भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।६०] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७३ ४ यशश्च ते दिक्षु रजश्च सैनिका वितन्वतेऽजोपम दंशिता युधा । वितन्वतेजोऽपमदं शितायुधा द्विषां च कुर्वन्ति कुलं तरस्विनः ॥६०॥ ४ हे अजन्मा (विष्णु) के समान, कवचधारी, तीखे आयुधों वाले अर्थात् शूर, शत्रुपंर तेजीसे झपटने वाले सैनिक युद्धके द्वारा दिशाओंमें तुम्हारा यश और धूल फैला रहे हैं । और शत्रुओंके कुल (खानदान अथवा समूह) को शरीर- रहित, तेजके अभावसे युक्त और नष्ट हुए गर्व वाला कर रहे हैं ॥ ६० ॥ पादके चौथे पादमें दुहराये वर्णसमुदायके मध्य दो (द्वितीय और तृतीय) पादोंका व्यवधान है। समूचे पादकी आवृत्ति होनेसे यह 'पादाभ्यास' यमक है। रत्नेश्वरमिश्रने (रत्नदर्पण २।१४४में) 'तनुमधि= शरीरमधिकृत्य' व्याख्या की है । पर शरीरवाची 'तनु' तो नित्यस्त्रीलिङ्ग है । अतः उचित नहीं है । रुद्रटने इस भेदको 'आवृत्तियमक' नाम दिया है ॥ ५६ ॥ ४ (३. i. ख. १) अव्यवहित द्वितीयपादाभ्यास यमक—इस श्लोकमें आचार्य कवि दण्डीने किसी राजाके सैनिकों द्वारा घमासान युद्धसे उसकी कीर्तिके विस्तार और शत्रुओंके प्राणपरित्याग और तेज और गर्वके नाशका वर्णन किया है। यहाँ घटनाओंका क्रम उचित नहीं है : पहले घमासान युद्धका, फिर शत्रुमरण और बच रहे शत्रुओंके तेजोनाश और मानभञ्जनका तथा फिर राजाकी कीर्तिका वर्णन उचित होता । वादी जङ्घालदेव और तरुण वाचस्पतिने 'तरस्विन्'का अर्थ 'वेगवान्' किया है। सैनिकोंके प्रसङ्गमें 'वेगवान्' अर्थकी अपेक्षा 'शूर' अर्थ अधिक उचित है । यहाँ द्वितीय पादकी आवृत्ति तृतीय पादमें की गई है । अतः अव्यपेत द्वितीयपादाभ्यास यमक है । रुद्रटने श्लोकके गर्भ (मध्य) में उपस्थितिके कारण इसे 'गर्भयमक' नाम दिया है ॥ ६० ॥ १. अन्वयः—अजोपम, दंशिताः, शितायुधाः, तरस्विनः सैनिकाः युधा दिक्षु ते यशश्च रजश्च वितन्वते । द्विषां कुलं च वि-तनु, अतेजः, अप-मदं च कुर्वन्ति । २. अमरकोष ३।३।१२८ : वेगि-शूरो तरस्विनौ । 'तरस्'का मूल अर्थ 'वेग' है । वेग विना बलके सम्भव नहीं है । अतः 'तरस्वान्', 'तरस्वी'का परिनिष्ठित अर्थ 'बलवान्' से होते-होते 'शूर' हो गया है । हैमकोष : तरो जवे बले । अमरकोष २।८।१०२ : द्रविणं तरः-सहो-बल-शौर्याणि, स्थाम, शुष्मं च ।। शक्तिः, पराक्रमप्राणौ ।