भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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७२ काव्यादर्श [३।५६ ३ कलङ्कमुक्तं तनु-मद्ध्य-नामिका स्तनद्वयी च त्वदृते न हन्त्यतः । न याति भूतं गणने भवन्मुखे कलङ्कमुक्तं तनुमद्वचनामिका¹ ॥५६॥ ३ मधुर वाणी, शरीरके मध्य भाग (कमर) को झुकाने (लचकाने) वाले अर्थात् पृथुल दोनों स्तन तुम्हें छोड़कर किसे नहीं घायल करते ? इसलिये आप जैसोंकी गिनतीमें अनामिका (चिटलीसे दूसरी अँगुली) कलङ्कसे रहित शरीरधारी भूतको नहीं पाती ॥ ५६ ॥ इस प्रकार देवसभा 'अ-बला' है । विभु = प्रभु इन्द्र, बृहस्पति आदि उसमें (उषित) रहते हैं, इसलिये देवसभा 'विभूषिता' है । 'अबला' की यह व्याख्या उचित नहीं है : इन्द्र-शत्रु 'बल' देवसभामें कभी रहा नहीं, जो कि देवसभाको अब उसके मरनेके बाद 'अविद्यमानबला = अबला' कहा जाये । देवसभामें अबलायें = अप्सरायें अलबत्ता रहतीं हैं । राजाको भी नगरियोंमें अबलाओंको विहार करानेको कहा है । इससे धरती की अबलाओंका स्वर्गकी अबलाओंसे सादृश्य व्यक्त होता है । यह एक अतिरिक्त काव्यसौन्दर्य है 'अबला = रमणी' व्याख्यामें, जो 'अबला = बलासुर- रहिता' व्याख्यामें नहीं है । आरोहि — आ + √रुह् + णिच्, कर्मणि लुङ्, प्रथम ए० व० । प्रथम वाक्य कर्मवाच्यमें है एवं द्वितीय कर्तृ वाच्यमें । वामनके अनुसार यहाँ मार्गभेदके कारण वैषम्य दोष है, जो शाब्द समता गुणका विपर्यय है² ॥ ५८ ॥ ३ (३. i. क. ३) चतुर्थपादवर्ती व्यवहित प्रथमपादाभ्यास यमक — इस श्लोक में किसी जितेन्द्रिय (कामजयी) महापुरुषकी अद्वितीयता बताई है । यहाँ प्रथम १. अन्वयः—कलम् उक्तं, तनु-मद्धचनामिका स्तनद्वयी च त्वदृते कं न हन्ति ? अतः हि अनामिका भवन्मुखे गणने कलङ्क-मुक्तं तनुमद् भूतं न याति । २. काव्यालङ्कारसूत्र ३।१।१२ : मार्गभेदः समता । वृत्ति : 'येन मार्गेणो- पक्रमस्तस्यात्याग' इत्यर्थः । ⋯ विपर्ययस्तु यथा — प्रसीद, चण्डि, त्यज मन्युमञ्जसा; जनस्तवायं पुरतः कृताञ्जलिः । किमर्थमुत्कम्पितपीवरस्तनद्वयं त्वया लुप्तविलासमास्यते ॥ यहाँ दो प्रकारका मार्गभेद है : (१) पूर्वार्धके तीनों वाक्य कर्तृ- वाच्यमें हैं; उत्तरार्धमें भाववाच्य है; (२) पूर्वार्धमें असमासा रचना है, उत्तरार्धमें दीर्घसमासा और अल्पसमासा । त्रिपुरहर भूपालने प्रथम मार्गभेद माना है, अभिनवगुप्तने द्वितीय ।