काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
३।७८] 'चित्र' का अर्थ ६५ कर्कॆ मानावरौ चन्द्र ऐन्द्रयां मार्गेदिते बुधे । शुक्रे नभसि धूल्यैव मलिनत्वमुपेयुषि ॥ १ ॥ ईर्ष्यादिदोषपोषेण सह स्वान्तेन वै बुधाम् । सम्प्रत्याख्यास्यलङ्कारांश्चित्रबन्धान् बुधाप्रियान् ॥ २ ॥ अनलम्भाविभिस्त्वार्या मायां शाब्द्यां प्रभाविविः । आदृतान् कविमन्यैस्तु, काव्ये वर्ज्यान् कवीश्वरैः ॥ ३ ॥ वाग्देव्याः प्रीतये सेयं भूयाद् भव्याय पाठिनाम् । मम च तुष्टये; सन्तु गुरूणामाशिषो भृशम् ॥ ४ ॥ 'चित्र' का अर्थ : आचार्य दण्डीने शब्दालङ्कारोंकी रचना सुकर और दुष्कर दो प्रकारसे बनाई है । उनमें से यमक दोनों प्रकारका है । क्रम- विशेषसे पढ़नेपर आकारविशेष का रूप धारण करने वाली चित्र रचना सुकर नहीं हो सकती । स्वर, स्थान और वर्णोंके नियममें बँटा अक्षरनिवेश सुकर एवं दुष्कर दोनों प्रकारका होता है । आचार्यने ग्रन्थके उपसंहारमें 'सुकर' 'दुष्कर' रचनाओंको 'चित्रमार्ग' नाम दिया है । इसका अर्थ यह है कि उनकी दृष्टिमें यमक, बन्ध, अक्षरनिवेशनियम तथा प्रहेलिकायें भी चित्रमार्ग वाली शब्दालङ्क्रियाएं हैं । इस व्यापक अर्थमें 'चित्र' का अर्थ 'विचित्र', 'असाधारण' है । गोमूत्रिका आदि बन्धोंमें अक्षरविन्याससे चित्रकर्मके समान कोई आकृति निष्पन्न हो जानेसे बन्धविशेष रूप चित्र अलङ्कारको आकारके कारण चित्र मान लिया गया । कालान्तरमें जिन दुष्कर और सुकर चित्र (अद्भुत) शब्दालङ्कारोंकी कोई सञ्ज्ञाविशेष थी, उनके लिये तो 'चित्र अलङ्कार' सञ्ज्ञाका प्रयोग बन्द हो गया, जैसे यमक, प्रहेलिकाएँ, शेष के लिये 'चित्र' का प्रयोग 'बन्ध' या 'अलङ्कार' के साथ सीमित हो गया । इस प्रकार 'चित्र' शब्द कालान्तरमें मुख्यतया 'आकार' के सादृश्य वाले बन्धोंकी सामान्य सञ्ज्ञा बन गया । यही कारण प्रतीत होता है कि प्रतिलोम बन्धोंसे कोई आकारविशेष न बननेके कारण आचार्यने उनका समावेश चित्रबन्धोंमें नहीं किया । वर्ण- निवेशनियम नहीं होनेसे उस भेदमें भी नहीं किया । एवं प्रहेलिकाका स्वरूप उनमें न होनेसे उन्हें प्रहेलिकाओंमें भी सम्मिलित नहीं किया । पाद, अर्ध या श्लोकमें प्रयुक्त वर्णसमुदायकी प्रतिलोम आवृत्तिसे सजातीय या विजातीय प्रकारका पाद, अर्ध या श्लोक उपलब्ध हो जानेसे उन्होंने इसे आवृत्तिसाम्यके
६६ काव्यादर्श [३।७८ कारण यमकमें सम्मिलित किया है । इस प्रकार दण्डीके मतमें यमकके दो भेद हैं : (१) सुकर-दुष्कर भेदात्मक अनुलोम यमक; (२) दुष्कर प्रतिलोम यमक । ये दोनों ही प्रकारके यमक सामान्य शब्दालङ्कार अनुप्राससे वैचित्र्य के कारण 'चित्र' मार्गकी रचनामें आते हैं । आचार्य रुद्रटने दण्डीद्वारा 'चित्र' का 'चित्रमार्गाः सुकरदुष्कराः' से सङ्केतित यह अर्थभेद स्पष्टतः प्रकट किया है । उन्होंने इसमें अपनी दृष्टिसे कुछ परिवर्तन किये हैं । तद् यथा— (१) तुल्यश्रुति, तुल्यक्रम (अनुलोम) वर्णोंकी सुकर, दुष्कर आवृत्ति 'यमक' होती है,१ (२) जिस प्रकारके वर्ण- विन्याससे किसी वस्तु (द्रव्य) का कोई विचित्र रूप निष्पन्न होता है, वह वर्णविन्यासप्रकार (क) किसी वस्तुके आकारका चित्र प्रस्तुत करनेके कारण तथा (ख) इस प्रकारके बन्धकी असाधारणता, अद्भुतता, वैचित्र्यके कारण 'चित्र' अलङ्कार कहाता है । यह अलङ्करण शब्द (वर्णसमुदाय) के माध्यम से प्राप्त होता है, इसलिये यह 'शब्दालङ्कार' है ।२ प्रतिलोम वर्णविन्यासमें वर्णोंका क्रम तुल्य नहीं रहता, अतः रुद्रटके मतमें वह 'यमक' नहीं है;३ (२) वर्णविन्यासकी विचित्रता होती है, अतः वह 'चित्र' अलङ्कार है । महाराज भोजने (१) वर्णों, (२) उच्चारणस्थान, (३) स्वरों, (४) आकार, (५) गति (अनुलोम-प्रतिलोम पाठ) तथा (६) बन्धोंको लेकर जो नियम होता है, उसे 'चित्र' कहा है ।४ स्पष्ट है कि भोजके इस कथनमें (क) आकारगत चित्रता छह प्रकारोंमेंसे एक है; शेष प्रकारोंमें (ख) विचित्रतोपनिबन्धना चित्रता ही है । (ग) भोजने प्रतिलोम चित्रताके विषयमें दण्डीका मत न मानकर रुद्रटका अनुसरण किया है, यह भी स्पष्ट है । रत्नेश्वरमिश्रने चित्रके अर्थपर निम्नलिखित विचार किया है : (१) कश्मीरी आचार्य चित्र जैसे निर्जीव होता है, वैसे ही ध्वनिरूप प्राणभूत १. तुल्यश्रुतिक्रमाणांमन्यार्थानां मिथस्तु वर्णानाम् । पुनरावृत्तिर्यमकम्...।। काव्याल० ३।१ २. भङ्गन्तरकृततत्क्रमवर्णनिमित्तानि (क) वस्तुरूपाणि । साङ्कानि (ख) विचित्राणि च रच्यन्ते यत्र तच्चित्रम् ।। काव्याल० ५।१ ३. नमिसाधुटीका ३।१ : 'क्रम'-ग्रहणात् (i) प्रतिलोमानुलोम-(ii-iii) सर्वतोभद्रानुप्रासादीनां यमकत्वनिरासः । ४. वर्णस्थानस्वराकारगतिबन्धान् प्रतीह यः । नियमस्, तद् बुधैः षोढा 'चित्रम्' इत्यभिधीयते ।। सरस्वती० २।१०६
३।७८] २. चित्र बन्ध : (१) गो-मूत्रिका दुष्कर बन्ध ६७ (१) वर्णानामेक-रूपत्वं यद्येकान्तरमर्धयोः । गो-मूत्रिकेति तत् प्राहुर्दुष्करं तद्विदो, यथा ॥ ७८ ॥ (१) दो अर्धों (श्लोकके पूर्वार्ध और उत्तरार्ध) में (परस्पर) एकेक वर्णका अन्तर करके अगर वर्णोंमें एकरूपता रहती है, तो उस दुष्कर एकरूपताको दुष्करके जानकार लोग 'गो-मूत्रिका' कहते हैं । जैसे—॥ ७८ ॥ तत्त्वसे रहित होनेके कारण इस प्रकारके वर्णविन्यासको 'चित्र' कहते हैं । (२) आकृतिविशेषसे युक्त होनेसे यह चित्र होता है । (३) आश्चर्यकारी होनेसे यह चित्र कहलाता है ।