भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 270 में से

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३।६७-६८] १. यमकके विशिष्ट भेद : (४) श्लोकाभ्यास ७६ ४. श्लोकद्वयं तु युक्तार्थं श्लोकाभ्यासः स्मृतो, यथा ॥ ६७ ॥ विनायकेन भवता वृत्तोपचितबाहुना । स्वमित्रोद्धारिणा भीता पृथ्वीयमतुलाऽऽश्रिता ॥ ६८ ॥ (४) युक्त (एक-दूसरे के अनुरूप, या परस्पर सम्बद्ध) अर्थ वाले दो श्लोक श्लोककी आवृत्ति (वाला यमक होता) है ॥ ६७ ॥ (दुष्टोंको) विनीत करने (और सज्जनोंको सन्मार्गपर ले जाने) वाले, गोल और पुष्ट भुजाओं वाले, अमित्रों (शत्रुओं) को सु (भलीभाँति) उखाड़ने वाले आपके द्वारा भयरहित हुई, यह अनुपम पृथिवी अधिष्ठित है ॥ ६८ ॥ प्रस्तुत किये हैं । (ii. क. ३) प्रथम पादकी तृतीय चतुर्थ पादोंमें (द्वितीय पादसे व्यवहित) आवृत्ति का उदाहरण नहीं दिया है। ६४वें श्लोकका रत्नश्री और वादिटीकासम्मत पाठ यदि माना जाता है, तो (ii. क. २) प्रथम पादकी दूसरे और चौथे पादोंमें आवृत्ति वाला उदाहरण नहीं है। ६४वें श्लोकके द्वितीय या तृतीय पादको इधर उधर करके पढ़नेसे इसीमें दोनों भेद निष्पन्न हो जाते हैं । (४) श्लोकाभ्यास यमक—जिस प्रकार पादाभ्यास या अर्धाभ्यास यमक में अभ्यस्त पादोंका अर्थ परस्पर युक्त होता है, मुख्य प्रतिपाद्यसे उसकी एकवाक्यता होती है, वैसे ही यहाँ भी जाति या वृत्तमें निबद्ध चतुष्पदीरूप श्लोककी आवृत्तिसे 'श्लोकाभ्यास' नामक यमक सम्पन्न होता है । आवृत्त श्लोकका अक्षरानुपूर्वीसाम्य 'आवृत्ति' कहनेसे तथा प्रकरणसे स्वतः प्राप्त है। युक्तार्थता भी पादाभ्यास आदिके समान स्वतः प्राप्त है। अतः 'युक्तार्थं' विशेषणसे यहाँ कोई अपूर्वका विधान नहीं किया है। इसे प्राप्तका 'स्पष्ट- प्रतिपत्त्यर्थ किया अनुवाद' ही कहा जा सकता है। यदि यह विधेय माना जाता है, तो पादाभ्यास और अर्धाभ्यास यमकोंमें भी इसे दिया जाना चाहिये। यमकमें अर्थानुसन्धानकी अपेक्षा दण्डीने बताई ही कहाँ है ? तरुण वाचस्पतिने इससे पदभेदसे पाठकी व्यावृत्ति मानी है¹। 'पदभेदसे पाठ' से 'विषम वर्णानुपूर्वी वाला पदभेद' तो यमकविरोधी होनेसे सम्भव नहीं है। यदि सभङ्ग शब्दश्लेषके समान पदभेद अभिप्रेत है, तो वह तो होता ही है ॥६७॥ श्लोकाभ्यासयमकमें आवर्त्य श्लोक—प्रकृत श्लोकमें कविने अपने वर्ण्य राजाके अमित तेजका वर्णन किया है । राजाके मुख्य कर्तव्य होते हैं : दुष्ट- दमन, भुजबलसे शत्रुओंका उच्छेद । इस प्रकार निर्भय (निष्कण्टक) पृथिवी (राज्य) समृद्धिसे स्वतः अतुलनीय हो जाती है ॥ ६८ ॥ १ . युक्तार्थं परस्परसम्बद्धार्थम् । अनेन पदभेदपठितं व्यावर्तयति ।

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