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काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

३७०] १. यमकके विशिष्ट भेद : (५) महायमक ८१ दृष्टिसे एक ही आकार वाला है । इस भेदको काव्यशास्त्री 'महायमक' कहते हैं । आवृत्त होने वाले एक ही पादमें अव्यपेत या व्यपेत प्रकारकी एक बार या अधिक बार आदि, मध्यादि स्थानोंमें आवृत्ति करके इस एकाकार चतुष्पादरूपी महायमकको और भी उत्कृष्ट बनाया जा सकता है । इस प्रकार महायमकके दो प्रकार हैं : (१) एक पादकी तीन बार आवृत्तिसे युक्त सादा चतुष्पाद यमक; (२) आवृत्त होने वाले पादमें भी पादांशकी आवृत्ति होती है । यह दूसरा भेद अत्युत्कृष्ट यमक होता है । महाकवियोंने प्रथम प्रकारके यमकका तो इक्का-दुक्का प्रयोग किया है,१ पर दूसरे भेदका प्रयोग हमें सुलभ नहीं हुआ । भरतमें भी 'चतुर्व्यवसित' नाम से और रुद्रटने 'पङ्क्ति' नामसे अभिहित इस महायमकके प्रथम प्रकारपर लागू होने वाला उदाहरण ही दिया है ।२ महाराज भोजने एकाकार चतुष्पाद यमक और श्लोकाभ्यास यमकको 'महायमक' नाम दिया है ।३ श्लोकाभ्यास यमक को 'महायमक' बतानेमें भोजका मत दण्डीसे पृथक् है । एकाकार चतुष्पाद यमकमें भोजने पादको पुनः अभ्यासके योग्य भी बताया है । इस अंशमें भोजने दण्डीका अनुकरण किया है । उनके आशयको विस्पष्ट रूपसे प्रस्तुत किया है रत्नेश्वर मिश्रने : एकाकारता दो प्रकारसे होती है—(१) चार आवृत्तियोंसे, (२) आठ (अर्थात् पादार्धोंकी) आवृत्तियों से ।४ उत्कृष्ट १. किरातार्जुनीय १५।१२ : विकाशमीयुर्जंगतीशमार्गणाः । भट्टिकाव्य १०।१६ : सर्वयमकम्—बभौ मरुत्वान् विकृतः समुद्रः । २. सर्वे पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः । 'चतुर्व्यवसितं' नाम विज्ञेयं तद् बुधैर्यथा ।। नाट्य० १६।८२; ८३ : सावारणानामयमेव कालः...।। काव्यालङ्कार ३।१२ : सभाजनेनोपरि पूरितासो ...।। ३. एकाकारं चतुष्पादं महायमकमुच्यते । श्लोकाभ्यासश्च, तत्राद्यं पुनरभ्यासमर्हति ।। सरस्वती० २।६७ ४. द्विविधमेकाकारं भवति—(१) एकमावृत्तिचतुष्केण, (२) अपरमावृत्त्यष्ट- केन । तदिदमुक्तम्—'आद्यं पुनरनावृत्तम्'* इति । प्रतिपादमवान्तरा- वृत्तिभेदेनैवाष्टकनिर्वाहात् । * यहाँ 'अनावृत्तं' से मूलविरोधी तथा भोजके चतुर्थपादके अनुकूल सप्तम अक्षरके लघु न होनेके कारण भोजोक्तिको उद्धृत नहीं किया गया है । अपितु यह अपने 'एकं०' कथन का स्पष्टीकरण है कि इस प्रथम भेदमें अवान्तर आवृत्ति नहीं होती ।

८२ काव्यादर्श [३७१ स-मानयाऽसमानयाऽसमानयासमानया । समान-यास-मानया समानयासमानया ॥ ७१ ॥ मानवती, अनुपम, असम (विषम कामदेव) की अनीतिके कारण विषम (सङ्कटापन्न) प्राणों वाली (अर्थात् विप्रलम्भके कारण अत्यन्त कष्टावस्थाको प्राप्त), समान कामजन्य खेद और मान वाली इस प्रियासे मुझे मिला दे हे मेरे ऐसे अद्भुत (मित्र) ॥ ७१ ॥ महायमक (एकाकार चतुष्पाद यमक) का उदाहरण भोजने दण्डी वाला (७१वाँ श्लोक) ही दिया है । भट्टिके व्याख्याता जयमङ्गलने एकाकार चतुष्पाद यमक (प्रथम भेद) को 'सर्वयमक' कहा है तथा श्लोकाभ्यास यमक को 'महायमक' ।१ स्पष्ट ही यह भोजानुसृत परम्पराके अनुकूल है । रत्नश्रीज्ञानने एक पादकी तीन बार आवृत्ति वाले पादाभ्यास यमकसे आन्तरिक आवृत्तिसे निष्पन्न एकाकार पादकी तीन बार आवृत्तिसे सम्पन्न चतुष्पाद महायमकको पादके भीतरकी आवृत्तिके कारण भिन्न माना है ।२ अर्थात् वे इन दोनोंको पृथक्-पृथक् मानते हैं । तरुण वाचस्पतिने एकाकार चतुष्पाद यमकके ऊपर बताये प्रथम भेदको 'महायमक' माना है और आवृत्ति- गर्भित पादकी तीन बार आवृत्ति (अर्थात् आठ पादार्धों) वाले यमकको 'पर यमक' माना है । इन सबमें भोज और रत्नेश्वर मिश्रकी व्याख्या ही युक्तियुक्त है ॥७०॥ (३. iii. २) आवृत्तिगर्भित महायमक—प्रकृत श्लोकमें किसी पुरुषकी रूठी हुई प्रियाके प्रति विप्रलम्भरतिका चित्रण किया गया है । वर्ण्य पुरुषने उसे अत्यन्त प्रेम करने वाली इसलिये विरहकृश किन्तु प्रियकी किसी गलती पर मानकरके बैठी हुई प्रियाको मनाकर उससे मिलानेकी प्रार्थना अपने किसी नर्मसचिव मित्रसे की है । १. जयमङ्गला १०।१६ : 'सर्वयमकम्' इति चतुर्णामपि पादानां सदृशत्वात् । २०-२१ : 'महायमकम्' इति श्लोकस्यैकस्य द्वितीयेन श्लोकेन यमित- त्वात् । २. रत्नश्री २।७० : एकाकार-चतुष्पादत्वं प्रत्येकं सर्वतो यमक-योगाद् विनाऽभ्यासादपि सम्भवतीत्याह—'तस्यापि' इत्यादि । तस्यापि = महायमकस्यापि न केवलं समूहादेः, अभ्यासः त्रिपादावृत्तिर्दृश्यते ।...अत एवेदं त्रिपादाभ्यासाद् भिद्यते । तत्र प्रत्येकं पादेषु सर्वतो यमकाभावात् केवलं पाद-यमक-मात्रं त्रिरभ्यस्यते ।

३७२] १. यमकके विशिष्ट भेद : (६) यमक-सङ्कर ८३ ६. धराधराकारधरा धराभुजाम्भुजा महीं पातुमहीनविक्रमाः । क्रमात् सहन्ते सहसा हतारयो रयोद्धुरा मानधुरा वलम्बिनः १ ॥७२॥ ६. पृथ्वीको धारण करने वाले (शेष नाग) का आकार धारण करने वाली, हीनसे इतर (श्रेष्ठ) पराक्रमसे युक्त, बलसे अथवा वेगसे शत्रुओंको नष्ट कर चुकी, वेगसे अग्रगामी, मानरूपी धुरी वाली, (लोगों के लिये) आश्रय वाली पृथ्वीपतियोंकी भुजाएँ पृथ्वीकी रक्षा शास्त्रोचित मार्गसे करनेमें समर्थ हैं ॥ ७२ ॥ यहाँ प्रथमपादकी अव्यपेत आवृत्ति अगले तीन पादोंमें की गई है । इस- लिये यह त्रिरावृत्त प्रथम पादाभ्यास अव्यपेत यमक है । आवृत्त पादके आठ अक्षरोंमें भी चार वर्णों (अक्षरों) 'समानया' की एक बार अव्यवहित आवृत्ति हुई है । इस कारण यह साधारण महायमकसे उत्कृष्ट है । त्रिरावृत्त पादाभ्यास यमकका ही दूसरा नाम 'महायमक' है । पादके आदिम दो अक्षरों 'समा' को पादके मध्यमें व्यपेत आवृत्ति है । पादमध्यगत 'नया' की पादान्तमें व्यपेत आवृत्ति है। पादादिगत चार अक्षरों 'समानया' की पादान्तमें अव्यपेत आवृत्ति है । इस प्रकार सारे श्लोकमें 'व्यपेताव्यपेतयमक' स्थित है। इस अव्यपेतव्यपेतावृत्तिगर्भित महायमककी रचना शब्द-शिल्पी कवि कलाकारोंके लिये एक दुष्कर चुनौती है । दण्डीने इस चुनौतीका सरस उत्तर इस उदाहरणसे सफलतापूर्वक दिया है । महाराज भोजने भी इस उदाहरणसे ही काम चलाया है ॥ ७१ ॥ (६) यमक-सङ्कर—प्रकृत श्लोकमें कविने पृथ्वीकी रक्षा करनेमें समर्थ भुजाओंकी विशेषता बताकर उत्साहका उद्दीपन विभाव प्रस्तुत किया है । कविने वीरोंकी भुजाओंका वर्णन स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर जाते हुए किया है : पहले भुजाओंका स्थूल आकार बताया है कि वे पृथ्वीको धारण करने वाले का आकार धारण करती हैं । अर्थात् इन्हें देखनेसे ही लगता है कि ये धरा- धारणसमर्थ हैं । 'धराधर' का दूसरा अर्थ है : शेष नाग । उसका आकार है स्थूल एवं लम्बा । भुजाएँ भी स्थूल एवं लम्बी हैं । इस विशेषणमें श्लेष और लुप्तोपमा है । भुजाओंके स्थूल आकारको देखनेके बाद 'अहीनविक्रमाः' से उनकी पराक्रमशालिताकी प्रतीति बताई है : ये भुजाएँ अत्यन्त पराक्रमी हैं । इनका पराक्रम शत्रुओंके विनाशसे सिद्ध हो चुका है । युद्धस्थलमें शत्रुओंपर १. तरुण० : विक्रमात् । वादी : धीरधुराव लम्बिनः ।

