काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ काव्यादर्श [३।६१-६२ बिभर्ति भूमेर्वलयं भुजेन ते भुजङ्गमोऽमा स्मरतो मदञ्चितम् । शृणूक्तमेकं स्वमवेत्य भूधरं भुजङ्गमो मा स्म रतो मदञ्चितम् ॥ ६१ ॥ स्मरानलो मान-विवर्धितो यः, स निर्वृतिं ते किमपाकरोति ? समन्ततस्तामरसेक्षणे न समन्ततस्तामरसे क्षणेन ॥ ६२ ॥ ५ सर्प (शेषनाग) तुम्हारी भुजाके साथ (मिलकर) भूगोलको धारण करता है । (इस बातको) स्मरण करते हुए मुझसे एक अच्छी बात सुनो— एक (अकेली) अपनी भुजाको पृथिवीका धारक समझकर प्रसन्न हुए तुम प्रभूत गर्व मत करना ॥ ६१ ॥ ६ हे अपनेको म्लान करनेपर तुली हुई, कमलसदृश लोचनों वाली, तुम्हारा कामाग्नि (कामपीडा) मान करनेसे बढ़ गया है । सब तरफसे समान रूपसे (एक साथ) फैला हुआ वह क्षण भरमें तुम्हारे धैर्य (सुस्थिति) को क्यों नहीं दूर कर रहा है ? अर्थात् इस अवस्थाको प्राप्त करके भी तुम मान क्यों नहीं छोड़ रही ? ॥ ६२ ॥ ५ (३. i. ख. २) व्यवहित द्वितीयपादाभ्यास यमक—इस श्लोकमें कविने किसी राजाकी प्रशंसा व्याजस्तुतिसे की है । यहाँ द्वितीयपादकी आवृत्ति तृतीय पादके व्यवधानसे चौथे पादमें की गई है । रुद्रटने इसे 'सन्दष्टक' नाम दिया है । माघने इस यमकका प्रयोग बहुत किया है ॥ ६१ ॥ ६ (३. i. ग) तृतीयपादाभ्यास अव्यपेत यमक—प्रियतमके किसी अपराधपर अत्यन्त तनी हुई मानवती नायिकाके प्रति उसके प्रति हितैषी किसीका कथन उपेन्द्रवज्रा छन्दमें निबद्ध प्रकृत श्लोकमें कविने दिया है । रमणी अत्यन्त सुन्दर है । उसके नयन तामरस (तामरस = जल में रहने से कमल) के समान झूमने वाले हैं । अथवा ताम = चाहतके रससे सराबोर, प्रेमाल है । अथवा प्रियविरहके कारण उनका रस = पानी ताम = म्लान हो गया है, रोते-रोते सूख गया है । वह स्वयं भी तामरसा है : कमलका फूल है, उस जैसी कोमल तथा सुन्दर है । पर अब वह ताम = म्लानतामें रस अनुभव १. अन्वयः—भुजङ्गमः ते भुजेन अमा भूमेर्वलयं बिभर्ति । स्मरतः मत् अञ्चितमेकमुक्तं शृणु । स्वं भुजं भूधरम् अवेत्य रतः चितं मदं मा स्म गमः । २. अन्वयः—तामरसे, तामरसेक्षणे, यः स्मरानलः, मान-विवर्धितः समन्ततः समं ततः, स क्षणेन ते निर्वृतिं किं न अपाकरोति ?