१ निष्कर्षः (१) दण्डी और भोजके मतमें अलङ्कारोंकी चित्रताका आधार आश्चर्यकारिता है, आकार नहीं, और न ही इन दोनोंका यथायोग्य समन्वय है । (२) रुद्रटने आकार और वैचित्र्यको यथायोग्य रूपमें चित्रताका प्रयोजन माना है । (३) औदीच्य आचार्योंमें ध्वनिवादी आचार्योंका मत आकार- सादृश्यसे चित्रत्व माननेका ही विस्तार है । विचित्र निवन्धन वाले चित्रालङ्कारोंमें से (१) 'यमक' के सुकर और दुष्कर भेदोंका निरूपण दण्डी जितने व्यवस्थित और समग्र रूपमें सम्भवतः किसी अन्य अलङ्कारशास्त्रीने नहीं किया है। (२) आकारवैचित्र्यनिबन्धन वाले चित्र शब्दालङ्कारोंमेंसे आचार्यने केवल (i) गोमूत्रिका, (ii) अर्धभ्रमक, तथा (iii) सर्वभ्रमण सर्वतोभद्र बन्धोंका निरूपण अन्य बन्धोंके उपलक्षणार्थ (७८-८२ में) किया है । (३) स्वर, स्थान और व्यञ्जनोंके नियमके वैचित्र्य वाले चित्र वर्णनियम शब्दालङ्कारका निरूपण भी उपलक्षणार्थ ८३-६५ श्लोकोंमें १२ उदाहरणोंसे किया है ।२ (१) गोमूत्रिका दुष्कर बन्ध—श्लोकके चार पाद दो अर्धोंमें निबद्ध होते हैं । प्रथम और द्वितीय पादोंसे पूर्वार्ध बनता है और तृतीय एवं चतुर्थ १. रत्नदर्पण २।१०६ : (१) 'चित्रम् = आलेख्यम् । तदिव जीवितस्थानीय- ध्वनिरहितं चित्रम् ।' इति काश्मीरकाः । तदसद्—ध्वनेः प्राधान्या- नङ्गीकारात् प्रतीयमानमात्राभावस्य क्वचिदप्यसम्भवात् । (२) यद् वा 'आकृतिविशेषयुक्तं चित्रम्' इति । तदपि न, अव्यापकत्वात् । (३) अतो 'वर्णादिनियमेन प्रवृत्तमाश्चर्यकारितया चित्रम्' इत्येव युक्तम् । २. चित्रबन्धोंके भरपूर प्रदर्शनके लिये प० हृषीकेश चतुर्वेदीकी हृषीकेश- ग्रन्थावली देखें ।
६८ काव्यादर्श [३।७६ मदनो मदिराक्षीणामपाङ्गास्त्रो जयेदयम् । मदेनो; यदि तत् क्षीणमनङ्गायाञ्जलिं दधे' ॥ ७६ ॥ मादक नयनों वालियोंके अपाङ्ग (कटाक्ष) रूपी अस्त्र वाला यह मदन (मस्त, मदहोश बना देने वाला कामदेव) मेरे पापको जीत ले। अगर वह (पाप) क्षीण हो जाये, तो मैं देहरहित (कामदेव) को अञ्जलि प्रदान करता हूँ ॥ ७६ ॥ पादोंसे उत्तरार्ध । इन दोनों अर्धोंमें पूर्व और उत्तर अर्धोंमें क्रमशः एकेक वर्णका व्यवधान करके ऊपर-नीचे, वर्णोंको एक क्रममें रखनेसे वही वर्ण- विन्यास निष्पन्न होता है, जो मिश्रित होने वाले पादोंका है। बैलकी मूत्र- धाराके समान ऊपर नीचे गति करनेसे गोमूत्रका आकार बन जानेसे, उसके सादृश्य वाला यह चित्र बन्धन 'गोमूत्रिका बन्ध' कहलाता है। गोमूत्रिकाके आकारकी निष्पत्तिके लिये पृथक् प्रयत्नसे निष्पाद्य होनेके कारण यह बन्ध दुष्कर है ॥ ७८ ॥ (१) गोमूत्रिका चित्र बन्धका उदाहरण—'मदनो मदिराक्षीणा०' (७६) में कविने किसी मादक नयनों वाली सुन्दरीके नयनशरोंसे आहत युवाकी विप्रलम्भ रतिका चित्रण प्रकृत श्लोकमें किया है। वह युवा सुन्दरीके कटाक्षरूपी विकट शरको कामदेवका अस्त्र समझता है। वह प्रार्थना करता है कि इस अलौकिक अस्त्रसे कामदेव उसके इस पापको नष्ट कर दे, जिसके कारण उसका अपनी प्रियासे सङ्गम नहीं हो पा रहा है। यदि युवाका वह पाप कामदेवने क्षीण कर दिया, और उसे उसकी प्रियाका सङ्गसुख प्राप्त हो गया, तो वह कामदेवको प्रणामाञ्जलि प्रदान करेगा। यहाँ 'एनस्' (पाप) को जीतने (जयेत्) की अपेक्षा वादिप्रोक्त 'दहेत्' पाठ अधिक उचित है। इसी प्रकार 'अञ्जलि देने' से 'जलाञ्जलि' या 'तिला- ञ्जलि' देना व्यक्त होता है, जो 'अनङ्ग' कहनेसे कामकी मृत्युका अनिष्ट अर्थ सूचित करता है। अतः 'ददे'के स्थानपर 'दधे' उचित है : धारण प्रणामाञ्जलिका मस्तकसे होता है; यही अभीष्ट है। 'मदिराक्षीणाम्' का सम्बन्ध समस्त पद 'अपाङ्गास्त्रः' (तत्पुरुषगर्भित बहुव्रीहि) के अवयव 'अपाङ्ग' से उसी तरह है, जैसे 'देवदत्तस्य गुरुकुलम्' वाक्यमें देवदत्तका सम्बन्ध 'गुरुकुल' समुदायके अवयव गुरुके साथ अवयवीसे सम्बन्धके माध्यमसे अवयवसे सम्बन्धके रूपमें होता है। १. 'तरुण० : ० स्त्रं । वादीटीका : '० स्त्रं जयन्दहेत् ।' इति पाठः । 'ददे' को पाठभेद तथा 'दधे' को स्वीकृत पाठ माना है।
३।८०] २. चित्र बन्ध : (२) अर्ध-भ्रम, (३) सर्वतो-भद्र ६६ (२) प्राहुरर्धभ्रमं नाम श्लोकार्ध-भ्रमणं यदि । (३) तदिष्टं सर्वतोभद्रं भ्रमणं यदि सर्वतः ॥ ८० ॥ (२) अगर श्लोकके अर्धोंका भ्रमण होता है, तो 'अर्धभ्रम' नामक चित्रबन्ध कहते हैं । (३) अगर सब दिशाओंमें भ्रमण हो, तो वह 'सर्वतोभद्र' इष्ट है ॥ ८० ॥ यहाँ पूर्व वर्ण पूर्वार्धका एवम् उत्तर वर्ण उत्तरार्धका, फिर पूर्वार्धका, फिर उत्तरार्धका इस प्रकार एकेक अक्षर छोड़कर लेनेसे उत्तरार्धका ही पाठ निष्पन्न होगा । उत्तरार्धका पूर्व वर्ण और पूर्वार्धका उत्तरवर्ण लेनेसे श्लोकका पूर्वार्ध ही निष्पन्न होता है । इस प्रकार ऊपर नीचेका और नीचे ऊपरका वर्ण लेनेसे गोमूत्रधाराका सा आकार बनता है । अतः इसे 'गोमूत्रिका चित्रबन्ध' कहते हैं । द म रा णा पा स्त्रो ये यम् ∧ ∨ ∨ ∨ ∨ ∨ म नो दि क्षी म ङ्गा ज द ∨ ∧ ∧ ∧ ∧ ∧ ∧ दे य तत् ण न याञ् लिं धे ॥ ७६ ॥ (२) अर्ध-भ्रम चित्र बन्ध—श्लोकके चारों पादोंको चार पङ्क्तियोंमें लिख लें । चारों पङ्क्तियोंके प्रथम अक्षरोंको ऊपरसे नीचेकी ओर पढ़नेपर आठ पादार्ध बन गये । अब प्रथम और अन्तिम पङ्क्तिको पढ़नेसे श्लोकका पहला पाद निष्पन्न होगा, द्वितीय और सप्तमसे दूसरा, तृतीय तथा षष्ठसे तीसरा एवं चतुर्थ तथा उसके बाद पञ्चम अक्षरोंको ऊपरसे नीचेकी ओर पढ़नेसे चौथा पाद निष्पन्न होगा । इसे ही 'अर्ध-भ्रमक' कहते हैं । (३) सर्वतो-भद्र चित्र बन्ध—यदि श्लोकके घटक वर्णोंका ऊपरसे नीचे, नीचेसे ऊपर, दायेंसे बाएँ और बायेंसे दायें सब दिशाओंमें भ्रमण होनेसे श्लोक अव्याहत रहता है, तो इसे 'सर्वतो-भद्र' विचित्र बन्ध कहते हैं । इस प्रकार सब दिशाओंमें भ्रमणके लिये श्लोकके चार पादोंको अर्धभ्रमके समान चार पङ्क्तियोंमें लिखनेके बाद उन्हीं पादोंको चार पादोंमें नीचेसे ऊपर की ओर अर्धभ्रमसे व्युत्क्रम करके लिखा जाता है । इस प्रकार अनुष्टुप्के ६४ अक्षरोंको ६४ कोष्ठकोंमें लिखनेपर चाहे जिधरसे पढ़ें, आठ अष्टकोंसे चार पाद अनुलोम विधिसे और चार पाद प्रतिलोम विधिसे निष्पन्न होकर श्लोक पूरा हो जाता है । इस वैचित्र्यके कारण यह बन्ध 'चित्र' भी हो जाता है, दुष्करता तो स्वतः स्पष्ट है ही । कोषोंमें इसे 'काव्यचित्र' कहा है ।१ १. सर्वतोभद्र इत्युक्तः काव्यचित्रे, गृहान्तरे । मेदिनीकोष २८।३०८
