काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ काव्यादर्श [३।६४ ८ परम्पराया बलवारणानां, परम्पराया बलवारणानाम् । धूलीः स्थलीर्व्योम विधाय रुन्धन् परम्पराया बलवा रणानाम् ॥६४॥ ८ सेनाओंको खूब रोकने वाले सेनाङ्ग हाथियोंकी उत्कृष्ट परम्परा (लम्बी कतारों) की धूलको स्थली (टेकड़ी, धरतीका टुकड़ा) बनाकर आकाशको रोकते हुए, युद्धोंके बलको प्राप्त तुम शत्रुके विपरीत गये हो ॥ ६४ ॥ कोश और दण्डके तेजरूपी प्रभावमें२ इन्द्रको नीचा दिखाने वाला है। इन्द्रको अपने कई शत्रुओंके विनाशके लिये पार्थिवोंकी सहायता लेनी पड़ी, पर यह राजा अकेला ही शत्रुविजय करता है। इसके आगे तो 'इन्द्र बापुरो रंक' है। (२) इन्द्रके तो सौ ही यज्ञ हैं; यह राजा तो अविच्छिन्न रूपसे यागपर याग किये जा रहा है; उनकी अभीसे इयत्ता कैसे बताई जाये । इन्द्र तो अधीनस्थोंके लिये आमन=रुजाकारक भी हो जाता है, पर यह राजा अपने अधीनस्थोंको आधिव्याधिसे मुक्त रखनेके कारण 'अनामन' है। उसे 'नामन' और 'अनाम' कहनेसे विरोध अलङ्कार है। यहाँ प्रथम पादकी दो बार (दूसरे और तीसरे पादोंके रूप में) अव्य- वहित आवृत्ति हुई है ॥ ६३ ॥ ८ (३. ii. क. २) द्वितीय-चतुर्थपादावृत्त प्रथमपादाभ्यास अव्यवहित- व्यवहित यमक—प्रकृत श्लोकमें कविने किसी राजाके समरशौर्यका वर्णन उपेन्द्रवज्रा (प्रथम, द्वितीय-चतुर्थ पादोंमें) और इन्द्रवज्रा (तृतीय पाद) की उपजातिमें निबद्ध किया है। बलवा (रणानाम्)—बलं चतुरङ्गिणीं सेनां वृणोति इति वा, वाति इति वा । रत्नश्री और वादी जी ने यहाँ (३. ii. क. ३) द्वितीयपादव्यवहित कर्मार्थक होनेके कारण यज्ञ (विशेष कर्म) अर्थमें रूढ हो गया । पुराणों में आकर यज्ञ करके इन्द्रपदप्राप्ति बताई गई और 'शतक्रतु' नाम इस प्रकार इन्द्रके लिये रूढ हो गया : अथादीक्षत राजा तु हयमेधशतेन सः ।... शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥... चरमेणाश्वमेधेन यजमाने यजुष्पतिम् । वैन्ये यज्ञपशुं स्पर्धन्नपोवाह तिरोहितः ॥ (श्रीमद्भागवत ४।१६।१,२,११) । निरुक्तके पाँच अध्याय, पृष्ठ २६५ भी देखें । १. अन्वयः—परं बल-वारणानां बल-वारणानां परायाः परम्परायाः धूलीः स्थलीः विधाय व्योम रुन्धन् रणानां बल-वाः परं पराऽयाः । २. स प्रतापः प्रभावश्च यत्तेजः कोशदण्डजम् । अमरकोष २।८।२०