८४ काव्यदर्श [३।७२ लपालप चलने वाली भुजाएं जैसे मानको वहन करने वाला अक्षदण्ड हैं । लोगोंको इनका बड़ा सहारा मिलता है। निश्चय ही धराका भोग (पालन और सुखलाभ) करने वाले लोगोंकी भुजायें ऐसी होती हैं । यहाँ (१) 'धरा' शब्दकी आवृत्ति प्रथम पादके आदिमें और (२) मध्यमें अव्यवहित रूपसे दो बार हुई है । (३) 'धराधरा' की व्यवहित रूपसे हुई है। (४) प्रथमपादान्तके 'भुजाम्' की, द्वितीय पादान्तके 'क्षमा' की, तृतीयपादान्तके 'श्यो' की अगले पादोंके आदिमें अव्यपेत आवृत्तिसे भरतका 'चक्रवाल' तथा दण्डीका 'सन्दष्ट' यमक (द्र० श्लोक ५१-५२) निष्पन्न हुआ है । (५) द्वितीय पादके मध्यमें स्थित 'मही' की मध्यमें ही दो अक्षरोंके व्यवधानसे आवृत्तिसे पादमध्य व्यपेत यमक है । (६) तृतीय पादके प्रथम भागके अन्तमें स्थित 'सह' की मध्य भागमें एकाक्षर व्यवहित आवृत्ति है, तथा यदि ह्रस्व, दीर्घमें वर्णभेद न मानें, तो (७) मध्यके 'सह' की पादान्तके आदिमें 'साह' के रूपमें अव्यवहित आवृत्ति है । (८) चतुर्थ पादके आदिभागके अन्तकी ओर स्थित 'धुरा' की पादमध्यमें अक्षरद्वयव्यवहित आवृत्तिसे आदि- मध्य व्यवहित यमक है । इस प्रकार यहाँ एक पद्यमें ८ यमकोंका मिश्रण है । इनमेंसे १-३ में परस्परोपकार्योपकारक भाव सम्बन्धसे अङ्गाङ्गिभाव सङ्कर है । ६-७ में निरपेक्षता है । चारों पादोंमें वर्तमान होनेसे ४ सन्दष्ट यमक सबमें चारुत्वकी दृष्टिसे मुख्य है । शेष यमक परस्परसङ्कीर्ण और परस्पर तुल्यबल हैं । अतः श्लोकमें अधिक प्रभाव सङ्कीर्ण और असङ्कीर्ण यमकोंकी संसृष्टिका है । इस प्रकार यह श्लोक तृतीय श्लोकोक्त सम्भेदयोनि यमकोंका उदाहरण है । मानधुरा वलम्बिनः—मानस्य धुरः = मानधुराः, मान+धुर्+अ (समासान्त) १+टाप्, प्रथमा बहुवचन । भुजाओंपर मानधुराओंका आरोप है । 'धुर्' नित्य स्त्रीलिङ्ग है, अतः 'मानधुराः' भी स्त्रीलिङ्ग है । उपमेय 'भुज' स्त्री-पुं-लिङ्ग है : भुजा, भुज ।२ 'अव' के आदिम 'अ' का भागुरिके मत में लोप होनेसे 'वलम्बिनः' है । अन्य लोगोंने 'मानधुरावलम्बिनः' को समस्त पद माना है । पर इससे अर्थमें कोई विशेष शोभा नहीं आती । दोनोंको पृथक् करनेसे 'भुजा मानधुरा' रूपक या वाचकलुप्ता उत्प्रेक्षा निष्पन्न हो १. अष्टाध्यायी ५।४।७४ : ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे । २. अमरकोष २।६।७६-८० : द्वौ परौ द्वयोः ॥ भुजबाहू, प्रवेष्टो, दोः स्यात् । मेदिनी ८।१२-१३ : अथो भुजा ।। द्वयोर्बाहौ करे ।

३।७३] १. यमकके विशिष्ट भेद : (७) प्रतिलोम यमक ८५ ७. आवृत्तिः प्रातिलोम्येन पादार्ध-श्लोक-गोचरा । यमकं प्रतिलोमत्वात् प्रतिलोममिति स्मृतम् ॥ ७३ ॥ ७. (पद्यके १) पाद, (२) अर्धाली एवं (३ पूरे) पद्यको विषय बनाने वाली उलटे क्रमसे (वर्णोंकी) आवृत्ति प्रतिलोम (उलटा) होनेके कारण 'प्रतिलोम' कहलाती है ॥ ७३ ॥ जाती है तथा भुजाओंका आश्रयदातृत्व गुण अतिरिक्त कहा जाता है । नित्य- स्त्रीलिङ्ग पदका उपमेय किसी भी लिङ्गका पद हो सकता है । अतः 'भुजाः' पुँल्लिङ्ग भी हो सकता है । अथवा '०धुराः' के स्त्रीलिङ्ग विशेष्य और 'वलम्बितः' के पुँल्लिङ्ग विशेष्यके रूपमें 'भुजाः' को 'भुजा' और भुजाओं' का एकशेष मानकर दोनोंसे अन्वित किया जा सकता है । अथवा रुद्रटोक्त लिङ्गश्लेष भी हो सकता है ॥ ७२ ॥ ७. प्रतिलोम यमक—पीछेके उदाहरणोंमें दिये यमकोंमें वर्णोंकी आवृत्ति अनुलोम क्रमसे होती है । इस दृष्टिसे वे सब अनुलोमयमक हैं । इनके विपरीत जब पद्यके वर्णसमुदायकी प्रतिलोम (उलटे) क्रमसे आवृत्ति की जाती है, तब यह प्रतिलोम यमक होता है । यह आवृत्ति (क) पद्यके सबसे छोटे अंश पादसे लेकर (ख) पद्यके अर्ध तथा (ग) पूरे श्लोकमें व्याप्त होती है । अतः यह यमक (क) पादप्रतिलोम (ख) पद्यार्धप्रतिलोम और (ग) श्लोकप्रति- लोम यमक नामक तीन भेदोंमें निष्पन्न होता है । स्पष्ट है कि यह यमक दुष्कर होता है । विशुद्ध तकनीकी दृष्टिसे यदि देखा जाये, तो प्रतिलोम यमकके भी पदके (i) अन्त, (ii) मध्य और (iii) आदि प्रभृति स्थानोंमें प्रतिलोम आवृत्तिसे यमक निष्पन्न हो सकते हैं । पर वे उतने हृदयावर्जक नहीं होंगे । अतः लगता है दण्डीने उन्हें नहीं बताया है । महाकवि भारवि और माघने तीनों प्रकारके प्रतिलोम यमकोंका प्रयोग किया है । प्रतिलोम यमकका इतिहास— यह भरतमें उपलब्ध नहीं है । पादादि प्रभृति स्थानोंमें शब्दका अभ्यास अनुलोम होना चाहिये, या प्रतिलोम, यह यद्यपि भरतके लक्षणमें उक्त नहीं है, तथापि उन्होंने यमकके सब दश भेदोंके उदाहरण अनुलोम आवृत्तिके ही दिये हैं, प्रतिलोम आवृत्तिका एक भी स्थल नहीं है । इससे सिद्ध होता है कि भरतको प्रतिलोम यमक अभीष्ट नहीं हैं । भामहने यमकके भेदोंमें प्रतिलोमका विधान तो किया ही नहीं है, वे काव्यमें दुष्कर अलङ्कारोंके अत्यन्त विरोधी हैं । अतः न केवल प्रतिलोम यमक, अपितु चित्रबन्धोंके समर्थनकी आशा भामहसे नहीं है ।