१०० काव्यदर्श [ ३ । = १ (२) मनोभव, तवानीकं नोदयाय न मानिनी । भयादमेयामामावा वयमेनोमया नत ॥ ८१ ॥ (२) हे मनमें होने वाले (कामदेव), मानवती सुन्दरी रूपी तुम्हारी सेना उदय (विजय) में समर्थ नहीं, ऐसा नहीं है । हे निकृष्ट, (उसके) भयसे अपरिमेय विरहज्वरसे बँधे हुए हम पापी हैं (जो मिलन नहीं हो पा रहा है) ॥ ८१ ॥ कर्मकाण्डमें 'सर्वतोभद्र' मण्डलके समान कोष्ठबन्धके कारण इसे यह नाम दिया गया है ॥ ८० ॥ (२) अर्ध-भ्रम चित्र बन्ध—इस श्लोकमें कविने किसी प्रेमीकी विप्रलम्भ- रतिका वर्णन उसके द्वारा कामदेवको उलाहना दिलानेसे किया है : काम- देवकी सुन्दरी रूपी सेना बड़ी मानिनी (हठीली) है; वह जिसे पराजित करना धार ले, उसे पराजित किये बिना चैन नहीं लेती; हमेशा सफल रहने के कारण भी उसे बड़ा मान है । इस प्रकारकी यह सेना कामदेवके लिये उदयकारी (विजयदायिनी) न हो, यह सम्भव नहीं है । वह मुझसे रूठी है । यह हमारा ही पाप है कि हम उस सेनाके भयसे अपरिमित आम (रोग, पीड़ा, प्रेम ज्वर) के बन्धनमें जकड़े बैठे हैं । हे काम, तुम बड़े निकृष्ट (नत) हो, जो इस प्रकार पीड़ा दे रहे हो । अमेयामामावाः—अमनम् आमः, अम रोगे (भ्वादि०), भावे घञ् । अमेयः मातुं न शक्यश्चासावामः अमेयामः । आ समन्तात् मनसि, बुद्धौ, सर्वा- ङ्गेषु च मवनं मावः बन्धनम् आमावः । अमेयामस्य आमावः (षष्ठी तत्पुरुष) अमेयामामाव एषामिति अमेयामामावाः (मत्वर्थीय अच्) । १ ३ ५ ७ ८ ६ ४ २ | म नो भ व ↑ | त वा नी कं | नो द या य | न मा नि नी । | भ या द मे | या मा मा वा ↓ | व य मे नो | म या न त ॥ ————→ ————→
३।८२] २. चित्र बन्ध : (३) सर्वतो-भद्र १०१ (३) सामायामामा या मासा मारनायायाना रामा । यानावारांरावाऽऽनाया मायारामा मारायामा ॥१ ८२ ॥ (३) वह सुन्दरी मधुमासके कारण (मास) मापसे रहित (अम) विस्तार (आयाम) वाले रोग (आम) से युक्त (सामायामा) है, जो कामदेव (मार) के जाल (आनाय) में आगमन (आयान) से युक्त है, प्रियतमको गमन (यान) से रोकने (आवार) की गुहारों (आराव) वाली, प्राणों (आन) को नहीं प्राप्त करने वाली (अ-या, अर्थात् प्रेमकी अत्यन्त तीव्र अवस्थामें स्थित होनेके कारण मरणके निकट पहुँची हुई, आनाया) है। लीलाओं (मायाओं) से आनन्दित करने वाली (रामा) काम (मार) के विस्तार (आयाम) से युक्त हो गई है ॥ ८२ ॥ डा० श्री धर्मेन्द्रकुमार गुप्तने उपर्युक्त सम्पूर्ण चित्रको उल्टा करके भी, उक्त क्रमसे ही, इससे पादोद्धार किया है।२ पर इसमें लिपिको ऊर्ध्वमुख करके लिखनेके अतिरिक्त कोई वैचित्र्य नहीं है। यों तो अगर वर्णोंको तिरछा करके लिख दिया जाये, तब भी तिरश्चीन चित्र बन जायेगा । वह भी दक्षिणामुख और उत्तरामुख दो प्रकारका हो सकता है। अतः यह सब व्यामोह मात्र है ॥ ८१ ॥ (३) सर्वतो-भद्र चित्र बन्ध – बयासीवें श्लोकमें कविने किसी सुन्दरीकी प्रेमपीरका वर्णन अनुष्टुभ् जातिके विद्युन्माला छन्दमें किया है। पीड़ाके आयामके वर्णनके लिये सर्वदीर्घाक्षर यह छन्द, उपयुक्त है। इसे आगे (८७वें श्लोकके रूपमें ११० पृष्ठ पर) स्वरनियमके उदाहरणमें भी दिया गया है। यहाँ यह सर्वतोभद्र मण्डलके आकारवाली विचित्र रचना (चित्र बन्ध) के उदाहरणके तौरपर दिया गया है। इसके निबन्धनमें व्यपेत पादाद्यन्त प्रतिलोम यमक तथा अव्यपेत पादमध्य प्रतिलोम यमकका उपयोग होता है। परन्तु प्रतिलोम रचना उपाय है सर्वतोभद्र आकारकी प्राप्तिका । अतः मुख्य चित्रता सर्वतोभद्रके कारण होनेसे यह उदाहरण उसीका माना जायेगा। इसी प्रकार दीर्घाक्षर नियम भी सर्वतोभद्रके अङ्गके रूपमें ही शोभायुक्त है। अतः यहाँ प्रतिलोमयमक चित्रालङ्कार, स्वरनियम चित्रालङ्कार और सर्वतोभद्र चित्रालङ्कार, इन तीनों शब्दालङ्कारोंका सङ्कर है। अङ्गाङ्गि- १. काव्यादर्श, सुदर्शना, मेहरचन्द लछमनदास, दिल्ली, पृष्ठ ३३२ । २. अन्वय : सा रामा अमायामामा, या मासा मारनायायाना, यानावारा- रावाना-या । माया-रामा मारायामा ।
१०२ काव्यादर्श [३।८३ ३. यः (१) स्वर-(२) स्थान-(३) वर्णानां नियमो, दुष्करेष्वसौ । इष्टश्चतुःप्रभृत्येषु दृश्यते; सुकरः परः ॥ ८३ ॥ ३. (१) स्वरों, (२) उच्चारण-स्थानों (३) वर्णों (व्यञ्जनों) की जो व्यवस्था होती है, वह चार आदि/तक सङ्ख्यामें दुष्कर रूपमें अभीष्ट है । उससे भिन्न, अर्थात् अधिक सङ्ख्यामें, नियम सुकर होता है । (इष्टसे) पर (अन्य, अर्थात् अनिष्ट) है ॥ ८३ ॥ भाव सङ्कर दो हैं : (१) प्रतिलोमयमक और सर्वतोभद्रका; (२) स्वर- नियमचित्रालङ्कार और सर्वतोभद्रका । यमक और स्वरनियम चित्रोंकी संसृष्टि एक है । इस बन्धकी दुष्करता स्पष्ट है । सा मा या मा मा या मा सा । मा रा ना या या ना रा मा । या ना वा रा रा वा ना या ॥ मा या रा मा मा रा या मा ॥ ॥ मा या रा मा मा रा या मा ॥ या ना वा रा रा वा ना या । मा रा ना या या ना रा मा । सा मा या मा मा या मा सा ॥ ८२ ॥ ३. वर्णनियमवान् चित्र बन्ध—(१) वर्णोंकी आवृत्तिसे अनुप्रास, (२) वर्णसमुदायकी सुकर, दुष्कर, अनुलोम, प्रतिलोम आवृत्तियोंसे यमक, (३) वस्तुविशेषके स्वरूपको प्रकट करने वाले वर्णविन्याससे आकारबन्धके रूपमें तीन प्रकारके चित्र (रचनाविधानकी दृष्टिसे विचित्र, आश्चर्यकारी) शब्दालङ्कार बतानेके बाद आचार्य दण्डी अब ८३-६५ में वर्णोंके व्यवस्था- युक्त, नियमित, प्रयोगसे होनेवाली शब्दलभ्य शोभाके विधायक अलङ्कारका निरूपण कर रहे हैं । रचनाविधानकी दृष्टिसे यह व्यवस्थित निबन्धन भी असाधारण है, अद्भुत है, अतएव चित्र है । वर्णोंकी व्यवस्थासे लभ्य यह अलङ्कार वर्णोंके दो प्रकारों—स्वर और व्यञ्जन तथा उन दोनोंके भी आधार उच्चारणस्थानका नियत स्वरूप तथा सङ्ख्यामें प्रयोग करनेपर निर्भर करता है । 'स्वर' और 'व्यञ्जन' दोनोंसे सम्बद्ध होनेके कारण आचार्यने 'स्थान' का निर्देश मध्यमें किया है ।
