काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।६३] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७५ ७ प्रभावतो नामन, वासवस्य प्रभावतोऽनामन, वाऽऽसवस्य । प्रभावतो नाम न वा सवस्य विच्छित्तिरासीत् त्वयि विष्टपस्य१ ।। ६३ ।। ७ हे तेजोदीप्त इन्द्रको तेजके या यज्ञके कारण नीचा दिखाने वाले तथा लोगोंको पीडासे मुक्ति दिलाने वाले (राजन्), तुम जब लोकके शासक हो, तब निश्चय ही सोमयागोंका (कभी) विच्छेद नहीं हुआ ।। ६३ ।। कर रही है, अपनेको सुखानेपर उतरी हुई है । 'तामरसे, तामरसेक्षणे' इन विशेषताओंसे युक्त सुन्दरियोंके सम्बोधनके एक वचन हैं । स्मरपर अनलका आरोप होनेसे रूपक है । कमल-कोमल-कायाके लिये प्रेम ही आग है । तुम्हारे इस मानने उसे हवा दे दी है : मान स्मराग्निका उद्दीपक हो गया है । तुम प्रेमज्वरसे अङ्गारेके समान दहक रही हो । पर हो तुम बड़ी हठीली ! प्रियके प्रति उद्दाम प्रेम, उसका अपराध, वसन्त, यौवन आदि सब उद्दीपनोंके एक साथ एकत्र उपस्थित हो जानेसे खूब फैला हुआ वह प्रेमाग्नि भी तुम्हारे धैर्य अथवा हठ, क्षण भरमें क्यों नहीं भङ्ग कर पा रहा है ? यही मुझे आश्चर्य है ! बावली, क्षणभरकी भी देर न कर । मान छोड़ । प्रियतमके सङ्गसुखसे कामज्वरकी पीड़ाको दूर कर । व्याख्याभेदके लिए वादी, तरुणवाचस्पति, रत्नेश्वर मिश्र प्रभृतिकी टीकायें देखें । यहाँ पूरे तृतीयपादकी आवृत्ति चतुर्थ पादके रूपमें की गई है । तृतीय- पादावृत्ति पादाभ्यास यमकका और भेद सम्भव नहीं है । श्लोकके अन्तमें आवृत्तिके कारण रुद्रटने इसे 'पुच्छ यमक' नाम दिया है ।। ६२ ।। ७ (३. ii. क. १) द्वितीय-तृतीय-पादावृत्त प्रथमपादाभ्यास अव्यपेत यमक— इस श्लोकमें कविने अपने वर्ण्य राजाको इन्द्रसे दो कारणोंसे अधिक बताया है : इन्द्र की प्रसिद्धि (१) वीरके रूपमें है; (२) शतक्रतुके रूपमें है कि सौ अश्वमेध यज्ञ करनेसे मनुष्य इन्द्र बन जाता है ।२ प्रकृत राजा (१) १. अन्वयः—प्रभाव-तः, न वा आसवस्य, प्रभा-वतः वासवस्य नामन, अना- मन, अतो नाम त्वयि विष्टपस्य प्रभौ न वा सवस्य विच्छित्तिः आसीत् । २. वेदमें इन्द्रका 'शत-क्रतु' नाम प्रसिद्ध है । वहाँ इसका अर्थ इष्ट था : शतं क्रतवः कर्माणि, धियः = सङ्कल्पा वा यस्य, स शतक्रतुः । हस्ते वज्रं भरति, शीर्षणि क्रतुम् (ऋ० २।१६।२), हृत्सु क्रतुं वरुणो, अप्स्वग्निं, दिवि सूर्यमदधात् सोममद्रौ (ऋ० ५।८५।२) । ब्राह्मण कालमें क्रतु