भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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६६ काव्यादर्श [३।७८ कारण यमकमें सम्मिलित किया है । इस प्रकार दण्डीके मतमें यमकके दो भेद हैं : (१) सुकर-दुष्कर भेदात्मक अनुलोम यमक; (२) दुष्कर प्रतिलोम यमक । ये दोनों ही प्रकारके यमक सामान्य शब्दालङ्कार अनुप्राससे वैचित्र्य के कारण 'चित्र' मार्गकी रचनामें आते हैं । आचार्य रुद्रटने दण्डीद्वारा 'चित्र' का 'चित्रमार्गाः सुकरदुष्कराः' से सङ्केतित यह अर्थभेद स्पष्टतः प्रकट किया है । उन्होंने इसमें अपनी दृष्टिसे कुछ परिवर्तन किये हैं । तद् यथा— (१) तुल्यश्रुति, तुल्यक्रम (अनुलोम) वर्णोंकी सुकर, दुष्कर आवृत्ति 'यमक' होती है,१ (२) जिस प्रकारके वर्ण- विन्याससे किसी वस्तु (द्रव्य) का कोई विचित्र रूप निष्पन्न होता है, वह वर्णविन्यासप्रकार (क) किसी वस्तुके आकारका चित्र प्रस्तुत करनेके कारण तथा (ख) इस प्रकारके बन्धकी असाधारणता, अद्भुतता, वैचित्र्यके कारण 'चित्र' अलङ्कार कहाता है । यह अलङ्करण शब्द (वर्णसमुदाय) के माध्यम से प्राप्त होता है, इसलिये यह 'शब्दालङ्कार' है ।२ प्रतिलोम वर्णविन्यासमें वर्णोंका क्रम तुल्य नहीं रहता, अतः रुद्रटके मतमें वह 'यमक' नहीं है;३ (२) वर्णविन्यासकी विचित्रता होती है, अतः वह 'चित्र' अलङ्कार है । महाराज भोजने (१) वर्णों, (२) उच्चारणस्थान, (३) स्वरों, (४) आकार, (५) गति (अनुलोम-प्रतिलोम पाठ) तथा (६) बन्धोंको लेकर जो नियम होता है, उसे 'चित्र' कहा है ।४ स्पष्ट है कि भोजके इस कथनमें (क) आकारगत चित्रता छह प्रकारोंमेंसे एक है; शेष प्रकारोंमें (ख) विचित्रतोपनिबन्धना चित्रता ही है । (ग) भोजने प्रतिलोम चित्रताके विषयमें दण्डीका मत न मानकर रुद्रटका अनुसरण किया है, यह भी स्पष्ट है । रत्नेश्वरमिश्रने चित्रके अर्थपर निम्नलिखित विचार किया है : (१) कश्मीरी आचार्य चित्र जैसे निर्जीव होता है, वैसे ही ध्वनिरूप प्राणभूत १. तुल्यश्रुतिक्रमाणांमन्यार्थानां मिथस्तु वर्णानाम् । पुनरावृत्तिर्यमकम्...।। काव्याल० ३।१ २. भङ्गन्तरकृततत्क्रमवर्णनिमित्तानि (क) वस्तुरूपाणि । साङ्कानि (ख) विचित्राणि च रच्यन्ते यत्र तच्चित्रम् ।। काव्याल० ५।१ ३. नमिसाधुटीका ३।१ : 'क्रम'-ग्रहणात् (i) प्रतिलोमानुलोम-(ii-iii) सर्वतोभद्रानुप्रासादीनां यमकत्वनिरासः । ४. वर्णस्थानस्वराकारगतिबन्धान् प्रतीह यः । नियमस्, तद् बुधैः षोढा 'चित्रम्' इत्यभिधीयते ।। सरस्वती० २।१०६