भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 130

३।८५] ३. वर्णनियम चित्र बन्ध : (१.२) स्वरत्रितयनियमवान् १०७ (१.२) क्षिति-विजिति-स्थिति-विहिति-व्रत-रतयः, पर-मतयः । उरु रुरुधुर्गुरु दुधुवुर्युधि कुरवः स्वमरिकुलम ॥८५॥ (१.२) पृथ्वीको जीतने और मर्यादा (व्यवस्था) के विधान रूपी व्रतमें प्रसन्न रहने वाले, उत्कृष्ट सूक्ष्म विषयोंमें समझ वाले (अथवा उत्कृष्ट समझ वाले) कौरवोंने अपने शत्रुसमूहको खूब रुद्ध (बसमें) किया और युद्धमें जोरसे हिला डाला ॥ ८५ ॥ अन्य प्रकारसे पदच्छेद भी हो सकते हैं । 'आम्नायोकी अन्तिम वाणी' से टीकाकारोंने वेदान्त, उपनिषद अर्थ लिया है । पर जब यह सिद्धान्त सर्वसम्प्रदायसम्मत, सार्वभौम, है, तो इसे केवल वेदान्तसे जोड़कर सीमित क्यों किया जाये ? अतः 'आम्नाय' का अर्थ 'वेद'न लेकर 'सम्प्रदाय' उचित है ।१ द्वितीय पादके 'गीतीः' आदि पद 'आह' क्रियाका उद्देश्य और विधेय होनेसे कर्मणि द्वितीयान्त हैं । तृतीय पादमें बुद्धिस्थ कर्मवाच्यके कारण 'भोगः' आदि उद्देश्य और विधेयमें प्रथमाका प्रयोग किया है । 'भोगं रोगं, मोदं मोहम्' होता तो मार्गभेद नहीं होता । चतुर्थ पादके 'धेया' प्रथमान्तको देखते हुए 'गीती रीतिः प्रीतिर्भीतिः' तथा तृतीय पादका यथावस्थित पाठ भी ठीक होता । तब 'गीतीः' आदि वाक्य का कर्म होगा । यहाँ यदि आचार्य 'ए' और 'ओ' के प्रयोगमें क्रमव्यत्याम कर देते, तो (१) प्रथम पादमें कण्ठ्य, (२) द्वितीयमें तालव्य, (३) तृतीयमें कण्ठ-तालव्य और (४) चतुर्थमें कण्ठोष्ठ्यके प्रयोगसे विशिष्ट शोभा हो जाती ॥ ८४ ॥ (१.२) स्वरत्रितयनियमवान् चित्र बन्ध—पच्चासीवें श्लोकमें आचार्यने कौरवोंके शौर्यका वर्णन अर्थख्यापनकी दृष्टिसे सरल किन्तु प्रथम पादमें 'इ', द्वितीय पादमें 'अ', तृतीय पादमें 'उ' तथा अन्तमें 'उ' 'इ' 'अ' एवम् 'अ', 'इ', 'उ' के द्विविध मिले-जुले प्रयोगके कारण दुष्कर बन्धसे किया है । इस प्रकार यहाँ समूचे श्लोकमें तीन ही स्वरोंके त्रिविध प्रयोगसे तीन स्वरोके नियम वाला विचित्र बन्ध सम्पन्न हुआ है । यहाँ आचार्यने त्रिस्वरनियमवान् बन्धके दो प्रकार प्रस्तुत किये हैं : (१) एक पादमें एकविध स्वरका ही प्रयोग करके शुद्ध तथा (२) एक पादमें त्रिविध स्वरोंके द्विविध प्रयोग मिश्र बन्ध । यह भेदव्यवस्था अन्य बन्धोंमें भी प्रयुक्त हो सकती है । द्वितीय प्रकार यदि एक पादमें ही किया जाता है, तो कोई चमत्कार उत्पन्न नहीं कर पायेगा । पर यदि चारों पादोंमें अपनाया जाता है, तो अवश्य शोभाधायक होगा । पर एक पादमें एक स्वर १. अमरकोष : श्रुतिः स्त्री, वेद आम्नायस्त्रयी । अथाम्नायः सम्प्रदायः ।