ।² स्वमित्रोद्धारिणा — उज्जहतीति उद्धानि — उद् + √हा + क या विच् ।³ स्वमित्राणि उद्धानि यस्य, स स्व-मित्रोद्धः, स च अरिः स्वमित्रोद्धारिः, तेन । अभीता — अभि + √इ + क्त (कर्मणि) + टाप् ॥ ६६ ॥ ५. 'महायमक' — (३. iii) त्रिपादाभ्यासयमकका विशिष्ट भेद : प्रथम पादकी तीन बार आवृत्तिसे चतुष्पदी रूप पूरा पद्य वर्णसमुदायकी १. रत्नश्रीमें 'तस्यापि' पाठ धृत व्याख्यात है । इसके अनुसार महायमककी आवृत्ति प्राप्त होती है, जिसमें एकाकार आठ पाद होंगे । पर दण्डीने आगे जो उदाहरण दिया है, उससे इसकी पुष्टि नहीं होती । भोजके कथनसे भी यहाँ 'तत्रापि' पाठकी ही पुष्टि होती है । भोज और दण्डीमें पर्याप्त एकवाक्यता है । आगे टीका देखें । २. उपचितं (चितासमीपे) वृत्ताः (स्थिता) बाहवो (ज्ञातयो) यस्य, तेन । 'बाहु'-शब्दो लक्षण्या ज्ञातिषु प्रयुक्तः । 'हत-ज्ञातिना' इति यावत् । ३. 'आतश्चोपसर्गे' (अष्टा० ३।१।१३६) से 'क' या 'अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते' (३।२।७५) से 'विच्' ।