३।८३] ३. वर्ण-नियमवान् चित्र बन्ध : (१) स्वरणियम १०३ (१) स्वरणियमवान् चित्र बन्ध—उच्चारण स्थानके भेदसे भिन्नताको प्राप्त करने वाले अकार, इकारादि स्वर मात्रा, नासिक्यानासिक्यताके कारण अवान्तर भेदोंसे युक्त हैं। लौकिक भाषामें उदात्तादि बलाघातरूप स्वरोंकी पहचान वैदिक कालके उतारसे ही नहीं रही है। अतः उनके कारण सम्पन्न स्वरभेद यहाँ अपेक्षित नहीं है। १ अवान्तर भेदोंको दृष्टिमें न रखकर मुख्यतया (स्थानभेदके कारण) भिन्न स्वरोंका श्लोकमें यदि किसी नियमसे, व्यवस्थासे, प्रयोग होता है, तो यह स्वरणियम होता है। आचार्यका कहना है कि स्वरोंकी सङ्ख्या यदि एक पादमें एक स्वरकी दृष्टिसे चार तक रहती है, तो चारों पादोंमें एक स्वर दो अर्धोंमें एकेकके हिसाबसे, दो स्वरों, चारों पादोंमें मिले-जुले या क्रमिक तीन स्वरों और चार पादोंमें एकेक करके चार स्वरों तकके प्रयोग वाले बन्ध दुष्कर ही होंगे। आचार्यकी चिन्तनपरम्पराको देखते हुए इस व्यवस्थामें और प्रकार भी उपलक्षित समझने चाहिये। स्वर (१) कण्ठ्य, (२) तालव्य, (३) ओष्ठ्य और (४) मूर्धन्यके भेद से शुद्ध अवस्थामें अ, इ, उ, ऋ चार हैं। इन्हें शिक्षाशास्त्रमें 'समानाक्षर' (simple vowels) कहा जाता है। कण्ठ और तालु तथा कण्ठ और ओष्ठ दो-दो स्थानोंमें निष्पन्न होनेसे ए, ऐ ओ तथा औ भी चार हैं। इन्हें 'सन्ध्य- क्षर' (diphthongs) कहा जाता है। यों तो दन्त्य 'ऌ' भी समानाक्षरोंमें संस्कृतमें किसी समय था। पर बहुत प्राचीन कालसे ही वह √ कृप् के एक रूप √ कॢप् के ही कुछ शब्दोंमें सीमित है। २ वस्तुतः यह मूर्धन्य अक्षरोंके १. वादीजीने 'स्वर' के विवरणमें यहाँ उदात्तानुदात्तस्वरितके भेदसे भिन्नता की चर्चा की है। वह शास्त्रकी दृष्टिसे भले ठीक हो, पर प्राप्तिकी दृष्टिसे ठीक नहीं है। २. ऋक्प्रातिशाख्य १।१३ : अष्टौ समानाक्षराण्यादितः । ततश्चत्वारि सन्ध्यक्षराण्युत्तराणि । एते स्वराः । ६ : सर्वः शेषो व्यञ्जनान्येव । १३।३४-३५ : रेफोऽस्त्यूकारे च परस्य चार्धे पूर्वे ह्रसीयांस्तु न वेतर- स्मात् । मध्ये सः ।। तस्यैव लकारभावे धातौ स्वरः कल्पयताल्ऌकारः ।। सन्ध्यानि सन्ध्यक्षराण्याहुरेके; द्विस्थानतैतेषु तथोभयेषु ।। ३८ सन्ध्येष्वकारोऽर्धमिकार उत्तरं युजोरुकार इति शाकटायनः ।। ३६ मात्रासंसर्गादवरेऽपृथक्श्रुती ('अवरे पृथक् श्रुती' इति वा योजना) ।।४० ह्रस्वानुस्वारव्यतिषङ्गवत् परे ।। ४१
दन्त्यीकरणकी पुरानी प्रकृत प्रवृत्तिको संस्कृतमें स्वीकारनेकी दिशामें ही एक प्रयास था, जो अन्तस्थके स्तरपर तो पनपा, पर स्वरके स्तरपर नहीं पनप पाया। इसे ही 'रलयोरभेदः', 'डलयोरैक्यम्', 'ऌ-लृवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्' (अष्टा० पर वार्तिक) के रूपमें कहा गया है। (२) स्थाननियम चित्रबन्ध—जब कवि अपनी रचनामें एक ही स्थानसे उच्चार्य स्वरों और व्यञ्जनोंका प्रयोग करता है, तब काव्य स्थाननियमके कारण श्रव्य शोभासे युक्त हो जाता है। (३) वर्णनियमवान् चित्रबन्ध—शिक्षावेदाङ्गके अनुसार यद्यपि 'वर्ण' शब्द पदकी घटक ध्वनिके लिये प्रयुक्त है, जो 'स्वर' और 'व्यञ्जन' दो प्रकारकी है, पर 'स्वर' के साहचर्यसे यहाँ यह पारिशेष्य नियमसे 'व्यञ्जन' अर्थमें है। स्वरनियमके समान ही यह भी पूरे श्लोकमें एक वर्ण, दो वर्ण, तीन वर्ण और चार वर्ण तक तो कवियोंको चारुत्वनिबन्धनके रूपमें अभीष्ट है। जितने अधिक वर्णोंका प्रयोग होगा, वह बन्ध उतना सुकर होता जायेगा। दुष्करको प्रेम करने वाले कविमल्लोंको उसमें अपनी सामर्थ्य दिखानेका अवसर नहीं मिलता। अतः वह इष्ट नहीं है। आचार्यने इन तीनों प्रकारोंका प्रदर्शन चार-चार उदाहरणोंसे किया है। अत एव लक्षणवाक्यमें 'चतुः-प्रभृति' का अर्थ अधिकतम सङ्ख्या ४ ही टीकाकारोंने बताई है। किन्तु वर्णनियमके क्रममें प्रदत्त प्रथम उदाहरण (६२) में नियत स्वर, व्यञ्जन और दोनोंके स्थानोंकी सङ्ख्या पाँच-पाँच है। अतः 'चार' की सङ्ख्या इयत्ताकी अवधि नहीं बताती है, जैसा कि तरुणवाचस्पतिने माना है, अपितु यहाँ 'प्रभृति' शब्द 'आदि' अर्थमें है। श्लोककी संयुक्त अक्षरसङ्ख्यामें चार-पाँचसे अधिक स्वरों, व्यञ्जनों अथवा इनसे अधिक स्थानोंसे उच्चार्य वर्णोंसे श्लोककी रचना होगी, तो चारुत्व कम होता जायेगा। अतः 'चतुः-प्रभृति' उपलक्षक है अमहर्ती सङ्ख्याका। जितने ही कम स्वरों, स्थानों और व्यञ्जनोंका नियमन होगा, काव्य उतना ही अधिक दुष्कर होगा। सङ्ख्या जितनी बढ़ती जायेगी, दुष्करता उतनी कम होती जायेगी और परिणामतः चित्रता भी। 'चतुः-प्रभृति' में अवधिवाचक शब्द न देनेसे तथा चारसे अधिकका नियमन ६२वें श्लोकमें प्रस्तुत करनेसे आचार्यका यही अभिप्राय प्रतीत होता है। १. इस वार्तिकके खण्डनार्थ कृपो रो लः, वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी, भ्वादिपर हमारी भवतोषिणी, पृष्ठ ५२४ देखें।
३।८४] ३. वर्णनियम : (१.१) स्वरचतुष्टयनियम चित्रबन्ध १०५ (१.१) आम्नायानामाहान्त्या वाग् गोती रीतोः, प्रीतोर्भीतीः । (१.१) शास्त्रोंका निष्कर्ष रूप वाणी (दर्शन शास्त्र) गाना बजाना तत्त्वं वेत्ति स्वयं दण्डी, के वयं मन्द-धी-हताः ? युक्तिसोपानमाश्रित्य गम्यते महतां मनः ॥ इन सब विधाओंका प्रयोग दण्डीसे पूर्वके किसी काव्यमें उपलब्ध नहीं है। किरातार्जुनीयमें (३) चतुर्वर्णनियम (१५।५में), द्विवर्णनियम (३८में), एकवर्णनियम (१५) उपलब्ध हैं। (२) स्थाननियम (७ और २६ में) एक अन्य प्रकारसे (किसी एक स्थानविशेषसे उच्चार्य वर्णोंका प्रयोग न करके) ओष्ठ्य वर्णोंके बहिष्कारसे उपलब्ध है। यहाँ तो दो श्लोकोंमें ओष्ठ्य वर्णोंके बहिष्कारकी बात है, दण्डीने तो पूरे एक उच्छ्वासमें ओष्ठ्य वर्णोंका बहिष्कार इसलिये किया है, क्योंकि उसमें वक्ता नायकका ओंठ उसकी ललित वल्लभाने प्रेमोन्मादमें इतने जोरसे काटा कि वह ओष्ठ्य स्वरों और व्यञ्जनोंका उच्चारण नहीं कर सकता था।१ माघने (१९वें) सर्गमें चित्र- बन्धोंका प्रारम्भ ही चतुर्वर्णनियमसे (१६।