काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ काव्यादर्श [३।८४ भोगो रोगो, मोदो मोहो, ध्येये वेच्छेद्देशे क्षेमे१ ॥ ८४ ॥ आदिको बह जाना२ (तथा) प्रीतियोंको भय (बन्धनका कारण) कहती है । (विषयोंका) भोग रोग (पीडाका मूल) है। (विषयोंमें) हर्ष (अथवा हर्ष शोक आदि द्वन्द्व) मोह (बुद्धिपर पड़दा डालने वाला होता) है। (इनके) विकल्पमें (सबका मूल) इच्छा क्षेम (कल्याणकारी) 'ई' लक्ष्मीके देश (श्रीनिवास विष्णु) में स्थापित करनी चाहिये ॥ ८४ ॥ प्रकार एक पादमें एक ही स्वरका प्रयोग करनेसे यहाँ 'एकस्वर पादबन्ध' निष्पन्न हुआ है। श्लोकके चार पादोंमें चार स्वरोंका इस प्रकार व्यवस्थासे प्रयोग होनेके कारण इसे 'स्वरचतुष्टयनियमवान् चित्र बन्ध' कहा है। मिले- जुले रूपमें चार स्वरादिके प्रयोगसे भी ये स्वरनियमादि बन्ध बन सकते हैं । पर वे नादसौन्दर्य कम उत्पन्न करनेके कारण उतने सुन्दर नहीं होंगे । किन्तु यदि ये स्वरादि किसी एक व्यवस्थासे प्रयुक्त होते हैं, तो नादसौन्दर्य उत्पन्न करनेके कारण ऐसा बन्ध भी सुन्दर लगेगा । अतः नियमसे केवल संख्या ही अभीष्ट नहीं है, व्यवस्था भी इष्ट है । उदाहरणार्थ ३।६३ देखें । यहाँ कविने कल्याणकामीको कल्याणका मार्ग शास्त्रके प्रमाणसे बताया है। आस्तिक हो, चाहे नास्तिक, सभी शास्त्रों (आम्नायों) का यह अन्तिम निचोड़ है कि गाना, बजाना, नृत्य आदि आमोद-प्रमोदके साधन प्रेम- व्यापार, विषयभोग, वस्तुतः दुःखकारी हैं। इन सबमें आनन्दकी बुद्धि, एक प्रवाह है, जो मनुष्यको बहा ले जाता है। वह भयका सबसे बड़ा कारण है। वस्तुतः यह मनका एक रोग है, मोह है। इस लिये ये सब हेय हैं। मनुष्यको इच्छाएँ दो ही रखनी चाहिये : (१) देशमें, अर्थात्, तीर्थ, विद्वद्गोष्ठी आदि में और (२) क्षेममें, अर्थात्, मङ्गलमें, जिससे मनुष्यके दुःख समाप्त हों, ऐसे आचरणमें । क्षेम विष्णुको चाहने (भक्ति) से या ई (लक्ष्मी माया) के द (खण्डक ज्ञान) से ई (मायापर) श (विराजने वाले ब्रह्म) से हो सकता है । १. सरस्वतीकण्ठा० २।२८१में धृत तथा रत्नदर्पण और वाडिटीकामें व्याख्यात पाठ 'ध्येये वेच्छेत् क्षेमे देशे' है। रत्नदर्पणमें 'चेच्छेत्' अन्यसम्मत पाठ बताया है। रत्नश्रीमें यही है। वादि-तरुणटीकाओंमें 'इव' की व्याख्या की गई है। रत्नश्रीमें 'इच्छेत्' की व्याख्या नहीं है 'इच्छे'की है। वादीजीने और भी पाठान्तर बताया है: इच्छे देवेति द्वे द्वे, इति च पाठान्तरम् । सही पाठका निर्णय करना दुष्कर है। २. अमरकोष ३।३।६८ : प्रचार-स्यन्दयो रीतिः । कुछ लोगोंने 'ईती:' पद- च्छेद करके इसे 'उपद्रव' अर्थमें पर्यवसित किया है।