काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 101, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें७८ काव्यादर्श [३।६६-६७ सन्नाहितोमानमराजसेन सन्नाहितोऽमानम राजसे न । सन्नाहितोऽमानम राजसेन सन्नाहितोमानमराजसेन¹ ॥ ६६ ॥ सकृद्, द्विस् त्रिश्च योऽभ्यासः पादस्यैवं प्रदर्शितः । १० हे रजोगुणियोंसे भिन्न (सात्त्विक) लोगोंके स्वामी (उनमें अग्रगण्य), अमित लक्ष्मीसे सम्पन्न, अम (अमित) और अनम (नहीं झुकने वाली) तथा शोभायुक्त सेना वाले, (अङ्कमें) स्थापित उमा (पार्वती) और आ-नम (ईषद् झुके हुए, वक्र) राजा (चन्द्र) के कारण स्वामित्वसे युक्त (अर्धनारी- श्वर और चन्द्रशेखर शिवके समान राजन्), अहितों (शत्रुओं) को सन्न (विपद्ग्रस्त) करने वाले, सन्नाह (कवच) से युक्त होते हुए, मानको प्राप्त सत्पुरुष तुम शोभासम्पन्न नहीं हो, ऐसा नहीं है ॥ ६६ ॥ इस प्रकार पादकी (i) एक बार, (ii) दो बार और (iii) तीन बार आवृत्ति दिखला दी है । १० (३. iii) प्रथम पादका त्रिपादाभ्यास अव्यपेत यमक — प्रकृत श्लोकमें कविने किसी राजाका गौरवयुक्त वर्णन किया है। यहाँ प्रथम पादकी आवृत्ति अगले तीन पादोंमें हुई है । इससे यह अव्यपेत यमक है । दुष्करता तो स्वतः स्पष्ट है । इसे भरतने 'चतुर्व्यवसित' यमक नाम दिया है और रुद्रटने 'पङ्क्तियमक' नाम दिया है² ॥ ६६ ॥ (३) पादाभ्यास यमकका उपसंहार—तिरपनवें श्लोकके उत्तरार्धमें प्रतिपादित (३) पादाभ्यासयमकके (i) एक बार, (ii) दो बार और (iii) तीन बार आवृत्तिसे प्रतिपादित ११ भेदोंमें से निम्नलिखित १० भेदों को उदाहरणोंसे प्रदर्शित किया गया है : (i) एक (प्रथम) पादकी एक बार आवृत्तिसे निष्पन्न सभी छह भेदोंके उदाहरण ५७-६२ में, (ii) एक पादकी दो बार आवृत्तिके कारण सम्पन्न चार भेदोंमेंसे तीनके उदाहरण ६३-६५में और (iii) एक पादकी तीन बार आवृत्तिसे सम्पन्न एक भेदका उदाहरण ६६वें श्लोकमें दिया है । इस प्रकार कुल ११ भेदोंमेंसे १० भेदोंके उदाहरण आचार्यने १. अन्वयः - अ-राजसेन, अमान-म, अमानम-राज-सेन, आहितोमाऽऽनम- राज-सेन, सन्नाहितः, सन्नाहितः, मानं हितः, सन्ना (त्वं) न न राजसे । २. सर्वे पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः । चतुर्व्यवसितं नाम विज्ञेयं तद् बुधैर्यथा ॥ नाट्य० १६।८२ सर्वैः सार्धं युगपत् प्रथमस्य तु जायते पङ्क्तिः ॥ काव्याल० ३।१०