३में) किया है। द्वयक्षर श्लोक ६६, ८४, ८६, ६४, ६८, १००, १०४, १०६, १०८ में तथा एकाक्षर श्लोक ११४ में हैं। (२) स्थाननियम के माघने दो श्लोक दिये हैं : निरोष्ठ्य श्लोक (११), अतालव्य श्लोक (११०)। इस विवेचनसे स्पष्ट है कि दण्डीका निरूपण प्रयोगोंमें उपलब्धिपर ही आधारित नहीं है; अपितु उन्होंने इस प्रकारके निबन्धनकी विवेचना शास्त्र- कारसे अपेक्षित मर्यादा एवं गरिमाके साथ स्वतन्त्र ऊहके रूपमें की है। उनके आसपासके भामह, उद्भट आदि आचार्य दृष्टिकी सूक्ष्मता, विशालता, मर्मस्पर्शिता, एवम् पदार्थके सौन्दर्यको अधिकसे अधिक आयामोंमें देख सकने की क्षमतामें दण्डीके कहीं आसपास भी नहीं ठहरते। एकमात्र अपवाद पहले मुनि भरत और बादमें आनन्दवर्धन हैं ॥ ८३ ॥ (१) स्वरनियम चित्रबन्ध—(१) स्वरचतुष्टयनियम : इस श्लोकमें कविने विद्युन्माला छन्दमें प्रथम पादमें 'आ' स्वरका, द्वितीयमें 'ई' का, तृतीय में 'ओ' का और चौथे पादमें 'ए' का प्रयोग आठ-आठ बार किया है । इस १. दशकुमारचरित, छठे उच्छ्वासका अन्तः : स (मन्त्रगुप्तः) किल कर- कमलेन किञ्चित् संवृताननो, ललित-वल्लभा-रभस-दत्त-दन्त-क्षत-व्यसन- विह्वलाधर-मणिर् निरोष्ठ्य-वर्णमात्म-चरितमाचचक्षे ।
१०६ काव्यादर्श [३।८४ भोगो रोगो, मोदो मोहो, ध्येये वेच्छेद्देशे क्षेमे१ ॥ ८४ ॥ आदिको बह जाना२ (तथा) प्रीतियोंको भय (बन्धनका कारण) कहती है । (विषयोंका) भोग रोग (पीडाका मूल) है। (विषयोंमें) हर्ष (अथवा हर्ष शोक आदि द्वन्द्व) मोह (बुद्धिपर पड़दा डालने वाला होता) है। (इनके) विकल्पमें (सबका मूल) इच्छा क्षेम (कल्याणकारी) 'ई' लक्ष्मीके देश (श्रीनिवास विष्णु) में स्थापित करनी चाहिये ॥ ८४ ॥ प्रकार एक पादमें एक ही स्वरका प्रयोग करनेसे यहाँ 'एकस्वर पादबन्ध' निष्पन्न हुआ है। श्लोकके चार पादोंमें चार स्वरोंका इस प्रकार व्यवस्थासे प्रयोग होनेके कारण इसे 'स्वरचतुष्टयनियमवान् चित्र बन्ध' कहा है। मिले- जुले रूपमें चार स्वरादिके प्रयोगसे भी ये स्वरनियमादि बन्ध बन सकते हैं । पर वे नादसौन्दर्य कम उत्पन्न करनेके कारण उतने सुन्दर नहीं होंगे । किन्तु यदि ये स्वरादि किसी एक व्यवस्थासे प्रयुक्त होते हैं, तो नादसौन्दर्य उत्पन्न करनेके कारण ऐसा बन्ध भी सुन्दर लगेगा । अतः नियमसे केवल संख्या ही अभीष्ट नहीं है, व्यवस्था भी इष्ट है । उदाहरणार्थ ३।६३ देखें । यहाँ कविने कल्याणकामीको कल्याणका मार्ग शास्त्रके प्रमाणसे बताया है। आस्तिक हो, चाहे नास्तिक, सभी शास्त्रों (आम्नायों) का यह अन्तिम निचोड़ है कि गाना, बजाना, नृत्य आदि आमोद-प्रमोदके साधन प्रेम- व्यापार, विषयभोग, वस्तुतः दुःखकारी हैं। इन सबमें आनन्दकी बुद्धि, एक प्रवाह है, जो मनुष्यको बहा ले जाता है। वह भयका सबसे बड़ा कारण है। वस्तुतः यह मनका एक रोग है, मोह है। इस लिये ये सब हेय हैं। मनुष्यको इच्छाएँ दो ही रखनी चाहिये : (१) देशमें, अर्थात्, तीर्थ, विद्वद्गोष्ठी आदि में और (२) क्षेममें, अर्थात्, मङ्गलमें, जिससे मनुष्यके दुःख समाप्त हों, ऐसे आचरणमें । क्षेम विष्णुको चाहने (भक्ति) से या ई (लक्ष्मी माया) के द (खण्डक ज्ञान) से ई (मायापर) श (विराजने वाले ब्रह्म) से हो सकता है । १. सरस्वतीकण्ठा० २।२८१में धृत तथा रत्नदर्पण और वाडिटीकामें व्याख्यात पाठ 'ध्येये वेच्छेत् क्षेमे देशे' है। रत्नदर्पणमें 'चेच्छेत्' अन्यसम्मत पाठ बताया है। रत्नश्रीमें यही है। वादि-तरुणटीकाओंमें 'इव' की व्याख्या की गई है। रत्नश्रीमें 'इच्छेत्' की व्याख्या नहीं है 'इच्छे'की है। वादीजीने और भी पाठान्तर बताया है: इच्छे देवेति द्वे द्वे, इति च पाठान्तरम् । सही पाठका निर्णय करना दुष्कर है। २. अमरकोष ३।३।६८ : प्रचार-स्यन्दयो रीतिः । कुछ लोगोंने 'ईती:' पद- च्छेद करके इसे 'उपद्रव' अर्थमें पर्यवसित किया है।
३।८५] ३. वर्णनियम चित्र बन्ध : (१.२) स्वरत्रितयनियमवान् १०७ (१.२) क्षिति-विजिति-स्थिति-विहिति-व्रत-रतयः, पर-मतयः । उरु रुरुधुर्गुरु दुधुवुर्युधि कुरवः स्वमरिकुलम ॥८५॥ (१.२) पृथ्वीको जीतने और मर्यादा (व्यवस्था) के विधान रूपी व्रतमें प्रसन्न रहने वाले, उत्कृष्ट सूक्ष्म विषयोंमें समझ वाले (अथवा उत्कृष्ट समझ वाले) कौरवोंने अपने शत्रुसमूहको खूब रुद्ध (बसमें) किया और युद्धमें जोरसे हिला डाला ॥ ८५ ॥ अन्य प्रकारसे पदच्छेद भी हो सकते हैं । 'आम्नायोकी अन्तिम वाणी' से टीकाकारोंने वेदान्त, उपनिषद अर्थ लिया है । पर जब यह सिद्धान्त सर्वसम्प्रदायसम्मत, सार्वभौम, है, तो इसे केवल वेदान्तसे जोड़कर सीमित क्यों किया जाये ? अतः 'आम्नाय' का अर्थ 'वेद'न लेकर 'सम्प्रदाय' उचित है ।१ द्वितीय पादके 'गीतीः' आदि पद 'आह' क्रियाका उद्देश्य और विधेय होनेसे कर्मणि द्वितीयान्त हैं । तृतीय पादमें बुद्धिस्थ कर्मवाच्यके कारण 'भोगः' आदि उद्देश्य और विधेयमें प्रथमाका प्रयोग किया है । 'भोगं रोगं, मोदं मोहम्' होता तो मार्गभेद नहीं होता । चतुर्थ पादके 'धेया' प्रथमान्तको देखते हुए 'गीती रीतिः प्रीतिर्भीतिः' तथा तृतीय पादका यथावस्थित पाठ भी ठीक होता । तब 'गीतीः' आदि वाक्य का कर्म होगा । यहाँ यदि आचार्य 'ए' और 'ओ' के प्रयोगमें क्रमव्यत्याम कर देते, तो (१) प्रथम पादमें कण्ठ्य, (२) द्वितीयमें तालव्य, (३) तृतीयमें कण्ठ-तालव्य और (४) चतुर्थमें कण्ठोष्ठ्यके प्रयोगसे विशिष्ट शोभा हो जाती ॥ ८४ ॥ (१.२) स्वरत्रितयनियमवान् चित्र बन्ध—पच्चासीवें श्लोकमें आचार्यने कौरवोंके शौर्यका वर्णन अर्थख्यापनकी दृष्टिसे सरल किन्तु प्रथम पादमें 'इ', द्वितीय पादमें 'अ', तृतीय पादमें 'उ' तथा अन्तमें 'उ' 'इ' 'अ' एवम् 'अ', 'इ', 'उ' के द्विविध मिले-जुले प्रयोगके कारण दुष्कर बन्धसे किया है । इस प्रकार यहाँ समूचे श्लोकमें तीन ही स्वरोंके त्रिविध प्रयोगसे तीन स्वरोके नियम वाला विचित्र बन्ध सम्पन्न हुआ है । यहाँ आचार्यने त्रिस्वरनियमवान् बन्धके दो प्रकार प्रस्तुत किये हैं : (१) एक पादमें एकविध स्वरका ही प्रयोग करके शुद्ध तथा (२) एक पादमें त्रिविध स्वरोंके द्विविध प्रयोग मिश्र बन्ध । यह भेदव्यवस्था अन्य बन्धोंमें भी प्रयुक्त हो सकती है । द्वितीय प्रकार यदि एक पादमें ही किया जाता है, तो कोई चमत्कार उत्पन्न नहीं कर पायेगा । पर यदि चारों पादोंमें अपनाया जाता है, तो अवश्य शोभाधायक होगा । पर एक पादमें एक स्वर १. अमरकोष : श्रुतिः स्त्री, वेद आम्नायस्त्रयी । अथाम्नायः सम्प्रदायः ।