८६ काव्यादर्श [३।७३ उपलब्ध काव्यशास्त्रियोंमें दण्डी ही प्रथम आचार्य हैं, जिन्होंने नानाविध दुष्कर अलङ्कारोंका सुन्दर, व्यवस्थित और परिमार्जित निरूपण इन्हें अलङ्कार की सम्भव गरिमा प्रदान करते हुए किया है । काव्यशरीरमें शब्दालङ्कारोंको महत्त्व देकर संस्कृत काव्यमें पच्चीकारी को कलाके स्तरकी ओर उन्मुख करने वाले महाकवियोंमें भारवि, माघ और भट्टिके नाम उल्लेख्य हैं : भारविने (१) न केवल दुष्कर यमकोंका पर्याप्त प्रयोग किया है, अपितु (२) प्रतिलोम यमकके भी तीनों भेदोंका सुन्दर प्रयोग किया है ।१ इससे प्रतीत होता है कि भारविसे पूर्वके महाकवियों और काव्य- शास्त्रियोंमें यमकके ये भेद प्रसिद्ध हो चुके थे । दण्डीने उनका प्रसिद्ध स्वरूप ही निरूपित किया है । (३) भारविने विविध प्रकारके दुष्कर बन्धोंका तथा एकाक्षर, द्वयक्षर, और अतालव्यादि दुष्कर श्लोकोंका भी प्रणयन किया है ।२ भारवि इस पच्चीकारीके ज्ञात प्रथम कलाकार महाकवि हैं । माघ तो उनके नक़लची हैं । भारवि और माघने (१) यमकों, चित्रबन्धों और एकाक्ष- रादिका प्रणयन एक ही प्रकरणमें मिश्रित रूपमें किया है ।३ (२) माघ तक १. (क) वेत्रशाककुजे शैलेऽलेशैजेऽकुकशात्रवे । यात किं विदिशो जेतुं तुब्जेशो दिवि किं तया ।। किराता०१५।१८ (ख) ननु हो मथना राघो घोरा नाथमहो नु न । तयदातवदा भीमा माभीदा बत दायत ॥ २० (ग) निशितासिरतोऽभीको न्येजतेऽमरणा रुचा । सारतो न विरोधी नः स्वाभासो भरवानुत ॥ २२ तनुवारभसो भास्वानधीरोऽविनतोरसा । चारुणा रमते जन्ये कोऽभीतो रसिताशिनि ॥ २३ २. किरातार्जुनीय, एकाक्षर पाद १५।५, एकाक्षर श्लोक १४, द्वयक्षर श्लोक ३८, निरोष्ठ्य श्लोक ७, २६, आद्यन्तयमक ३७, पादादियमक १०, पादाद्यन्तयमक ३१, पादान्तादियमक ८, द्वि-चतुर्थपादयमक ३५, शृङ्खलायमक ४२, समुद्गयमक १६, महायमक ५२, पादप्रतिलोम १८, अर्धप्रतिलोम २०, श्लोकप्रतिलोम २२-२३, गूढचतुर्थपाद ४, अर्थ- त्रयवाचक ४५, गोमूत्रिकाबन्ध १२, सर्वतोभद्र २५, अर्धभ्रमरक २७ । ३. शिशुपालवध एकाक्षरपाद १६।३, द्वि-चतुर्थपादाभ्यास यमक ५, १७, १६, २१, २५, ३१, ३८, ४२, ४८, ५०, ५२, ५४, ५६, ६४, ७४, ७६ ७८, ८०, ८२, निरोष्ठ्य श्लोक ११, सन्दंशयमक १३, विषमपादादि-

३७३] १. यमकके विशिष्ट भेद : (७) प्रतिलोम यमकका इतिहास ८७ आते-आते इन अलङ्कारोंमें तुलनात्मक उत्तमाधमत्वकी दिशा निर्धारित हो चुकी थी : उन्होंने चित्रबन्धोंको सर्वाधिक विषम (काव्यको दुरूह बनाने वाला) बताया है।¹ माघके इस कथनका एक फलितार्थ और भी है : वे आनन्दमात्र प्रयोजन वाले काव्यमें दुष्कर विधानसे विषमता लाना उचित नहीं समझते । भले ही भारविकी प्रतिद्वन्द्वितामें उन्होंने अपने ही काव्यको विषम बनानेसे बचनेका प्रयास नहीं किया : अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता । महाकवि भट्टिने अपने महाकाव्य 'रामचरित' के दशम सर्गमें अनुप्रास और यमक शब्दालङ्कारों तथा दीपक आदि अर्थालङ्कारोंका प्रशस्त प्रदर्शन किया है । उसमें उन्होंने (१) यमकके २० भेदोंके उदाहरण दिये हैं, जो भरत और भामहके भेदोंसे अधिक एवं भिन्न प्रकारके हैं, किन्तु दण्डीकी चिन्तनपरम्पराके अनुकूल हैं।² (२) भट्टि दुष्करतामें एकाकार चतुष्पाद, समपादान्त यमक २३, सर्वतोभद्रबन्ध २७, मुरजबन्ध २६, श्लोक प्रति- लोम ३३-३४, ६० पादादि व्यपेत यमक ३६, पादप्रतिलोम ४०, अर्धप्रतिलोम ४४, ८८, गोमूत्रिकाबन्ध ४६, समुद्गयमक ५८, ११८, प्रथम-तृतीय-पादादि यमक ६०, सजातीय चतुष्पादाद्यन्तादि व्यपेत यमक ६२, द्व्यक्षर श्लोक, ६६, ८४, ८६, ९४, ९८, १००, १०२, १०४, १०६, १०८, अर्धभ्रमक ७२, विषमान्त समान्त यमक ६२, गूढ चतुर्थपाद ६६, अतालव्य श्लोक ११०, विषमपादमध्य समपादान्त सजातीय यमक ११२, एकाक्षर श्लोक ११४, अर्थत्रयवाची ११६, चक्रबन्ध १२० । १. विषमं सर्वतोभद्र-चक्र-गोमूत्रिकाऽऽदिभिः । श्लोकैरिव महाकाव्यं व्यूहैस्तदभवद् बलम् ।। माघ १६।४१ २. भट्टिकाव्य, विषमपाद यमक १०।१०, समपाद यमक २, पादान्त अव्यपेत चतुष्पाद्यमक ३, पादादि अव्यपेत चतुष्पादयमक ४, पादमध्याव्यपेत चतुष्पाद यमक ५, चक्रवाल यमक ६, समुद्ग ७, काञ्ची ८, यमकावली (अव्यपेत आदियमक अन्त्यमक माला) ९, पादाद्यन्त विजातीय चतुष्पाद यमक ११, तृतीय चतुर्थ पाद (जयमङ्गल — मिथुन-) यमक १२, चतुष्पादादि (वृन्त) यमक १३, चतुष्पादान्त सजातीय (पुष्प-) यमक १४, एकपादादि-मध्य-व्यपेत विजातीय १५, प्रथम चतुर्थपादाभ्यास १६, एकपादमध्यान्त यमक १७, द्वि-तृतीयपादाभ्यास (गर्भ) यमक १८, महायमक (सादा) १९, श्लोकाभ्यास २०-२१, प्रथम पादादि अव्यपेत चतुर्थपादान्त अव्यपेत विजातीय यमक २२ ।

