भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 270 में से

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का ही प्रयोग सुननेमें अधिक अच्छा तो लगता ही है, दुष्कर भी अधिक है । मिश्र बन्धको चतुर्थ पादमें (श्लोकके अन्तमें) देनेसे यह आपेक्षिक शोभावहता भी व्यक्त होती है । पूर्वार्धमें कौरवोंकी (१) योगक्षेमपरायणताका,¹ (२) उत्कृष्ट समझका एवम् उत्तरार्धमें युद्धमें शत्रुकुलको बसमें करने और हिला डालनेका वर्णन किया है कि वह फिरसे उनके सामने खड़ा न हो सके । रत्नश्रीमें धृत, वादिटीका तथा रत्नदर्पण (२।२८०) में व्याख्यात पाठ ‘पर-गतयः’ है । ‘परा गति’ तो मृत्यु होती है, जो यहाँ विजेता कौरवोंके प्रसङ्गमें इष्ट नहीं है । यदि वादिव्याख्यात ‘उत्कृष्ट चेष्टा वाले’² अर्थ लें, तो वह तो योग (पृथिवीविजय) और क्षेम (मर्यादापालन) के वर्णन से कही ही जा चुकी है । अतः अनुवादमात्र है ! इसलिये रत्नश्रीज्ञानकी यह व्याख्या उचित ही है कि योगक्षेमका विधान प्रज्ञाके बिना नहीं हो सकता । (इसलिये अगला विशेषण दिया है) ।³ इस कथनसे प्रतीत होता है कि मुद्रित पाठ भले ही ‘गतयः’ हो, पर रत्नश्रीज्ञानने व्याख्या ‘परमतयः’ की ही की है, ‘परगतयः’ की नहीं । ‘गति’ का अर्थ प्रज्ञा नहीं होता, ‘मति’ का होता है । इसी प्रकार तिरुवादिमं० में मूलमें भले ‘मतयः०’ छपा हो, पर व्याख्यात पाठ ‘गतयः’ ही है । तरुणटीकामें ‘परमतयः’ ही धृत है । उन्होंने व्याख्या नहीं की है । इतिहासमें असत्पक्षके प्रतिनिधि माने जाने वाले कौरवोंके अभ्युदयका वर्णन प्रबन्धकाव्यमें तो दण्डीके ‘धिनोति नः’ (१।२२) पक्षके अधीन ठीक है, पर यहाँ मुक्तकमें अखरता है । हो सकता है कि यह श्लोक किसी प्रबन्धकाव्य का अङ्ग हो । यहाँ ‘ति’ तथा ‘रु’ की अनेक बार और ‘तयः’ की एक बार आवृत्तिसे अनुप्रास है । कविने इस पद्यकी रचना पङ्क्ति जातिके ४६६वें भेद ‘अमृत- १. (क) अविजित क्षितिकी विजिति अप्राप्तकी प्राप्तिके कारण योग है । (ख) प्राप्तकी स्थिति (टिके रहने) का विधान प्राप्तका रक्षण होनेसे ‘क्षेम’ है । २. वादिटीका ३।८५ : परोत्कृष्टा गतिश्चेष्टा येषां, ते परगतयः । ३. रत्नश्री ३।८५ : एतच्च प्रज्ञामन्तरेण न भवतीत्याह—परा शोभापरा, गुणदोषविवेकसमर्था गतिः = प्रज्ञा येषामिति परगतयः । एवं च ‘शक्ति- सम्पन्नरिपुविजयचतुरा’ इत्याचष्टे ।

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