का ही प्रयोग सुननेमें अधिक अच्छा तो लगता ही है, दुष्कर भी अधिक है । मिश्र बन्धको चतुर्थ पादमें (श्लोकके अन्तमें) देनेसे यह आपेक्षिक शोभावहता भी व्यक्त होती है । पूर्वार्धमें कौरवोंकी (१) योगक्षेमपरायणताका,¹ (२) उत्कृष्ट समझका एवम् उत्तरार्धमें युद्धमें शत्रुकुलको बसमें करने और हिला डालनेका वर्णन किया है कि वह फिरसे उनके सामने खड़ा न हो सके । रत्नश्रीमें धृत, वादिटीका तथा रत्नदर्पण (२।२८०) में व्याख्यात पाठ ‘पर-गतयः’ है । ‘परा गति’ तो मृत्यु होती है, जो यहाँ विजेता कौरवोंके प्रसङ्गमें इष्ट नहीं है । यदि वादिव्याख्यात ‘उत्कृष्ट चेष्टा वाले’² अर्थ लें, तो वह तो योग (पृथिवीविजय) और क्षेम (मर्यादापालन) के वर्णन से कही ही जा चुकी है । अतः अनुवादमात्र है ! इसलिये रत्नश्रीज्ञानकी यह व्याख्या उचित ही है कि योगक्षेमका विधान प्रज्ञाके बिना नहीं हो सकता । (इसलिये अगला विशेषण दिया है) ।³ इस कथनसे प्रतीत होता है कि मुद्रित पाठ भले ही ‘गतयः’ हो, पर रत्नश्रीज्ञानने व्याख्या ‘परमतयः’ की ही की है, ‘परगतयः’ की नहीं । ‘गति’ का अर्थ प्रज्ञा नहीं होता, ‘मति’ का होता है । इसी प्रकार तिरुवादिमं० में मूलमें भले ‘मतयः०’ छपा हो, पर व्याख्यात पाठ ‘गतयः’ ही है । तरुणटीकामें ‘परमतयः’ ही धृत है । उन्होंने व्याख्या नहीं की है । इतिहासमें असत्पक्षके प्रतिनिधि माने जाने वाले कौरवोंके अभ्युदयका वर्णन प्रबन्धकाव्यमें तो दण्डीके ‘धिनोति नः’ (१।२२) पक्षके अधीन ठीक है, पर यहाँ मुक्तकमें अखरता है । हो सकता है कि यह श्लोक किसी प्रबन्धकाव्य का अङ्ग हो । यहाँ ‘ति’ तथा ‘रु’ की अनेक बार और ‘तयः’ की एक बार आवृत्तिसे अनुप्रास है । कविने इस पद्यकी रचना पङ्क्ति जातिके ४६६वें भेद ‘अमृत- १. (क) अविजित क्षितिकी विजिति अप्राप्तकी प्राप्तिके कारण योग है । (ख) प्राप्तकी स्थिति (टिके रहने) का विधान प्राप्तका रक्षण होनेसे ‘क्षेम’ है । २. वादिटीका ३।८५ : परोत्कृष्टा गतिश्चेष्टा येषां, ते परगतयः । ३. रत्नश्री ३।८५ : एतच्च प्रज्ञामन्तरेण न भवतीत्याह—परा शोभापरा, गुणदोषविवेकसमर्था गतिः = प्रज्ञा येषामिति परगतयः । एवं च ‘शक्ति- सम्पन्नरिपुविजयचतुरा’ इत्याचष्टे ।
३।८६] ३. वर्ण-नियम चित्र बन्ध : (१.३) द्विस्वरनियमवान् १०६ (१.३) श्री-दीप्ती, ह्री-कीर्ती, धी-नीती, गीः-प्रीती । एधेते द्वे द्वे ते, ये नेशे देवेशे ॥ ८६ ॥ (१.३ क) लक्ष्मी और तेज, (ख) लज्जा और यश, (ग) प्रज्ञा और नीति, (घ) वाणी और प्रीति ये दो-दो तुम्हारे ही वृद्धिको प्राप्त हो रही हैं, जो कि देवराज (इन्द्र) में (या हे राजन्, शिवमें) नहीं हैं ॥ ८६ ॥ गति' छन्दमें की है। यह अन्यत्र 'अमृतगतिका', 'अमृततिलका', 'त्वरितगति' नामोंसे भी अभिहित है। अन्यत्र इसे 'कुलटा' नाम भी दिया है। इसमें न, ज, न, ये तीन गण तथा अन्तमें एक गुरु होता है और प्रत्येक पाँचवें अक्षरपर यति होती है। पाँचवाँ अक्षर ही गुरु भी होता है१ ॥ ८५ ॥ (१.३) दो स्वरोंके नियम वाला चित्र बन्ध—षडक्षर गायत्री जातिके 'शेषा', 'शेषराज' अपरनामक 'विद्युल्लेखा' छन्दमें२ निबद्ध प्रकृत छियासीवें श्लोकमें कविने अपने वर्ण्य राजाको श्री आदि आठ गुणोंके चार युग्मोंमें देवराज या शिवसे भी बढ़कर बताया है। ये दो-दो गुणोंके चारों युग्म न इन्द्रमें हैं न शिव में; परन्तु वर्ण्य राजा में ये वर्धमान अवस्थामें (एधेते) हैं; कहाँ जाकर रुकेंगे, कोई नहीं कह सकता । (१) इन्द्रमें श्री तो है, पर दीप्ति (तेज) विलासिता के कारण नहीं है। जब भी शत्रुओंका आक्रमण होता है, दौड़े जाते हैं ब्रह्मा, विष्णु, महेशके या और तो और किसी पार्थिव प्राणीके ही पास सहायता लेनेको । (२) देवराज हैं, पर उनमें न लज्जा है, न यश । कामुकके रूपमें निर्लज्जकी प्रसिद्धि अलबत्ता अवश्य है। यह उनकी सहस्राक्षता से ही व्यक्त होता है । (३) कामुकमें बुद्धि होती भी है, तो वह नीतिका अनुसरण नहीं करती । (४) ऐसे स्वार्थप्रेरित पुरुषमें मधुर वाणी और उससे सम्पाद्य प्रीति भी दुर्लभ ही होती है ।३ श्मशानवास, दिगम्बरता, १. दिअवर हार पअलिआ पुण वि तह डिअ करिआ । वसु-लहु वे गुरु सहिआ अमिअगइ, धअ कहिआ ॥ प्राकृतपैङ्गल २।६६ कुलटा स्यान्नजनगा, पञ्चभिः पञ्चभिर्यतिः । २. वाराहा मत्ता जं कण्णा तीआ होतं । हारा छक्का बन्धो सेसा राजा छन्दो ॥ प्राकृतपैङ्गल २।४२ वृत्तरत्नाकर ३।६ : विद्युल्लेखा मो मः । नारायण भट्ट : गायत्री तककी जातिके छन्दोंमे पादान्तयति होती है, यह छान्दस उपदेशपरम्परा है । ३. कविका प्रेरणास्रोत श्रीमद्भागवत (८।८।२०) प्रतीत होता है : कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः, स ईश्वरः किं ? परतो व्यपाश्रयः ॥
११० काव्यादर्श [३।८७-८८ (१.४) सामायामा मायामासा मारानाया यानारामा । यानावारा रावानाया मायारामा मारायामा ॥ ८७ ॥ (२.१) नयनानन्द-जनने, नक्षत्र-गण-शालिनि । अघने गगने दृष्टिरङ्गने, दीयतां सकृत् ॥ ८८ ॥ (२.१) हे प्रशस्त अङ्गों वाली, नयनोंको आनन्द उत्पन्न करने वाले नक्षत्र- समूहसे सुशोभित, मेघरहित गगनपर एकबार तनिक नज़र तो डालो ।।८८।।
अशुचिता, विरक्ततासे शिवमें भी श्री, ह्री, नीति और प्रीतिका अभाव स्वतः
व्यक्त है।
यहाँ श्लोकके पूर्वार्धमें सब १२ अक्षर दीर्घ इकार हैं और उत्तरार्धमें सभी
