भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।६५] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७७ ६ न श्रद्दधे वाचमलज्ज, मिथ्या भवद्विधानामसमाहितानाम् । भवद्विधानामसमाहितानां भवद्विधानामसमाहितानाम् ॥ ६५ ॥ ६ हे निर्लज्ज, असंयतचित्त, अत्यन्त विषम शत्रु, दोगले-पनसे युक्त आप जैसे लोगोंकी विषम (बिगड़े हुए) नागके समान प्रपञ्चशील संसारमें भेदभाव (फूट) वालोंकी मिथ्या वाणीका मैं विश्वास नही करता ॥ ६५ ॥ प्रथमपादाभ्यास यमक माना है।२ तरुण वाचस्पतिने प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ (पादवर्ती तृतीयपादव्यवहित) यमक बताया है। हमने अर्थानुकूलताके कारण यह (तृतीयपादसे व्यवहित) पाठ उचित माना है। तरुण वाचस्पतिने द्वितीयपादव्यवहित त्रिपादावृत्तिका उदाहरण पाठान्तरोंमें खोजनेकी राय दी है। अर्थात् 'धूलोः०' आदि पादको द्वितीय या तृतीय पादके रूपमें रखनेके पाठभेदसे ये भेद प्राप्त हो जाते हैं। रङ्गाचार्य रेड्डीका यहाँ कहना है कि द्विरावृत्तिके तीन उदाहरण अपेक्षित हैं; पर तृतीय उदाहरण उपलब्ध नहीं है; न ही टीकाकारोंने इसका कुछ विवरण किया है; अतः बहुत समयसे तृतीय उदाहरण विच्छिन्न हो गया लगता है। पर इन दोनोंका यह कथन उचित तब होता, जब दण्डीने सब भेदोंके उदाहरण दिये होते। उनकी प्रवृत्ति उपलक्षणपरक है; यह दृष्टि समूचे ग्रन्थमें व्याप्त है। यमकके ही कितने ही भेदोंके उदाहरण उन्होंने नहीं दिये हैं। वादि-तरुण-टीकाओंमें 'व्योम्नि' धृत, व्याख्यात है। इस पाठमें 'रुन्धन्' के कर्मका अध्याहार अपेक्षित है। 'व्योम' पाठमें कोई अतिरिक्त कल्पना अपेक्षित नहीं है। अतः रत्नश्रीधृत 'व्योम' ही उचित है ॥ ६४ ॥ ६ (३. ii. ख) द्वितीय पादका द्विपादाभ्यास अव्यपेत यमक—प्रकृत श्लोकमें कविने किसी मिथ्यावादीके प्रति अपना आक्रोश प्रकट किया है। यहाँ द्वितीय पादकी दो बार (तृतीय और चतुर्थ पादोंमें) आवृत्तिसे यमक निष्पन्न है। द्वितीय पादकी दो बार आवृत्ति, स्पष्ट है, अव्यपेत ही होगी । तरुण वाचस्पतिने इसे 'प्रथम पादके बिना त्रिपादावृत्ति' का उदाहरण बताया है। पर आवृत्ति तो द्वितीय पादकी है, और दो बार है। अतः यहाँ 'त्रिपाद- यमक' तो है, 'त्रिपादावृत्ति' या 'त्रिपादावृत्ति यमक' नहीं है। वे तो अगले श्लोकमें दिये हैं ॥ ६५ ॥ १. अन्वयः—अलज्ज, अ-समाहितानाम्, असमाहितानाम्, भवद्-द्विधानां भवद्विधानाम असमाहितानां भव-द्विधानां मिथ्या वाचं न श्रद्दधे । २. 'धूली...रुन्धन्'को द्वितीय पाद बनानेसे यह भेद बननेसे सब भेदोंके उदाहरण बन जाते हैं।