८८ काव्यादर्श [३७३ अपरनाम महायमक, के सादे भेद श्लोकाभ्यास यमकसे आगे नहीं बढ़े हैं।¹ (३) प्रतिलोम, गत-प्रत्यागत प्रकारकी आवृत्तियाँ उन्होंने नहीं दी हैं। (४) उन्होंने चित्रबन्ध तो दिये ही नहीं हैं। इससे प्रतीत होता है कि शास्त्र- काव्यप्रणयन प्रयोजन होनेसे व्याकरणज्ञानकी अत्यन्त अपेक्षाके कारण व्याख्यागम्य काव्य लिखते हुए भी महाकवि भट्टि निबन्धनकी दृष्टिसे काव्य को व्याख्यागम्य बनाना उचित नहीं समझते थे। इस विषयमें दण्डीका चिन्तन बिल्कुल स्पष्ट एवं युक्तियुक्त है : (१) वे यमकको एकान्तमधुर नहीं मानते, यह पीछे (१।६१, पृष्ठ १२४में) कहा जा चुका है। (२) उन्होंने सुकर, दुष्कर यमकों और चित्रबन्धोंको न केवल आन्तरिक क्रमिक विकासके साथ प्रस्तुत किया है, अपितु यमक और चित्र- बन्धोंके पौर्वापर्यसे भी इनका आपेक्षिक वैषम्य सूचित किया है। अर्थात् दण्डी शब्दालङ्कारोंमें (१) अनुप्रासको माधुर्यकारक मानते हैं; (२) सुकर यमक भी काव्यमें माधुर्यकी पुष्टि करता है; (३) दुष्कर यमक जितना दुष्कर होता है, काव्यमें माधुर्यका उतना विघातक होता है, (४) चित्रबन्ध तो काव्यमें वैषम्यकारक ही होते हैं। आचार्य रुद्रटने इस दिशामें चिन्तनका विकास यों किया है : (१) उन्होंने 'यमक' के अन्तर्गत अनुलोम वर्णावृत्ति ही ली है।² प्रतिलोम आवृत्ति को उन्होंने चित्रबन्धोंमें सम्मिलित किया है।³ (२) दण्डीको केवल अव्यपेत प्रतिलोम आवृत्ति अभीष्ट है, यह उनके (७४-७७) उदाहरणोंसे स्पष्ट है। १. बभौ मरुत्वान् विकृतः समुद्रो...॥ भट्टिकाव्य १०।१६ अभियाता वरं तुङ्गं भूभृतं रुचिरं पुरः। कर्कशं प्रथितं धाम ससत्त्वं पुष्करेक्षणम् ॥ २०-२१ २. तुल्य-श्रुति-क्रमाणांमन्यार्थानां मिथस्तु वर्णानाम् । पुनरावृत्तिर्यमकं, प्रायश्छन्दांसि विषयोऽस्य ॥ काव्याल० ३।१ नमिसाधुटीका : 'क्रम'-ग्रहणात् प्रतिलोमानुलोम-सर्वतोभद्रानुप्रासादीनां यमकत्वनिरासः । न हि तेषु तुल्य-श्रुति-सद्भावेऽपि तुल्य-क्रमो विद्यते । ३. भङ्ग्यन्तरकृततत्क्रमवर्णनिमित्तानि वस्तुरूपाणि । साङ्गानि विचित्राणि च रच्यन्ते यत्र, तच्चित्रम् ।। काव्याल ० ५।१ तच्चक्रखङ्ग... अनुलोमप्रतिलोमैरर्धभ्रममुरजसर्वतोभद्रैः । २-३ ...भेदैर्विभिद्यमानं सङ्ख्यातुमनन्तमस्मि नैतदलम् । ४

३।७३ ] १ यमकके विशिष्ट भेद : (७) प्रतिलोमयमकका इतिहास ८६ पर रुद्रटने व्यपेत प्रतिलोम आवृत्ति का उदाहरण दिया है।१ (३) काव्यमें यमक औचित्य और सुबोधता होनेपर, अर्थात् सुकर होनेपर, ही ग्राह्य (मधुर) होता है, यह पीछे (पृष्ठ १६में) कहा जा चुका है।२ (४) इससे दुष्कर यमककी माधुर्यविरोधिता स्वतः प्राप्त है। (५) जब दुष्कर यमक ही काव्यको अग्राह्य बनाता है, तो सुदुष्कर चित्रबन्ध तो माधुर्यके लिये सुतराम् माहुर हैं, यह स्वतः स्पष्ट है। (६) रुद्रटने मात्राच्युतक आदि तथा पहेलियों को कवियोंके खेलकी चीज बताया है।३ प्रायः दण्डीके अनुयायी महाराज भोजने यमकके प्रतिलोमभेदके विषयमें थाचार्य रुद्रटका अनुसरण किया है : उन्होंने इसे गतिके प्रतिलोमनियमके कारण सम्पन्न 'चित्र' नामक शब्दालङ्कारके अन्तर्गत माना है। इसे उन्होंने 'गत-प्रत्यागत' नाम दिया है। उदाहरण दण्डीके न देकर भारवि (सरस्वती० २।३००, किराता० १५।२२) तथा माघके (सरस्वती० २।२६६, ३०१-३०२, ३०५, शिशु० १६।४४, ३३-३४, ६०) दिये हैं। भोजने गत-प्रत्यागतके दण्डी और रुद्रटके भेदोंसे अन्य भी अक्षरगत (२।३००), भाषान्तरगत (३०३- ३०४), अर्थानुगत (३०५) भेद किये हैं। दण्डीने प्रतिलोमपठित काव्यको चित्राकारबन्धमें निष्पन्न न होनेके कारण चित्रबन्ध नहीं माना है, अपितु प्रतिलोम आवृत्तिके कारण 'यमक' ही बताया है। जिस प्रतिलोम आवृत्तिसे किसी प्रकारका चित्रबन्ध बन जाता है, उसे वे 'यमक' न कहकर चित्र ही कहते हैं। उदाहरणार्थ सर्वतोभद्रके चारों पादोंमें पूर्वांशकी प्रतिलोम आवृत्ति होती है, तथा 'सर्वतोभद्र' नामक वेदीका आकार भी निर्मित होता है। तो उन्होंने इसे (८०, ८२ श्लोकोंमें) १. वेदापन्ने स शकले रचितनिजरुगुच्छेदयत्नेऽरमेरे, देवासक्तेऽमुदक्षो बलदमनय दस्तोददुर्गासवासे । सेवासगर्दुदस्तो दयनमदलवक्षोदमुक्ते सवादे, रेमे रत्नेऽयदच्छे गुरुजनितचिरक्लेशसन्नेऽपदावे ।। काव्याल० ५।१७ २. इति यमकमशेषं सम्यगालोचयद्भिः सुकविभिरभियुक्तैर्वस्तु चौचित्यविद्भिः । सुविहितपदभङ्गं सुप्रसिद्धाभिधानं तदनु विरचनीयं सर्गबन्धेषु भूम्ना ।। काव्याल० ३।५६ ३. मात्राबिन्दुच्युतके प्रहेलिकाकारकक्रियागूढे । प्रश्नोत्तरादि चान्यत् क्रीडामात्रोपयोगमिदम् ।। काव्याल० ५।२४

६० काव्यादर्श [३।७४ (क) याऽमताश कृतायासा, सा याता कृशता मया । ────────→ ←──────── रमणारकता तेऽस्तु स्तुतेता करणामर ॥ ७४ ॥ ────────→ ←──────── (क) हे अमत (अनिष्ट, अनुचित) आशा वाले, जो कृशता आयास (क्लेश) करने वाली (होती है), वह मैंने पा ली है । हे करणों (इन्द्रियों) के लिये (मृत-समान) रमण (आनन्ददायी कान्त), तुम्हारी स्तुत (प्रशंसा) से इत (युक्त) आरकता (आगन्तृत्व) होवे ॥ ७४ ॥ ‘सर्वतोभद्र’ नामसे चित्रबन्धोंमें परिगणित किया है, यमकमें नहीं । यही कारण है कि प्रतिलोम यमकमें उन्होंने पूरे पादसे कमकी आवृत्ति नहीं मानी है । वर्णोंके पूर्वानुभवसंस्कारबोधिनी अदूरता दण्डीके अनुसार अनुप्रास में अपेक्षित होती है, यमकमें नहीं । अन्यथा अत्यधिक व्यवधान वाले प्रथमादिचतुर्थ- पादान्तयमक कैसे निष्पन्न होंगे ? इसे यदि अपेक्षित माना भी जाये, तो प्रतिलोमयमकमें भी अनुलोम पठित वर्णोंका पूर्वानुभवसंस्कार उनके प्रति- लोमपाठमें विचित्र अवश्य लगता है, पर तिरोहित नहीं हो जाता । अतः किसी प्रकारका चित्रनिबन्धन न होनेके कारण पाद, अर्ध और श्लोककी प्रतिलोम आवृत्तिको ‘चित्र’ में शामिल करना उचित नहीं है । इसका उचित स्थान यमक ही है, जो इसे दण्डीने दिया है । बादके आचार्योंने इस विषयमें कोई नई बात नहीं कही है ॥ ७३ ॥ (७. क) पादप्रतिलोम यमक—‘यामताश कृतायासा०’ (७४) श्लोकमें विषम पादोंमें जिस क्रमसे वर्णविन्यास किया गया है, सम पादोंको प्रतिलोम क्रमसे यदि पढ़ा जाता है, अर्थात् सम पादके अन्तिम अक्षरको आदिम और इस प्रकार उलटे पढ़ते-पढ़ते आदिम अक्षरको अन्तमें पढ़ा जाता है, तो विषम पादका वर्णविन्यास उपलब्ध हो जाता है । अनुलोम और प्रतिलोम, परस्पर सम्बद्ध हैं । इसलिये इस भेदको ‘अनुलोम-प्रतिलोम’ भी कहते हैं । अनुलोमसे प्रतिलोमकी प्राप्ति अनिवार्य नहीं है । जबकि प्रतिलोमसे अनुलोमकी प्राप्ति अवश्यम्भावी है । इसलिये इस भेदमें प्रतिलोमता ही महत्त्वपूर्ण है । यही कारण है कि दण्डीने इस भेदके असाधारण धर्म प्रतिलोम आवृत्तिके आधार पर ही लक्षण और सञ्ज्ञाका विधान किया है । भोजने ‘गत-प्रत्यागत’ सञ्ज्ञाका प्रयोग किया है । कविने प्रकृत दुष्कर यमकमें कोमल विप्रलम्भ रति निबद्ध की है । ‘अमताश’, ‘आरकता’, ‘स्तुतेता’, ‘करणामर’ पदोंकी सुपारियोंको तोड़कर