१२ अक्षर एकार हैं । यह बन्ध 'ई', 'ए' के व्यस्त प्रयोगसे भी बन सकता
है । उसका सौन्दर्य व्यवस्थाके तारतम्यपर निर्भर करता है। इस प्रकार
दो स्वरोंसे ही निबद्ध होनेसे यह श्लोक विचित्र शोभासे सम्पन्न हो गया है ।
यह शोभा शब्दों (वर्णविन्यास) से प्राप्य होनेके कारण यह वर्णविन्यास
शब्दालङ्कार है । दो स्वरोंमें सीमित होनेसे दुष्कर भी है ।। ८६ ।।
(१.४) एकस्वर नियमवान् दुष्कर चित्रबन्ध—यह श्लोक पीछे 'सर्वतो-
भद्र चित्रबन्ध' के उदाहरणके रूपमें (३।८२, पृष्ठ १०१ पर) आ चुका है।
अर्थ तथा अन्य वक्तव्य वहाँ कहा जा चुका है । यहाँ यह आचार्यने एक
'आ' स्वरके ही बत्तीस बार प्रयोगके कारण एक स्वरनियम चित्रबन्धके
उदाहरणके रूपमें दिया है । इसीसे इस अलङ्कारका भी उदाहरण प्रस्तुत
हो जानेके कारण अलग उदाहरण देना आवश्यक नहीं समझा है । १ दोनों
शब्दालङ्कार तुल्यबल हैं। अतः इनकी संसृष्टि है ।। ८७ ।।
(२.१) चार स्थानोंसे उच्चरित वर्णोंके ही प्रयोग वाला चित्र बन्ध—
वर्णनियमवान् चित्रबन्धके द्वितीय भेद स्थाननियमके इस प्रथम उदाहरणमें
कविने नकारावृत्तिसे सम्पन्न अनुप्रास वाले प्रथम पादमें न-विपुला तथा शेष
पादोंमें श्लोकके प्रयोगसे नायकने रजनीमें झिलमिलाते तारों वाले शरद् ऋतु
के स्वच्छ गगनकी शोभापर एक नज़र डालनेकी प्रार्थना सजनीसे की है ।
१. रत्नश्री : सर्वतोभद्रं पूर्वोक्तमेकस्वरोदाहरणमपि कल्पत इति पुनरुदा-
हृतम् । एकस्वरोदाहरणमात्रमिह विवक्षितम् । तच्च पूर्वसिद्धमेव
सम्भवतीति किमपूर्वेणेदृशेनाहोपुरुषिकामात्रेणेति भावः ।
३।८६] ३. वर्णनियम : चित्र बन्ध (२.२) त्रिस्थानवर्णनियमवान् १११ (२.२) अलि-नीलालक-लतं कं न हन्ति घन-स्तनि ? आननं नलिन-च्छाय-नयनं शशि-कान्ति ते ॥ ८६ ॥ (२.२) हे मघन स्तनों वाली, भ्रमरसमान काली घुंघराली अलकावली वाला, कमलसमान शोभासे युक्त नज़रों वाला, चन्द्रके समान कान्ति वाला तुम्हारा मुख किसे कष्ट नहीं पहुँचाता है ? ॥ ८६ ॥ प्रथम पाद तृतीयपादोक्त 'गगने' का सप्तम्यन्त विशेषण भी हो सकता है, तो 'अङ्गने' का सम्बुद्धिविभक्त्यन्त विशेषण भी हो सकता है । 'अघने' से शरद् ऋतुके कारण 'निरभ्रे' अर्थ अभिप्रेत है । नक्षत्रोंसे शोभित निरभ्र गगनमें एक ही कमी रह गई है चन्द्रकी । वह यहाँ तुम मेरे पास हो ! अतः 'हे नयनोंको आनन्दित करने वाली' कहना अधिक उपयुक्त है । 'आनन्दजनने' से √ह्लाद्, √चन्द् धातुओंका अर्थ कविने जानबूझकर कहा हैं। नयनोंकी कमलसे प्रसिद्ध समानताको दृष्टिमें रखते हुए 'चन्द्र' या 'चन्द्रिका' का तथा नयनोंका प्रयोग नहीं किया है, क्योंकि कमल और चन्द्रमा में विरोध जो है। 'दृष्टि'से कमलकी प्रतीति नहीं होती । यहाँ कविने समूचे श्लोकमें कण्ठ्य अकार ह्रस्व, गुरु और दीर्घ तीनों प्रकारका, (ii) तालव्य इकार (ह्रस्व और दीर्घ), (iii) कण्ठतालव्य ए तथा (iv) मूर्धन्य ऋ (ह्रस्व और गुरु), इन चार स्थानोंसे उच्चार्य स्वरोंका प्रयोग किया है । (i) कण्ठ्य क, ख, १ ग, घ, ङ का, (ii) तालव्य ज, य, श का, (iii) मूर्धन्य ट, ण, र, और षका तथा (iv) दन्त्य त, द, न, और स का इस प्रकार इन चार ही स्थानोंसे उच्चार्य व्यञ्जनोंका प्रयोग कविने किया है । कविने इन स्थानों से उच्चार्य वर्णोंके चयनमें एक और बात ध्यानमें रखी है : (१) स्वरोंमें मात्रिक अवान्तर भेद भी दिये हैं । (२) व्यञ्जनोंमें (i) स्पर्श, (ii) अन्तस्थ और (iii) ऊष्म प्रत्येक वर्गका चयन किया है । इस प्रकार यहाँ शब्दचयनकी दुष्करता स्पष्ट है ॥ ८८ ॥ (२.२) तीन स्थानोंमें उच्चरित वर्णोंके नियम वाला चित्र बन्ध- प्रस्तुत ८६ वाँ श्लोक स्थाननियमवाले चित्रबन्धके द्वितीय त्रिस्थान वर्णनियम चित्रबन्धको प्रदर्शित करनेको दिया है। इसमें कविने वक्ताकी रतिके आलम्बन १. 'नक्षत्र' के 'क्ष' का पूर्वाङ्ग 'क्' 'ष्' के योगमें 'ख्' के रूपमें भी उच्चरित होता है : चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् (सिद्धान्तकौमुदी, हल्सन्धि); शुक्लयजुःप्रातिशाख्य ४।१२० : असस्थाने मुदि द्वितीयं शानकस्य ।
११२ काव्यादर्श [३।६० (२.३) अनङ्ग-लङ्घनालग्न-नानाऽऽतङ्का सदङ्गना । सदानघ, सदानन्द, नताङ्गासङ्ग सङ्गत ॥ ६० ॥ (२.३) हे सदा अनघ (पापरहित), सदानन्द (श्रेष्ठोंको आनन्दित करने वाले), नत (विनत) अङ्गों वालीको प्रेम करने वाले मित्र, वह श्रेष्ठ सुन्दरी अनङ्गका लङ्घन (कामदेवकी मर्यादाका अतिक्रमण) करनेके कारण तरह- तरहके आतङ्कोंमें आ घिरी है। (उसे तुम कामदेवके कोपसे बचाओ) ॥६०॥ विभाव सुन्दरीके उद्दीपन विभाव मुखकी अद्भुत आकर्षकताका वर्णन पिछले पद्यके समान प्रथम पादमें नविपुलासे युक्त श्लोक छन्दमें किया है। कोमल तथा आनन्ददायी नील कुञ्चितकेशोंसे तथा कमलसदृश नयनोंसे युक्त ज्योत्स्नामय, देखते ही भली भाँति प्राण युक्त कर देने वाले (आनन) मुख पदार्थ द्वारा भी हनन किए जानेसे अधिक विषम क्या होगा ? दण्डीके यहाँ यह विरोध है । ग३३४ देखें । यहाँ (१) स्वरोंमें कण्ठ्य (i) अ, आ, (ii) तालव्य इ, ई, (iii) कण्ठ-तालव्य ए स्वरोंका ही प्रयोग किया गया है। (२) व्यञ्जनोंमें (i) कण्ठ्य क, घ, ह, (ii) तालव्य च, छ, य, श, (iii) दन्त्य त, न, ल, स का, (३) तथा स्वरव्यञ्जनोभयात्मक अनुस्वारका¹ प्रयोग किया गया है। यहाँ भी अवान्तर सभी भेदोंका प्रयोग किया हुआ है। अर्थावबोधकी दृष्टिसे यद्यपि यह पद्य प्रसादगुणयुक्त (झटिति अर्थसमर्पक) होनेसे सुगम है, पर रचनाविधानमें वर्णचयनमें स्थानविशेषसे तथा उसमें भी अवान्तर भेदोंको स्थान देनेके लिये विशेष प्रयत्न अपेक्षित होनेसे यह आधुनिक मन्त्रिमण्डलके गठनके प्रयासोंके समान दुष्कर है, यह स्पष्ट है ॥ ८६ ॥ (२.३) द्विस्थान वर्णनियम चित्र बन्ध—नवतितम श्लोकमें कविने वर्ण- स्थाननियम चित्रबन्ध वाले पद्यमें सुन्दरीकी विप्रलम्भ रतिका वर्णन किया है। उत्तरार्धके सभी पद सम्बोधन हैं। कोई पुरुष अपने मित्रको मित्रके प्रेममें बिरहिन नायिकाकी स्थितिका वर्णन कर रहा है। अर्थकी दृष्टिसे यह सुगम १. शौनकके अनुसार अनुस्वारमें स्वर और व्यञ्जन दोनोंके धर्म हैं। अतः यह स्वर भी माना जा सकता है और व्यञ्जन भी : अनुस्वारो व्यञ्जनं वा, स्वरो वा (ऋक्प्रातिशाख्य १।५) । उवटने इसकी व्याख्या इसे स्वरव्यञ्जनोभयात्मा वर्णान्तरके रूपमें बताकर की है : ‘अं’ इत्यनुस्वारो वर्णसमाम्नाये पठ्यते । स कांश्चित् स्वरधर्मान् गृह्णाति, कांश्चिद् व्यञ्जन-धर्मान् ।...तत्रोभय-धर्म-योगादुभय-स्वभावं स्वर-व्यञ्जनयोरन्यद् वर्णान्तरं प्रकाशयति—‘अनुस्वारो व्यञ्जनं वा, स्वरो वा ।’ इति ।
