भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 270 में से

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पृष्ठ 117

६४ काव्यादर्श [ ३।७६-७७ (ग) यानमानय माराविकशोनानजनासना । यामुदारशताधीनामायामायमनादि सा ॥१ ७६ ॥ साऽदिनामयमायामा नाधीता शरदामुया । नासनाजनना शोकविरामायनमानया२ ॥ ७७ ॥ (ग) वाहन ले आओ । सैकड़ों उदार पुरुषोंको अधीन करने वाली (अर्थात् दुर्लभ) जिसे हमने पाया है, कामदेव रूपी मेषके लिये चाबुक समान, निस्सत्त्व जनोंको परे हटाने वाली वह मैंने बोल दी है ॥ ७६ ॥ अयन (वर्षार्ध) के मान वाली इस शरद् ऋतुके कारण आधियुक्त, दिन के विपरीत (रातमें) प्रेम व्याधिके मान वाले प्रहरों वाली आसन (सुस्थिरता) की अनुत्पत्ति (बेचैनी) से युक्त वह (सुन्दरी) शोकके अन्त वाली नहीं है । अर्थात् वह हमारे प्रेममें व्याकुल है । जब तक हम नहीं पहुँचते, उसे चैनसे टिकना नहीं मिलने वाला है ॥ ७७ ॥ (७. ग) श्लोक प्रतिलोमयमक—यहाँ आचार्य दण्डीने ७६वें श्लोकमें अनुलोम विन्याससे रचना की है । वही विलोम विधिसे पढ़नेपर एक सम्बद्धार्थक ७७वें श्लोकके रूपमें परिणत हो जाती है । ७६वेंके पूर्वार्धके प्रतिलोमसे दूसरे श्लोक के उत्तरार्धकी और उत्तरार्धके प्रतिलोमसे दूसरे श्लोकके पूर्वार्धकी प्राप्तिसे भी यहाँ श्लोकप्रतिलोम सम्पन्न हो सकता है । पर वैसा करनेसे यह दो अर्धोंका प्रतिलोम होगा । अतः दण्डीने उत्तरार्धके प्रतिलोमसे पूर्वार्धकी और पूर्वार्धके प्रतिलोमसे उत्तरार्धकी रचना की है । इससे पूरा श्लोक प्रतिलोम यमकित हो जाता है । भारवि ने (१५।२२-२३) और माघ ने (१६।३३-३४ में) भी इसी प्रकारसे आवृत्ति की है ॥ ७६-७७ ॥ कृष्णेऽप्यकृष्णे मेघेन नभस्यर्घेन्दुना युते । अष्टादशे दिने यूल्या मन्दे मन्देन वन्दितः ॥ १ ॥ यमकोदाहृतिग्रामो युगर्षिश्लोकसङ्ख्यकः । सोऽयं सप्तदशाहेन व्याख्यातः शास्त्रसम्मतः ॥ २ ॥ भूयस्यै भूतये भूयाद् भूयो मे भवभावनः । भवानी हृदये वासाद् भव्यस्य भव काङ्क्षिणः ॥ ३ ॥ १. अन्वयः—यानम् आनय । उदारशताधीनां याम् आयाम्, माराविकशा, ऊनानजनासना सा अनादि । २. अन्वयः—अयन-मानया, अमुया शरदा आधीता (आधि-इता), अदिनाम- यमायामा, आसनाजनना सा शोक-विरामा न ।

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