३।७५] १ यमक (७. ख) श्लोकार्ध-प्रतिलोम यमक ६१ (ख) नादिनोमोदना धीः स्वा, न मे काचन कामिता । तामिका न च कामेन स्वाधीना दमनोदिना ॥ ७५ ॥ (ख) मुझ प्रणव नादकी भावना वालेकी अपनी बुद्धि मदनसे रहित है । (मुझे) कोई एषणा नहीं (शेष रही) है। इन्द्रियोंके दमनको खण्डित करने वाले कामके द्वारा अपने (कामके) अधीन रहने वाली कालिख (मुझे) नहीं है ॥ ७५ ॥ चुभलानेके बाद अनुलोम-प्रतिलोम पाठकी चर्वणासे जन्य रसके आस्वादके आगे रति चातुरी बहुत उपेक्षित हो जाती है । अतः इस प्रकारके यमक माधुर्यविरोधी हैं । यह प्रतिलोम विन्यास भिन्नार्थक प्रतीति कराता है । पर अभिन्नार्थक भी हो सकता है । जैसे- माघके एक श्लोकमें पादको अनुलोम और प्रतिलोम पढ़नेसे एक ही वर्णविन्यास तनिकसे क्रमभेदसे उपलब्ध होता है ।¹ दोनों पाठोंमें इसलिये अर्थ एक ही प्रकट होता है। यह विधा दण्डीके पादप्रतिलोम- यमकके उदाहरणसे भिन्न प्रकारकी है ॥ ७४ ॥ (७. ख) श्लोकार्ध प्रतिलोम यमक — ७५वें श्लोकमें आचार्य दण्डीने किसी प्रणवनादाभ्यासी पाशुपत योगीके आत्मतोषका वर्णन किया है । दण्डीके कालमें तन्त्र एवं योगके राजयोग तथा हठयोग मार्गोंके मिश्रणसे कई शैव, शाक्त, वैष्णव साधनामार्ग प्रचलित थे । उसके अनुसार प्रणव (ओङ्कार) का अजपा जप (इसे 'अजपा गायत्री' भी कहा जाता था) किया जाता था । इसके अवि- च्छिन्न सन्तानसे मूलाधार चक्रमें सुषुम्णामें एक अमूर्त नाद (अव्यक्त ध्वनि) श्वास-प्र-श्वासकी क्रियाके समान सहज रूपसे उन अभ्यासियोंमें सिद्ध हो जाता था ।² इसे 'अन्तः प्रणव', 'ब्रह्म प्रणव' या 'महावैराज प्रणव' के नामसे कहा गया है ।³ इस प्रकारकी वेदान्तानुकूल साधनामें जपका मन्त्र 'अहं सः' १. विदितं दिवि केऽनीके तं यातं निजिताऽऽजिनि । विगदं गवि रोद्धारो योद्धा यो नतिमेति न ।। माघ० १६।२० २. मूलाधारात् सुषुम्णा च बिसतन्तुनिभा शुभा ।। ध्यानबिन्दूपनिषद् १०१ अमूर्ती वर्तते नादो वीणादण्डसमुत्थितः । १०२ उपनिषद् ब्रह्मयोगी : तत्र सुषुम्णाश्रयवीणादण्डे समुत्थितः सन्नमूर्ती नादो वर्तते ! अत एव वीणादण्डमध्यमेव नादोत्पत्तिस्थानम् । ३. पाशुपतब्रह्मोपनिषद्, उत्तरकाण्ड ३; ध्यानबिन्दूपनिषद् १, ३०, ४६ ।

६२ काव्यादर्श [३।७५ 'सोऽहं' से निष्पन्न 'हंसः' ध्वनि (नाद) होता है । इसे 'मानस यज्ञ' कहा गया है ।^१ अस्तु, इस प्रणवात्मक या महावाक्यात्मक नादके सतत अभ्याससे मनकी बाह्य वृत्तियां समाप्त हो जाती हैं और मन इस नादमें ही लीन हो जाता है ।^२ मनकी वृत्तियोंका बीज काम (इच्छा) है ।^३ मनकी वृत्तियाँ जब लीन हो जाती हैं, तो जीवकी बुद्धि मदनरहित (कामरहित) स्वतः हो जाती है । इसके परिणामस्वरूप कामकी त्रिविध वृत्तियां (एषणात्रय^४) नादा- भ्यासी पुरुषके मनमें उदित तो होती ही नहीं हैं, जो प्रारब्धवशात् स्थित हैं, वे भी कालक्रमसे उनके भोगसे शान्त, व्युपरत हो जाती हैं ।^५ इस प्रकार नादाभ्यासी पुरुषकी अमदनताकी स्थितिसे अकामता (एषणात्रय-रहितता) की स्थिति उत्पन्न होती है । चित्तमें जो सञ्चित और प्रारब्ध कर्म स्थित हैं, १. पाशुपत ब्रह्मोपनिषत्, पूर्वकाण्ड, १२ : मानसो हंसः 'सोऽहं = हंसः' इति तन्मयं यज्ञो नादानुसन्धानम् । तन्मयविकारो जीवः । उत्तरकाण्ड ३ : अन्तः प्रणवनादाख्यो हंसः प्रत्ययबोधकः । २. स्वात्मानं पुरुषं पश्येन् मनस्तत्र लयं गतम् । ध्यानबिन्दूप० १०५ ब्रह्मप्रणवसंलग्ननादो ज्योतिर्मयात्मकः ।। ४६ मनस्तत्र लयं याति, तद् विष्णोः परमं पदम् । ४७ सदा नादानुसन्धानात् सङ्क्षीणा वासना भवेत् ।। ४६ सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सर्वचिन्ताविवर्जितः ।। ५१ न जानाति स शीतोष्णं, न दुःखं, न सुखं तथा । ५३ अवस्थात्रयमन्वेति न चित्तं योगिनः सदा ॥ ५४ ३. कामस्तदग्रे समवर्तताधि, मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । ऋ० १०।१२६।४ ४. ईशोपनिषद्भाष्यकुसुमाञ्जली, पृष्ठ १२, देखें । ५. अधिष्ठाने तथा ज्ञाते, प्रपञ्चे शून्यतां गते । देहस्यापि प्रपञ्चत्वात् *प्रारब्धावस्थितिः कुतः ? ।। नादबिन्दूपनिषत् २८ ततः कालवशादेव *प्रारब्धे तु क्षयं गते ।। २६ ब्रह्मप्रणवसन्धाननादो ज्योतिर्मयः शिवः । स्वयमाविर्भवेदात्मा मेघापायेऽंशुमानिव ।। ३०

  • अष्टाविंशश्लोकोक्त 'प्रारब्ध'से 'प्रकृत देहारब्ध' अर्थात् 'क्रियमाण कर्म' अभीष्ट हैं एवं उनत्रिंश श्लोकमें उक्त 'प्रारब्ध' से सञ्चित और क्रियमाणसे भिन्न प्रारब्धभोग कर्म अभीष्ट हैं । अन्यथा 'कालवशात् क्षय' कहना आवश्यक नहीं है । उपनिषद् ब्रह्मयोगिने इस प्रकरणमें 'न कदापि प्रारब्धादिकर्मत्रयं विद्यते ।' माना है ।

