भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

३।७८] 'चित्र' का अर्थ ६५ कर्कॆ मानावरौ चन्द्र ऐन्द्रयां मार्गेदिते बुधे । शुक्रे नभसि धूल्यैव मलिनत्वमुपेयुषि ॥ १ ॥ ईर्ष्यादिदोषपोषेण सह स्वान्तेन वै बुधाम् । सम्प्रत्याख्यास्यलङ्कारांश्चित्रबन्धान् बुधाप्रियान् ॥ २ ॥ अनलम्भाविभिस्त्वार्या मायां शाब्द्यां प्रभाविविः । आदृतान् कविमन्यैस्तु, काव्ये वर्ज्यान् कवीश्वरैः ॥ ३ ॥ वाग्देव्याः प्रीतये सेयं भूयाद् भव्याय पाठिनाम् । मम च तुष्टये; सन्तु गुरूणामाशिषो भृशम् ॥ ४ ॥ 'चित्र' का अर्थ : आचार्य दण्डीने शब्दालङ्कारोंकी रचना सुकर और दुष्कर दो प्रकारसे बनाई है । उनमें से यमक दोनों प्रकारका है । क्रम- विशेषसे पढ़नेपर आकारविशेष का रूप धारण करने वाली चित्र रचना सुकर नहीं हो सकती । स्वर, स्थान और वर्णोंके नियममें बँटा अक्षरनिवेश सुकर एवं दुष्कर दोनों प्रकारका होता है । आचार्यने ग्रन्थके उपसंहारमें 'सुकर' 'दुष्कर' रचनाओंको 'चित्रमार्ग' नाम दिया है । इसका अर्थ यह है कि उनकी दृष्टिमें यमक, बन्ध, अक्षरनिवेशनियम तथा प्रहेलिकायें भी चित्रमार्ग वाली शब्दालङ्क्रियाएं हैं । इस व्यापक अर्थमें 'चित्र' का अर्थ 'विचित्र', 'असाधारण' है । गोमूत्रिका आदि बन्धोंमें अक्षरविन्याससे चित्रकर्मके समान कोई आकृति निष्पन्न हो जानेसे बन्धविशेष रूप चित्र अलङ्कारको आकारके कारण चित्र मान लिया गया । कालान्तरमें जिन दुष्कर और सुकर चित्र (अद्भुत) शब्दालङ्कारोंकी कोई सञ्ज्ञाविशेष थी, उनके लिये तो 'चित्र अलङ्कार' सञ्ज्ञाका प्रयोग बन्द हो गया, जैसे यमक, प्रहेलिकाएँ, शेष के लिये 'चित्र' का प्रयोग 'बन्ध' या 'अलङ्कार' के साथ सीमित हो गया । इस प्रकार 'चित्र' शब्द कालान्तरमें मुख्यतया 'आकार' के सादृश्य वाले बन्धोंकी सामान्य सञ्ज्ञा बन गया । यही कारण प्रतीत होता है कि प्रतिलोम बन्धोंसे कोई आकारविशेष न बननेके कारण आचार्यने उनका समावेश चित्रबन्धोंमें नहीं किया । वर्ण- निवेशनियम नहीं होनेसे उस भेदमें भी नहीं किया । एवं प्रहेलिकाका स्वरूप उनमें न होनेसे उन्हें प्रहेलिकाओंमें भी सम्मिलित नहीं किया । पाद, अर्ध या श्लोकमें प्रयुक्त वर्णसमुदायकी प्रतिलोम आवृत्तिसे सजातीय या विजातीय प्रकारका पाद, अर्ध या श्लोक उपलब्ध हो जानेसे उन्होंने इसे आवृत्तिसाम्यके