काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।५७-५८] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७१ ३.१ नमन्दयावर्जितमानसात्मया न मन्दयाऽऽवर्जित-मान-सात्मया । उरस्युपास्तीर्णपयोधरद्वयं मया समालिङ्ग्यत जीवितेश्वरः१ ।।५७।। २. सभासुराणामबलाविभूषिता गुणैस्तवारोहि मृणालनिर्मलैः । सभासुराणामबलाविभूषिता विहारयन्निर्वश सम्पदः पुराम्२ ।।५८।। ३. १ दयासे रहित (कठोर) हृदय वाली, अभागिन (या मन्दबुद्धि), अपनाए हुए मानसे एकाकार बनी हुई मेरे द्वारा झुकता हुआ (अपराधकी क्षमा माँगता हुआ) प्राणेश्वर (उसके) वक्षस्थलपर दोनों पयोधरोंको (दबाकर) फैलाते हुए आलिङ्गित नहीं किया गया ।। ५७ ।। २ तुम्हारे कमलनालके समान शुभ्र गुणोंके द्वारा रमणियों (अप्सराओं) से विभूषित देवताओंकी सभा आरूढ हुई है । इस प्रकारके तुम अलङ्कृत रमणियोंको विहार कराते हुए शोभासम्पन्न शत्रुओंसे विजित नगरियोंकी सम्पदाओंका भोग करो ।। ५८ ।। १. (३. i. क १) अव्यपेत, द्वितीयपादवर्ती, प्रथमपादाभ्यास यमक—कोई मानवती नायिका अपराध क्षमा करानेके लिये अवनत अपने प्रियतमके प्रति मान रखे रहनेपर पछता रही है । यहाँ पूरा प्रथम पाद द्वितीय पादमें दुहराया गया है । अतः यहाँ अव्यपेत पादाभ्यास यमक है । कविने विप्रलम्भरतिकी अभिव्यक्तिके लिये वंशस्थ छन्दका प्रयोग किया है । 'उपास्तीर्ण-पयोधर- द्वयम्' क्रियाविशेषण है । इस समस्त पदकी उपसर्जनीभूत 'उपास्तीर्ण' क्रिया (समुदायके अवयव) से 'उरस्' का आधाराधेय भाव सम्बन्ध समुदायके माध्यमसे है ।३ ५७-६१ श्लोक वंशस्थ छन्दमें निबद्ध हैं ।। ५७ ।। २. (३. i. क २) तृतीयपादवर्ती व्यवहित प्रथमपादाभ्यास यमक—इस श्लोकमें कविने किसी राजाकी प्रशंसा करते हुए उसे आशीः दी है । प्रथम पादके 'अबला विभूषिता' पदोंकी व्याख्या वादीजी, तरुणवाचस्पति और रत्नेश्वर मिश्रने यों की है : जिसमें 'बल' नामक दानव विद्यमान नहीं है, क्योंकि उसे इन्द्रने मार डाला था, इसलिये इन्द्र 'बलभिद्' कहे जाते हैं । १. अन्वयः—दया-वर्जित-मानसात्मया, मन्दयाऽऽवर्जित-मान-सात्मया मया नमन् जीवितेश्वरः उरस्युपास्तीर्ण-पयोधरद्वयं न समालिङ्ग्यत । २. अन्वयः—मृणाल-निर्मलैस्तव गुणैः अबला-विभूषिता सुराणां सभा आरोहि । स विभूषिता अबला विहारयन्भासुराणां पुरां सम्पदः निर्विश । ३. २६वें श्लोकमें 'अलेः समकेशं ते' पर टीका, पृष्ठ ४०, देखें ।