काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० काव्यदर्श [ ३।५६ भागमनपर समाप्त हो जाती हैं। मतभेद 'मयूरोंके विगमको पहले कहा जाये, या हंसोंके आगमनको', इसपर हो सकता है। हंसोंके आगमनकी पूर्वता पीछे २।३३२ में बताई जा चुकी है। कलापिनां च आरुतयः पदच्छेद अभीष्ट¹ होनेके कारण 'च' वाले वाक्यका क्रम (स्थान) दूसरा ही उचित है : हंस आए, मयूर गये ।। ५६ ।। तिरपनवेँ श्लोकके उत्तरार्धमें प्रोक्त (३) पादाभ्यास यमकके— (i) एक पादकी एक बार आवृत्तिसे छह भेद होते हैं : (क) प्रथम पादकी (१) द्वितीय पादमें, (२) तृतीय पादमें और (३) चतुर्थ पादमें एक बार आवृत्ति से तीन भेद होते हैं; (ख) द्वितीय पादकी (१) तृतीय और (२) चतुर्थ पादमें एक बार आवृत्तिसे दो भेद होते हैं; (ग) तृतीय पादकी चतुर्थ पादमें आवृत्तिसे एक भेद होता है । इनमें से तीन (क १, ख १, ग १) यमक अव्यपेत होते हैं और शेष तीन व्यपेत होते हैं । इन छह भेदोंके उदाहरण ५७-६२ श्लोकोंमें दिये हैं । (ii) एक पादकी दो बार आवृत्ति से चार भेद बनते हैं : (क) प्रथम पादकी (१) द्वितीय-तृतीय पादोंमें आवृत्तिसे अव्यपेत, (२) द्वितीय, चतुर्थ पादोंमें आवृत्तिसे व्यपेत, (३) तृतीय-चतुर्थ पादोंमें आवृत्तिसे अव्यपेत, कुल तीन तथा (ख) द्वितीय पादकी तृतीय, चतुर्थ पादोंमें² आवृत्तिसे एक अव्यपेत । (क १-२, खके) उदाहरण ६३-६५ में दिए हैं । (iii) एक (प्रथम) पाद की तीन बार आवृत्तिसे एक अव्यपेत चतुष्पाद यमक भेद होता है। उदाहरण ६६वेँ श्लोकमें दिया है । अन्तिम भेदको (५) महायमक भी कहते हैं (श्लोक ७०) । जो दो प्रकारका होता है : (१) समूचे पादमें एक ही वर्णसमुदाय होता है, जो शेष तीन पादोंमें दुहराया जाता है । (२) इससे भी उत्कृष्ट एकाकार चतुष्पाद यमक वह होता है, जिसके प्रथम पादमें भी वर्णसमुदायकी आवृत्ति की होती है । इस प्रकार आवृत्तियुक्त पादकी तीन बार आवृत्ति करनेसे अत्युत्कृष्ट त्रिवाराभ्यास पादावृत्ति यमक निष्पन्न होता है । इसका प्रदर्शन ७१वें श्लोक में किया है ।। १. 'च' से युक्त परवर्ती होता है । अतः 'चारुतया' छेदके अनन्तर 'कला- पिनां च आरुतयः' कहना उचित है । २. तरुण वाचस्पतिने ६५वें श्लोककी व्याख्यामें इसे 'त्रिपादावृत्ति' कहा है । पर वहाँ आवृत्त पाद एक है और आवृत्तियाँ दो हैं । अतः इसे 'पादका द्विरभ्यास' कहना उचित है । 'त्रिपादावृत्ति' कहना उचित नहीं है ।