३।६० ] ३. वर्ण-नियम चित्र बन्ध : (२.३) द्वि-स्थान वर्ण-नियम ११३ है । पर रचनाकी दृष्टिसे दो ही स्थानोंके व्यञ्जनोंके चयनके कारण कठिन है । इसमें (i) कण्ठ्य व्यञ्जनों क, ग, घ, ङ, का तथा (ii) दन्त्य त, द, न और स का प्रयोग हुआ है । पिछले दो उदाहरणोंमें स्वर और व्यञ्जन दोनों, सदृशसङ्ख्यक स्थाननियमसे प्रयुक्त थे ।१ यहाँ स्वरस्थाननियम है, किन्तु वह व्यञ्जनस्थाननियमसे भिन्न है : केवल कण्ठ्य 'अ' का ही ह्रस्व और दीर्घ रूपोंमें प्रयोग हुआ है । इससे यह सूचित होता है कि आचार्यके मनमें (i) केवल व्यञ्जन या (ii) केवल स्वरका स्थाननियम भी शोभाकारकके रूपमें स्थित है । इस दृष्टिसे यह श्लोक द्विस्थानव्यञ्जननियम और एकस्थान- स्वरनियमका उदाहरण है । मिश्र पद्धतिको आदर देने वाले आचार्यके लिये यह दिग्निर्देश उचित ही है । यहाँ भी कविने स्पर्श, अन्तस्थ और ऊष्म तीनों प्रकारके व्यञ्जनोंका प्रयोग किया है । नताङ्गासङ्ग—नतान्यङ्गानि यस्याः, सा नताङ्गी, नताङ्गा२ (बहुव्रीहि) । नताङ्गायामासङ्ग आसक्तिः प्रेमा यस्य, तथाविध (बहु०) । रत्नश्रीज्ञान आदिने 'नताङ्गासङ्गेन सङ्गत' विग्रह मानकर 'सङ्गत' को समासका उत्तर पद माना है : हे अन्यस्त्रीसम्भोगप्रसङ्ग । पर यह पिछले दो विशेषणोंके विपरीत होनेसे उचित नहीं है : अन्यस्त्रीसम्भोगप्रसङ्ग (परस्त्रीके सम्भोगमें लीन) पुरुष 'सदा अनघ' (निष्पाप) तथा 'सदानन्द' (सत्को, या सदा, आनन्दित करने वाला) कैसे होगा ? सङ्गत—सम् + √गम् + क्त । 'क्त' जब भावमें होता है, तब 'सख्य' अर्थ होता है और जब कर्ता अर्थमें, तब रूढिमे 'सखा' अथवा यौगिक 'संयुक्त' अर्थ होता है३ ।। ६० ।। १. पीछे स्वरों और व्यञ्जनोंके स्थानोंमें भेद व्यञ्जनोंका कण्ठ-तालव्य भेद सम्भव न होनेसे हुआ है । समानाक्षर (simple vowels) उसी स्थान वाले प्रयुक्त हैं, जिस स्थानके व्यञ्जन हैं । सन्ध्यक्षर (diphthongs) भिन्न हैं । २. सिद्धान्तकौमुदी, स्त्रीप्रत्यय : नासिकोदरौष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गाच्च (अष्टा० ४।१।५५) । अत्र वृत्तिः—अङ्ग गात्र-कण्ठेभ्यो वक्तव्यम् । स्वङ्गी, स्वङ्गेत्यादि । कवियोंमें ङीषन्त अधिक प्रचलित है : अद्य प्रभृत्यवनताङ्गि, तवास्मि दासः (कुमारसम्भव ५।८६) । दण्डीने अकारबहुल पद्यमें भिन्नस्थानोच्चार्य एक ईकारान्तका प्रयोग वैरस्य- कारक समझकर नहीं किया है । ३. अष्टाध्यायी ३।१।१०४ : अजर्यं सङ्गतम् । भट्टिकाव्य ६।५३ : तेन सङ्गतमार्येण रामाजर्यं कुरु द्रुतम् । ५५ : आदृत्यस्तेन वृत्त्येन स्तुत्यो जुष्येण सङ्गतः ।
११४ काव्यदर्श [३।६१ (२.४) अगा गाङ्गाङ्ककाकाक-गाहकाघक-काक-हा । अ-हाहाऽङ्ग, ख-गाङ्गाग-कङ्काग-खगकाककः१ ॥ ६१ ॥ (२.४) गङ्गाके जलमें (जलविहारमें अपेक्षित राजस) चञ्चलतासे रहित होकर, अर्थात् सात्त्विक पुण्यबुद्धिसे, अवगाहन (स्नान) करने वाले, हा-हाकार (शोक, धिक्कारके शब्दों) को (गङ्गास्नानसे पवित्र होनेके कारण) नहीं प्राप्त करने वाले आकाशमें गतिशील सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि ज्योतियोंको अङ्कमें धारण करने वाले (सुमेरु) पर्वतको अर्थात्, वहाँ स्थित सभी २१ स्वर्गों२ को प्राप्त करने वाले (हे सत्पुरुष), महा-पातक आदि निन्दित पापों रूपी कौवोंको (स्नानके पुण्यसे) नष्ट करने वाले तथा स्थावर जङ्गम दोनों रूपोंमें स्थित ब्रह्मकी प्राप्तिके सुख वाले होकर आदित्यमण्डलकी प्राप्ति रूपी वैराज पदको प्राप्त (ही) हो गए हो, अर्थात् इस पदको अवश्य प्राप्त करोगे ॥६१॥ (२.४) एकस्थान वर्णनियम चित्रबन्ध—इक्यानवेंवे श्लोकमें कविने गङ्गा- स्नानके पुण्यका महत्त्व गङ्गास्नान करने वाले किसी पुरुषके लिए उत्तम वैराजपदकी प्राप्तिकी आशंकासे व्यक्त किया है। इसमें कविने कण्ठ्य (१) स्वर अ, आ का, (२ i) स्पर्श व्यञ्जनों क, ख, ग, घ, ङ, (ii) ऊष्म ह और (iii) विसर्ग३ इन एक ही स्थान कण्ठसे उच्चार्य वर्णोंका मिलाजुला (लयात्मक) प्रयोग किया है। रचनाकी दुष्करता स्पष्ट है। गाङ्ग-काकाक-गाहक — गङ्गाया इदं गाङ्गम्, तस्येदम् (अष्टा० ४।३।१२०) अण्, गाङ्गं च तत् कम् उदकम् गाङ्ग कम् गङ्गाजलम्, ककनं लौल्यं चाञ्चल्यम्, कक लौल्ये (भ्वादि) न काकः अकाकः, अचञ्चलता, अकाकेन गाहते प्रविशति १. अन्वयः—(हे) गाङ्ग-काकाक-गाहक, अ-हाहाऽङ्ग, ख-गाङ्गाग-कङ्क, अघक-काक-हा अग-खग-काककः (त्वम्) गाम् अगाः । रत्नश्रीज्ञानने पद्यके अन्तिम शब्दको भी सम्बोधन ही माना है। इस पाठमें कण्ठ्य वर्णों में विसर्ग रह जाता है। अतः पूर्वार्धके अन्तमें प्रथमान्तके समान उत्तरार्ध के अन्तमें भी प्रथमान्त पाठ विसर्गका भी समावेश हो जानेसे उचित है । २. एक-विंशत्यमी स्वर्गा निविष्टा मेरु-मूर्धनि ।। नृसिंहपुराण ३०।२४ सरित्स्नायी・・・निर्मलं स्वर्गमाप्नोति・・・॥ ३७ ३. 'अः, ‿ क, ‿ प, अं' (ऋक्प्रातिशाख्य, विष्णुमित्रकृत वर्गद्वयवृत्तियुत, पृष्ठ १६) तक प्रोक्त वर्णराशिमें स्वर और अनुस्वारसे इतर वर्णोंको शौनकने 'व्यञ्जन' कहा है : सर्वः शेषो व्यञ्जनान्येव (ऋ प्रा १।६) । विसर्गकी गणना व्यंजनोंमें भी ऊष्म वर्णोंमें की है : प्रथमपञ्चमौ च द्वा ऊष्मणाम् । केचिदेता उरस्यौ (ऋ प्रा १।३८-३६) ।