३।७५ ] १ यमक : (७. ख) श्लोकार्ध प्रतिलोम ६३ उनका भी क्षय हो जाता है । ऐसे अभ्यासियोंके तामिका (मल) न होनेसे क्रियमाण कर्म बन्धनकारी नहीं होते, गुणस्वभावसे प्राप्त मात्र होते हैं । यह मल कामके अधीन है । चित्तमें विद्यमान होते हुए भी यह मल तब तक काम नहीं करता, जब तक कि चित्तमें मदन = काम = इच्छा का उदय न हो जाये । साधक लोग इस कामका उदय कभी नादाभ्याससे व्युत्थानकी स्थिति में न हो जाये, इसके लिये ‘दम’ (इन्द्रियदमन) का, अपने चित्तकी वृत्तियोंके दमनका, आश्रय लिया करते हैं ।१ इस दमपाशको तहस-नहस करने वाला मत्तमातङ्ग कामकरी ही है ।२ इसलिये कविने उसे ‘दम-नोदी’ (दमको उखाड़ फेंकने वाला) कहा है । मनुष्यकी दृक् और क्रिया (११ ज्ञानकर्मेन्द्रियों) को आच्छादित करने वाले चित्तमलको कविने ‘तामिका’ कहा है । यह मल चावलपर भूसीके समान है । अर्थात् जब तक मनमें यह मल है, तब तक ही मन रूपी चावल अङ्कुरणमें समर्थ है । इस तुषके हट जानेपर यह अङ्कुरित नहीं हो सकता । अथवा यह मल (तामिका) ताँबे (धातु) पर स्थित मैलके समान है । जबतक धातुपर मैल है, तब तक धातुका स्वरूप प्रकाशित नहीं होता ।३ नादाभ्यासके कारण यह तामिका भी नष्ट हो जाती है । प्रकृत श्लोकमें पूर्वार्ध और उत्तरार्धमें अनुलोम-विलोम भाव सम्बन्ध है । पूर्वार्ध अनुलोम है और उत्तरार्ध उसका प्रतिलोम है । अतः यहाँ श्लोकार्ध- प्रतिलोम यमक है । आचार्यने प्रथम पादके अनुलोम नाधीः स्वा के प्रतिलोम पाठमें विसर्गको यमकभञ्जक नहीं माना है । भारविने भी (किराता० १५। २२-२३में) विसर्गको यमकभञ्जक नहीं माना है । इसी धारणाकी अभि- व्यक्ति वाग्भटने ‘अनुस्वार और विसर्ग चित्र अलङ्कारको भङ्ग करने वाले नहीं माने जाते’४ कहकर की है । वाग्भटके इस कथनमें ‘चित्र’ शब्द सभी दुष्कर बन्धोंका उपलक्षक है५ ॥ ७५ ॥ १. महानारायणोपनिषत् २२।१ : दमेन दान्ताः किल्बिषमवधुन्वन्ति । दमेन ब्रह्मचारिणः सुवरगच्छन् । दमो भूतानां दुराधर्षम् । दमे सर्वं प्रतिष्ठितम् । तस्माद् दमः परमं वदन्ति । २. कुर्यां हरस्यापि पिनाकपाणेर्धैर्यच्युतिं के मम धन्विनोऽन्ये ? कुमार० ३।४ ३. एको ह्यनेकशक्तिर्दृक्क्रिययोश्छादको मलः पुंसः । तुषतण्डुलवज्ज्ञेयस्ताम्रस्थितकालिकावद् वा ।। तत्त्वप्रकाशिका १८ ४. नानुस्वारविसर्गौ च चित्रभङ्गाय सम्मतौ । वाग्भटाल० १।२० ५. श्लोक ७८ के पूर्व ‘चित्र का अर्थ’ प्रकरण, पृष्ठ ६५, देखें ।

६४ काव्यादर्श [ ३।७६-७७ (ग) यानमानय माराविकशोनानजनासना । यामुदारशताधीनामायामायमनादि सा ॥१ ७६ ॥ साऽदिनामयमायामा नाधीता शरदामुया । नासनाजनना शोकविरामायनमानया२ ॥ ७७ ॥ (ग) वाहन ले आओ । सैकड़ों उदार पुरुषोंको अधीन करने वाली (अर्थात् दुर्लभ) जिसे हमने पाया है, कामदेव रूपी मेषके लिये चाबुक समान, निस्सत्त्व जनोंको परे हटाने वाली वह मैंने बोल दी है ॥ ७६ ॥ अयन (वर्षार्ध) के मान वाली इस शरद् ऋतुके कारण आधियुक्त, दिन के विपरीत (रातमें) प्रेम व्याधिके मान वाले प्रहरों वाली आसन (सुस्थिरता) की अनुत्पत्ति (बेचैनी) से युक्त वह (सुन्दरी) शोकके अन्त वाली नहीं है । अर्थात् वह हमारे प्रेममें व्याकुल है । जब तक हम नहीं पहुँचते, उसे चैनसे टिकना नहीं मिलने वाला है ॥ ७७ ॥ (७. ग) श्लोक प्रतिलोमयमक—यहाँ आचार्य दण्डीने ७६वें श्लोकमें अनुलोम विन्याससे रचना की है । वही विलोम विधिसे पढ़नेपर एक सम्बद्धार्थक ७७वें श्लोकके रूपमें परिणत हो जाती है । ७६वेंके पूर्वार्धके प्रतिलोमसे दूसरे श्लोक के उत्तरार्धकी और उत्तरार्धके प्रतिलोमसे दूसरे श्लोकके पूर्वार्धकी प्राप्तिसे भी यहाँ श्लोकप्रतिलोम सम्पन्न हो सकता है । पर वैसा करनेसे यह दो अर्धोंका प्रतिलोम होगा । अतः दण्डीने उत्तरार्धके प्रतिलोमसे पूर्वार्धकी और पूर्वार्धके प्रतिलोमसे उत्तरार्धकी रचना की है । इससे पूरा श्लोक प्रतिलोम यमकित हो जाता है । भारवि ने (१५।२२-२३) और माघ ने (१६।३३-३४ में) भी इसी प्रकारसे आवृत्ति की है ॥ ७६-७७ ॥ कृष्णेऽप्यकृष्णे मेघेन नभस्यर्घेन्दुना युते । अष्टादशे दिने यूल्या मन्दे मन्देन वन्दितः ॥ १ ॥ यमकोदाहृतिग्रामो युगर्षिश्लोकसङ्ख्यकः । सोऽयं सप्तदशाहेन व्याख्यातः शास्त्रसम्मतः ॥ २ ॥ भूयस्यै भूतये भूयाद् भूयो मे भवभावनः । भवानी हृदये वासाद् भव्यस्य भव काङ्क्षिणः ॥ ३ ॥ १. अन्वयः—यानम् आनय । उदारशताधीनां याम् आयाम्, माराविकशा, ऊनानजनासना सा अनादि । २. अन्वयः—अयन-मानया, अमुया शरदा आधीता (आधि-इता), अदिनाम- यमायामा, आसनाजनना सा शोक-विरामा न ।

३।७८] 'चित्र' का अर्थ ६५ कर्कॆ मानावरौ चन्द्र ऐन्द्रयां मार्गेदिते बुधे । शुक्रे नभसि धूल्यैव मलिनत्वमुपेयुषि ॥ १ ॥ ईर्ष्यादिदोषपोषेण सह स्वान्तेन वै बुधाम् । सम्प्रत्याख्यास्यलङ्कारांश्चित्रबन्धान् बुधाप्रियान् ॥ २ ॥ अनलम्भाविभिस्त्वार्या मायां शाब्द्यां प्रभाविविः । आदृतान् कविमन्यैस्तु, काव्ये वर्ज्यान् कवीश्वरैः ॥ ३ ॥ वाग्देव्याः प्रीतये सेयं भूयाद् भव्याय पाठिनाम् । मम च तुष्टये; सन्तु गुरूणामाशिषो भृशम् ॥ ४ ॥ 'चित्र' का अर्थ : आचार्य दण्डीने शब्दालङ्कारोंकी रचना सुकर और दुष्कर दो प्रकारसे बनाई है । उनमें से यमक दोनों प्रकारका है । क्रम- विशेषसे पढ़नेपर आकारविशेष का रूप धारण करने वाली चित्र रचना सुकर नहीं हो सकती । स्वर, स्थान और वर्णोंके नियममें बँटा अक्षरनिवेश सुकर एवं दुष्कर दोनों प्रकारका होता है । आचार्यने ग्रन्थके उपसंहारमें 'सुकर' 'दुष्कर' रचनाओंको 'चित्रमार्ग' नाम दिया है । इसका अर्थ यह है कि उनकी दृष्टिमें यमक, बन्ध, अक्षरनिवेशनियम तथा प्रहेलिकायें भी चित्रमार्ग वाली शब्दालङ्क्रियाएं हैं । इस व्यापक अर्थमें 'चित्र' का अर्थ 'विचित्र', 'असाधारण' है । गोमूत्रिका आदि बन्धोंमें अक्षरविन्याससे चित्रकर्मके समान कोई आकृति निष्पन्न हो जानेसे बन्धविशेष रूप चित्र अलङ्कारको आकारके कारण चित्र मान लिया गया । कालान्तरमें जिन दुष्कर और सुकर चित्र (अद्भुत) शब्दालङ्कारोंकी कोई सञ्ज्ञाविशेष थी, उनके लिये तो 'चित्र अलङ्कार' सञ्ज्ञाका प्रयोग बन्द हो गया, जैसे यमक, प्रहेलिकाएँ, शेष के लिये 'चित्र' का प्रयोग 'बन्ध' या 'अलङ्कार' के साथ सीमित हो गया । इस प्रकार 'चित्र' शब्द कालान्तरमें मुख्यतया 'आकार' के सादृश्य वाले बन्धोंकी सामान्य सञ्ज्ञा बन गया । यही कारण प्रतीत होता है कि प्रतिलोम बन्धोंसे कोई आकारविशेष न बननेके कारण आचार्यने उनका समावेश चित्रबन्धोंमें नहीं किया । वर्ण- निवेशनियम नहीं होनेसे उस भेदमें भी नहीं किया । एवं प्रहेलिकाका स्वरूप उनमें न होनेसे उन्हें प्रहेलिकाओंमें भी सम्मिलित नहीं किया । पाद, अर्ध या श्लोकमें प्रयुक्त वर्णसमुदायकी प्रतिलोम आवृत्तिसे सजातीय या विजातीय प्रकारका पाद, अर्ध या श्लोक उपलब्ध हो जानेसे उन्होंने इसे आवृत्तिसाम्यके

६६ काव्यादर्श [३।७८ कारण यमकमें सम्मिलित किया है । इस प्रकार दण्डीके मतमें यमकके दो भेद हैं : (१) सुकर-दुष्कर भेदात्मक अनुलोम यमक; (२) दुष्कर प्रतिलोम यमक । ये दोनों ही प्रकारके यमक सामान्य शब्दालङ्कार अनुप्राससे वैचित्र्य के कारण 'चित्र' मार्गकी रचनामें आते हैं । आचार्य रुद्रटने दण्डीद्वारा 'चित्र' का 'चित्रमार्गाः सुकरदुष्कराः' से सङ्केतित यह अर्थभेद स्पष्टतः प्रकट किया है । उन्होंने इसमें अपनी दृष्टिसे कुछ परिवर्तन किये हैं । तद् यथा— (१) तुल्यश्रुति, तुल्यक्रम (अनुलोम) वर्णोंकी सुकर, दुष्कर आवृत्ति 'यमक' होती है,१ (२) जिस प्रकारके वर्ण- विन्याससे किसी वस्तु (द्रव्य) का कोई विचित्र रूप निष्पन्न होता है, वह वर्णविन्यासप्रकार (क) किसी वस्तुके आकारका चित्र प्रस्तुत करनेके कारण तथा (ख) इस प्रकारके बन्धकी असाधारणता, अद्भुतता, वैचित्र्यके कारण 'चित्र' अलङ्कार कहाता है । यह अलङ्करण शब्द (वर्णसमुदाय) के माध्यम से प्राप्त होता है, इसलिये यह 'शब्दालङ्कार' है ।२ प्रतिलोम वर्णविन्यासमें वर्णोंका क्रम तुल्य नहीं रहता, अतः रुद्रटके मतमें वह 'यमक' नहीं है;३ (२) वर्णविन्यासकी विचित्रता होती है, अतः वह 'चित्र' अलङ्कार है । महाराज भोजने (१) वर्णों, (२) उच्चारणस्थान, (३) स्वरों, (४) आकार, (५) गति (अनुलोम-प्रतिलोम पाठ) तथा (६) बन्धोंको लेकर जो नियम होता है, उसे 'चित्र' कहा है ।४ स्पष्ट है कि भोजके इस कथनमें (क) आकारगत चित्रता छह प्रकारोंमेंसे एक है; शेष प्रकारोंमें (ख) विचित्रतोपनिबन्धना चित्रता ही है । (ग) भोजने प्रतिलोम चित्रताके विषयमें दण्डीका मत न मानकर रुद्रटका अनुसरण किया है, यह भी स्पष्ट है । रत्नेश्वरमिश्रने चित्रके अर्थपर निम्नलिखित विचार किया है : (१) कश्मीरी आचार्य चित्र जैसे निर्जीव होता है, वैसे ही ध्वनिरूप प्राणभूत १. तुल्यश्रुतिक्रमाणांमन्यार्थानां मिथस्तु वर्णानाम् । पुनरावृत्तिर्यमकम्...।। काव्याल० ३।१ २. भङ्गन्तरकृततत्क्रमवर्णनिमित्तानि (क) वस्तुरूपाणि । साङ्कानि (ख) विचित्राणि च रच्यन्ते यत्र तच्चित्रम् ।। काव्याल० ५।१ ३. नमिसाधुटीका ३।१ : 'क्रम'-ग्रहणात् (i) प्रतिलोमानुलोम-(ii-iii) सर्वतोभद्रानुप्रासादीनां यमकत्वनिरासः । ४. वर्णस्थानस्वराकारगतिबन्धान् प्रतीह यः । नियमस्, तद् बुधैः षोढा 'चित्रम्' इत्यभिधीयते ।। सरस्वती० २।१०६

३।७८] २. चित्र बन्ध : (१) गो-मूत्रिका दुष्कर बन्ध ६७ (१) वर्णानामेक-रूपत्वं यद्येकान्तरमर्धयोः । गो-मूत्रिकेति तत् प्राहुर्दुष्करं तद्विदो, यथा ॥ ७८ ॥ (१) दो अर्धों (श्लोकके पूर्वार्ध और उत्तरार्ध) में (परस्पर) एकेक वर्णका अन्तर करके अगर वर्णोंमें एकरूपता रहती है, तो उस दुष्कर एकरूपताको दुष्करके जानकार लोग 'गो-मूत्रिका' कहते हैं । जैसे—॥ ७८ ॥ तत्त्वसे रहित होनेके कारण इस प्रकारके वर्णविन्यासको 'चित्र' कहते हैं । (२) आकृतिविशेषसे युक्त होनेसे यह चित्र होता है । (३) आश्चर्यकारी होनेसे यह चित्र कहलाता है ।१ निष्कर्षः (१) दण्डी और भोजके मतमें अलङ्कारोंकी चित्रताका आधार आश्चर्यकारिता है, आकार नहीं, और न ही इन दोनोंका यथायोग्य समन्वय है । (२) रुद्रटने आकार और वैचित्र्यको यथायोग्य रूपमें चित्रताका प्रयोजन माना है । (३) औदीच्य आचार्योंमें ध्वनिवादी आचार्योंका मत आकार- सादृश्यसे चित्रत्व माननेका ही विस्तार है । विचित्र निवन्धन वाले चित्रालङ्कारोंमें से (१) 'यमक' के सुकर और दुष्कर भेदोंका निरूपण दण्डी जितने व्यवस्थित और समग्र रूपमें सम्भवतः किसी अन्य अलङ्कारशास्त्रीने नहीं किया है। (२) आकारवैचित्र्यनिबन्धन वाले चित्र शब्दालङ्कारोंमेंसे आचार्यने केवल (i) गोमूत्रिका, (ii) अर्धभ्रमक, तथा (iii) सर्वभ्रमण सर्वतोभद्र बन्धोंका निरूपण अन्य बन्धोंके उपलक्षणार्थ (७८-८२ में) किया है । (३) स्वर, स्थान और व्यञ्जनोंके नियमके वैचित्र्य वाले चित्र वर्णनियम शब्दालङ्कारका निरूपण भी उपलक्षणार्थ ८३-६५ श्लोकोंमें १२ उदाहरणोंसे किया है ।२ (१) गोमूत्रिका दुष्कर बन्ध—श्लोकके चार पाद दो अर्धोंमें निबद्ध होते हैं । प्रथम और द्वितीय पादोंसे पूर्वार्ध बनता है और तृतीय एवं चतुर्थ १. रत्नदर्पण २।१०६ : (१) 'चित्रम् = आलेख्यम् । तदिव जीवितस्थानीय- ध्वनिरहितं चित्रम् ।' इति काश्मीरकाः । तदसद्—ध्वनेः प्राधान्या- नङ्गीकारात् प्रतीयमानमात्राभावस्य क्वचिदप्यसम्भवात् । (२) यद् वा 'आकृतिविशेषयुक्तं चित्रम्' इति । तदपि न, अव्यापकत्वात् । (३) अतो 'वर्णादिनियमेन प्रवृत्तमाश्चर्यकारितया चित्रम्' इत्येव युक्तम् । २. चित्रबन्धोंके भरपूर प्रदर्शनके लिये प० हृषीकेश चतुर्वेदीकी हृषीकेश- ग्रन्थावली देखें ।

६८ काव्यादर्श [३।७६ मदनो मदिराक्षीणामपाङ्गास्त्रो जयेदयम् । मदेनो; यदि तत् क्षीणमनङ्गायाञ्जलिं दधे' ॥ ७६ ॥ मादक नयनों वालियोंके अपाङ्ग (कटाक्ष) रूपी अस्त्र वाला यह मदन (मस्त, मदहोश बना देने वाला कामदेव) मेरे पापको जीत ले। अगर वह (पाप) क्षीण हो जाये, तो मैं देहरहित (कामदेव) को अञ्जलि प्रदान करता हूँ ॥ ७६ ॥ पादोंसे उत्तरार्ध । इन दोनों अर्धोंमें पूर्व और उत्तर अर्धोंमें क्रमशः एकेक वर्णका व्यवधान करके ऊपर-नीचे, वर्णोंको एक क्रममें रखनेसे वही वर्ण- विन्यास निष्पन्न होता है, जो मिश्रित होने वाले पादोंका है। बैलकी मूत्र- धाराके समान ऊपर नीचे गति करनेसे गोमूत्रका आकार बन जानेसे, उसके सादृश्य वाला यह चित्र बन्धन 'गोमूत्रिका बन्ध' कहलाता है। गोमूत्रिकाके आकारकी निष्पत्तिके लिये पृथक् प्रयत्नसे निष्पाद्य होनेके कारण यह बन्ध दुष्कर है ॥ ७८ ॥ (१) गोमूत्रिका चित्र बन्धका उदाहरण—'मदनो मदिराक्षीणा०' (७६) में कविने किसी मादक नयनों वाली सुन्दरीके नयनशरोंसे आहत युवाकी विप्रलम्भ रतिका चित्रण प्रकृत श्लोकमें किया है। वह युवा सुन्दरीके कटाक्षरूपी विकट शरको कामदेवका अस्त्र समझता है। वह प्रार्थना करता है कि इस अलौकिक अस्त्रसे कामदेव उसके इस पापको नष्ट कर दे, जिसके कारण उसका अपनी प्रियासे सङ्गम नहीं हो पा रहा है। यदि युवाका वह पाप कामदेवने क्षीण कर दिया, और उसे उसकी प्रियाका सङ्गसुख प्राप्त हो गया, तो वह कामदेवको प्रणामाञ्जलि प्रदान करेगा। यहाँ 'एनस्' (पाप) को जीतने (जयेत्) की अपेक्षा वादिप्रोक्त 'दहेत्' पाठ अधिक उचित है। इसी प्रकार 'अञ्जलि देने' से 'जलाञ्जलि' या 'तिला- ञ्जलि' देना व्यक्त होता है, जो 'अनङ्ग' कहनेसे कामकी मृत्युका अनिष्ट अर्थ सूचित करता है। अतः 'ददे'के स्थानपर 'दधे' उचित है : धारण प्रणामाञ्जलिका मस्तकसे होता है; यही अभीष्ट है। 'मदिराक्षीणाम्' का सम्बन्ध समस्त पद 'अपाङ्गास्त्रः' (तत्पुरुषगर्भित बहुव्रीहि) के अवयव 'अपाङ्ग' से उसी तरह है, जैसे 'देवदत्तस्य गुरुकुलम्' वाक्यमें देवदत्तका सम्बन्ध 'गुरुकुल' समुदायके अवयव गुरुके साथ अवयवीसे सम्बन्धके माध्यमसे अवयवसे सम्बन्धके रूपमें होता है। १. 'तरुण० : ० स्त्रं । वादीटीका : '० स्त्रं जयन्दहेत् ।' इति पाठः । 'ददे' को पाठभेद तथा 'दधे' को स्वीकृत पाठ माना है।

३।८०] २. चित्र बन्ध : (२) अर्ध-भ्रम, (३) सर्वतो-भद्र ६६ (२) प्राहुरर्धभ्रमं नाम श्लोकार्ध-भ्रमणं यदि । (३) तदिष्टं सर्वतोभद्रं भ्रमणं यदि सर्वतः ॥ ८० ॥ (२) अगर श्लोकके अर्धोंका भ्रमण होता है, तो 'अर्धभ्रम' नामक चित्रबन्ध कहते हैं । (३) अगर सब दिशाओंमें भ्रमण हो, तो वह 'सर्वतोभद्र' इष्ट है ॥ ८० ॥ यहाँ पूर्व वर्ण पूर्वार्धका एवम् उत्तर वर्ण उत्तरार्धका, फिर पूर्वार्धका, फिर उत्तरार्धका इस प्रकार एकेक अक्षर छोड़कर लेनेसे उत्तरार्धका ही पाठ निष्पन्न होगा । उत्तरार्धका पूर्व वर्ण और पूर्वार्धका उत्तरवर्ण लेनेसे श्लोकका पूर्वार्ध ही निष्पन्न होता है । इस प्रकार ऊपर नीचेका और नीचे ऊपरका वर्ण लेनेसे गोमूत्रधाराका सा आकार बनता है । अतः इसे 'गोमूत्रिका चित्रबन्ध' कहते हैं । द म रा णा पा स्त्रो ये यम् ∧ ∨ ∨ ∨ ∨ ∨ म नो दि क्षी म ङ्गा ज द ∨ ∧ ∧ ∧ ∧ ∧ ∧ दे य तत् ण न याञ् लिं धे ॥ ७६ ॥ (२) अर्ध-भ्रम चित्र बन्ध—श्लोकके चारों पादोंको चार पङ्क्तियोंमें लिख लें । चारों पङ्क्तियोंके प्रथम अक्षरोंको ऊपरसे नीचेकी ओर पढ़नेपर आठ पादार्ध बन गये । अब प्रथम और अन्तिम पङ्क्तिको पढ़नेसे श्लोकका पहला पाद निष्पन्न होगा, द्वितीय और सप्तमसे दूसरा, तृतीय तथा षष्ठसे तीसरा एवं चतुर्थ तथा उसके बाद पञ्चम अक्षरोंको ऊपरसे नीचेकी ओर पढ़नेसे चौथा पाद निष्पन्न होगा । इसे ही 'अर्ध-भ्रमक' कहते हैं । (३) सर्वतो-भद्र चित्र बन्ध—यदि श्लोकके घटक वर्णोंका ऊपरसे नीचे, नीचेसे ऊपर, दायेंसे बाएँ और बायेंसे दायें सब दिशाओंमें भ्रमण होनेसे श्लोक अव्याहत रहता है, तो इसे 'सर्वतो-भद्र' विचित्र बन्ध कहते हैं । इस प्रकार सब दिशाओंमें भ्रमणके लिये श्लोकके चार पादोंको अर्धभ्रमके समान चार पङ्क्तियोंमें लिखनेके बाद उन्हीं पादोंको चार पादोंमें नीचेसे ऊपर की ओर अर्धभ्रमसे व्युत्क्रम करके लिखा जाता है । इस प्रकार अनुष्टुप्के ६४ अक्षरोंको ६४ कोष्ठकोंमें लिखनेपर चाहे जिधरसे पढ़ें, आठ अष्टकोंसे चार पाद अनुलोम विधिसे और चार पाद प्रतिलोम विधिसे निष्पन्न होकर श्लोक पूरा हो जाता है । इस वैचित्र्यके कारण यह बन्ध 'चित्र' भी हो जाता है, दुष्करता तो स्वतः स्पष्ट है ही । कोषोंमें इसे 'काव्यचित्र' कहा है ।१ १. सर्वतोभद्र इत्युक्तः काव्यचित्रे, गृहान्तरे । मेदिनीकोष २८।३०८

१०० काव्यदर्श [ ३ । = १ (२) मनोभव, तवानीकं नोदयाय न मानिनी । भयादमेयामामावा वयमेनोमया नत ॥ ८१ ॥ (२) हे मनमें होने वाले (कामदेव), मानवती सुन्दरी रूपी तुम्हारी सेना उदय (विजय) में समर्थ नहीं, ऐसा नहीं है । हे निकृष्ट, (उसके) भयसे अपरिमेय विरहज्वरसे बँधे हुए हम पापी हैं (जो मिलन नहीं हो पा रहा है) ॥ ८१ ॥ कर्मकाण्डमें 'सर्वतोभद्र' मण्डलके समान कोष्ठबन्धके कारण इसे यह नाम दिया गया है ॥ ८० ॥ (२) अर्ध-भ्रम चित्र बन्ध—इस श्लोकमें कविने किसी प्रेमीकी विप्रलम्भ- रतिका वर्णन उसके द्वारा कामदेवको उलाहना दिलानेसे किया है : काम- देवकी सुन्दरी रूपी सेना बड़ी मानिनी (हठीली) है; वह जिसे पराजित करना धार ले, उसे पराजित किये बिना चैन नहीं लेती; हमेशा सफल रहने के कारण भी उसे बड़ा मान है । इस प्रकारकी यह सेना कामदेवके लिये उदयकारी (विजयदायिनी) न हो, यह सम्भव नहीं है । वह मुझसे रूठी है । यह हमारा ही पाप है कि हम उस सेनाके भयसे अपरिमित आम (रोग, पीड़ा, प्रेम ज्वर) के बन्धनमें जकड़े बैठे हैं । हे काम, तुम बड़े निकृष्ट (नत) हो, जो इस प्रकार पीड़ा दे रहे हो । अमेयामामावाः—अमनम् आमः, अम रोगे (भ्वादि०), भावे घञ् । अमेयः मातुं न शक्यश्चासावामः अमेयामः । आ समन्तात् मनसि, बुद्धौ, सर्वा- ङ्गेषु च मवनं मावः बन्धनम् आमावः । अमेयामस्य आमावः (षष्ठी तत्पुरुष) अमेयामामाव एषामिति अमेयामामावाः (मत्वर्थीय अच्) । १ ३ ५ ७ ८ ६ ४ २ | म नो भ व ↑ | त वा नी कं | नो द या य | न मा नि नी । | भ या द मे | या मा मा वा ↓ | व य मे नो | म या न त ॥ ————→ ————→